Home समाचार रामनाथ कोविंद पर विश्वास का तंज, पब्लिक हुई रंज

रामनाथ कोविंद पर विश्वास का तंज, पब्लिक हुई रंज

कुमार विश्वास की 'बतोलेबाजी' पर भड़के ट्विटरबाज!

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एनडीए ने जब से रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है विपक्ष बौखला गया है। वामपंथी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सब के सब हताश हैं। विपक्षी एकता की हेकड़ी तो गुम हो गई है लेकिन ‘बतोलेबाजी’ बंद नहीं हुई है। आम आदमी पार्टी (AAP) नेता और राजस्थान में पार्टी प्रभारी कुमार विश्वास ने एक ट्वीट के जरिए केंद्र सरकार पर तंज किया है। विश्वास ने एनडीए द्वारा एक दलित को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर ट्वीट कर लिखा, ‘सत्तर बरस बिताकर सीखी लोकतंत्र ने बात, महामहिम में गुण मत ढूंढो, पूछो केवल जात।’

इसके बाद उन्होंने ऐसे ही तंज वाली महाकवि दिनकर की कविता शेयर की. जो इस तरह है-
मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता है रणधीरों का ? पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ‘जाति-जाति ‘ का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर !

दरअसल देश की राजनीति में जाति-जमात इतनी गहरे तक पैठ गई है कि समाज इससे निकल नहीं पा रहा है। यही राजनीति है जो आज तक दलित, ओबीसी, बीसी, सवर्ण, मुसलमान, क्रिश्चियन में बांटती आई है। जबसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी की घोषणा की तो गूगल में सबसे ज्यादा उनकी जाति ही सर्च की गई। ये जानने का प्रयास कम ही किया गया कि रामनाथ कोविंद कौन हैं? उन्होंने अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन में कितनी उपलब्धियां हासिल कीं? जिंदगी में उन्होंने कितना संघर्ष किया? किन संघर्षों से गुजरकर उन्होंने कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ीं? जानना तो बस इतना सा है कि वो किस जाति से आते हैं?

जातिवादी मानसिकता ने राजनीति की जिस परंपरा को आगे बढ़ाया है उसी की उपज तो मायावती जैसी नेता भी हैं… सो भला वे कैसे पीछे रहतीं… उन्होंने सबसे पहले कोविंद जी की जात बता दी। उन्होंने कहा,

”कोविंद कानपुर में कोली समुदाय से आते हैं। अगर कोई अन्य दलित उम्मीदवार मैदान में नहीं आता है तो वो कोविंद को सपोर्ट कर सकती हैं।”

बहरहाल मायावती की बात तो सब समझते हैं कि उनकी राजनीति ही जाति के आधार पर खड़ी हुई है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने जो टिप्पणी की वो काबिले गौर है।

दरअसल भारतीय जनता पार्टी को दलित-पिछड़ा विरोधी बताने वाली विपक्षी पार्टियों को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती लग रही है। इसलिए उनकी टिप्पणी एक हद तक समझी जा सकती है। लेकिन पत्रकारों का क्या? वे क्यों बायस्ड रहे?

जातीय बंधनों को तोड़ कर समाजिक समानता और समरसता की राजनीति की बात तो सभी दल करते हैं, पत्रकार करते हैं, सामाजिक कार्यकर्ता करते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि वे भी जाति की राजनीति से निकल नहीं पाते हैं। तभी तो प्रधानमंत्री को भी वे ओबीसी और राष्ट्रपति को भी दलित के तौर पर देखते हैं। व्यक्ति की क्षमता, योग्यता, पद की गरिमा को तार-तार करती हुई राजनीति आगे बढ़ती जा रही है। लेकिन हकीकत ये भी है कि भारत बदल भी रहा है… क्योंकि भारत सबका साथ, सबका विकास की राजनीति पर चल पड़ा है… भारत एक भारत एक भारत, श्रेष्ठ भारत की राह पर अग्रसर है। जाहिर है बदलते भारत को कुमार विश्वास का ‘जाति’ वाला ट्वीट पसंद नहीं आया। ट्विटरबाजों ने विश्वास को निशाने पर लिया और क्या हुआ खुद देखिए।

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