Home चुनावी हलचल बीजेपी की ‘आंधी’, साइकिल बचा पाएगा राहुल का कमजोर पंजा?

बीजेपी की ‘आंधी’, साइकिल बचा पाएगा राहुल का कमजोर पंजा?

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सवा सौ साल पुरानी पार्टी कांग्रेस आज इस हाल में पहुंच चुकी है कि उसे अपना अस्तित्व बचाने के लिए 25 साल की समाजवादी पार्टी का सहारा लेना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले तक 27 साल यूपी बेहाल का नारा देने वाली कांग्रेस बिना लड़े ही हार मान चुकी है। 403 में से सिर्फ 105 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर पार्टी किसी तरह जान बचाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस पांच साल तक जिस पार्टी को पानी पी-पीकर कोसती रही आखिर में इज्जत बचाने के लिए उसी का हाथ थामकर चल रही है।

मुजफ्फरनगर दंगा, मथुरा का जवाहरबाग कांड, दादरी कांड, बदायूं रेप कांड, बुलंदशहर गैंगरेप कांड के साथ माइनिंग माफिया, यादव सिंह भ्रष्टाचार का मामला हो या गुंडागर्दी का। चुनाव में इन मुद्दों को उठाने के बजाय कांग्रेस अखिलेश के साथ है। इससे मतदाताओं में सपा के साथ-साथ कांग्रेस के प्रति भी भारी नाराजगी है। अखिलेश फैमिली ड्रामेबाजी से कहानी को मोड़ देने के कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दंगा, भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के कारण पार्टी राज्य में इतनी कमजोर चुकी है कि उसे पहले से ही कमजोर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए विवश होना पड़ा।

गठबंधन से पार्टी नेता के साथ कार्यकर्ता भी परेशान हैं। पहले जिससे खिलाफ नारे लगाते थे, अभियान चलाते थे अब उन्हीं का प्रचार करना पड़ रहा है। टिकट कटने से कई नेता बागी बन गए हैं और पार्टी उम्मीदवार के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। बीच-बीच में पिता और चाचा भी अपना तेवर दिखा दे रहे हैं।

कांग्रेस जिस तरह से नेहरू-गांधी परिवार से परे कुछ देखने को तैयार नहीं है, उसी तरह अखिलेश यूपी में यादव कुनबे से बाहर कुछ करते नहीं दिखते। अखिलेश को मुलायम पुत्र होने के कारण कुर्सी मिली जबकि राहुल पार्टी उपाध्यक्ष तक गांधी परिवार से होने के कारण पहुंचे हैं। राहुल किसी भी तरह एक स्वाभाविक राजनेता की तरह नहीं दिखते। वो खुद को एक अपने ऊपर थोपे गए राजनीतिक उत्तराधिकार की जिम्मेदारी किसी तरह बस ढो रहे हैं।

वहीं सूबे में 71 लोकसभा सीट जेब में रखने वाली बीजेपी अपने नेता नरेंद्र मोदी की छत्रछाया में एक आंधी लेकर बढती दिख रही है। यही वजह है कि एक-दूसरे को गाली देने वाले अचानक गलबहियां करने लगे हैं। पीएम मोदी इस ‘मिलन’ को आंधी से बचने के लिए ‘कोई भी सहारा’ पकड़ लेना बता रहे हैं। वहीं कांग्रेस के लिए ये ‘डूबते को किनारा’ जैसा है।

जिस रणनीतिकार प्रशांत किशोर के कहने पर दोनों ने ये तालमेल किया है उन्हें ये पता होना चाहिए कि बिहार में कांग्रेस, जेडीयू और आरजेडी तीनों प्रमुख पार्टियां बीजेपी के खिलाफ लड़ रही थी। लेकिन उत्तर प्रदेश में महागठबंधन जैसा कुछ नहीं है। यहां सपा, बसपा और रालोद साथ नहीं है। बिहार में जहां दोतरफा मुकाबला था वहीं उत्तर प्रदेश में चौतरफा मुकाबला है। साफ है कांग्रेस-सपा, बसपा और रालोद की इस चुनावी लड़ाई में बीजेपी बाजी मारती दिख रही है।

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