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बिहार में ‘महास्वार्थबंधन’ बचाने के लिए लालू-नीतीश से अधिक कांग्रेस चिंतित क्यों है?

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बिहार के सत्ताधारी गठबंधन में जारी खींचतान के बीच एक पहलू बहुत ही दिलचस्प है। यहां महागठबंधन में टूट की आशंका से जितनी जेडीयू या आरजेडी परेशान नहीं हैं, उससे अधिक कांग्रेस के पैरों के नीचे की जमीन खिसकी हुई है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नींदें उड़ी हुई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मनाने का प्रयास करती हैं, तो कभी लालू यादव को बहलाने-फुसलाने की कोशिश करती हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस का ये ऐतिहासिक दुर्दिन एक दिन में नहीं आया है। एक परिवार के स्वार्थ के एजेंडे को बढ़ाने की नीति ने आज पार्टी का ये हाल बना दिया है।

लालू-नीतीश को साथ रखने की चिंता
रेलवे होटल घोटाले ने बिहार में सत्ताधारी महागठबंधन में दरार डाल दी है। नीतीश कुमार को कुर्सी के साथ-साथ अपनी छवि की भी बहुत चिंता है। दूसरी ओर चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव हैं, जिनके लिए घोटाला और भ्रष्टाचार ही जीवन की उपलब्धियां हैं। वो बिना बोले बार-बार यही बात दोहराते आये हैं कि इन अपराधों से उनकी छवि को कोई असर नहीं पड़ता। इतिहास में तो वो जेल से सरकार चलाने की मानसिकता भी जता चुके हैं। इसीलिए उनके बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज होना उनके लिए बच्चों की खेल की तरह है। ऐसे में सोनिया के लिये लालू और नीतीश को एक खूंटे से बांधकर रखना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। कांग्रेस की फर्स्ट फैमिली की एक ही रणनीति है अगर महागठबंधन टूट भी जाय तो भी लालू और नीतीश से राजनीतिक रिश्ता बचा रह जाय।

बिहार में ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा था’!
कांग्रेस बिहार में आज लालू और नीतीश की बैसाखियों के सहारे खड़ी है। 2015 के विधानसभा चुनावों में वहां कांग्रेस को जितनी सीटें मिल गईं उसके बारे में पार्टी नेतृत्व ने भी कभी सपने में नहीं सोचा होगा। यही वजह है कि कांग्रेस हर हाल में महागठबंधन को बचाना चाहती है। ये सिर्फ राज्य सरकार में बने रहने की गारंटी नहीं है, बल्कि बिहार में पार्टी का अस्तित्व बरकरार रखने के लिये आवश्यक है। वर्तमान परिस्थितियों में इस गठबंधन के बिना बिहार में कांग्रेस की स्थिति उत्तरप्रदेश से भी बुरी हो सकती है।

बिहार में महागठबंध नहीं, महास्वार्थबंधन है!
बिहार में सत्ताधारी महागठबंधन किसी विचारधारा की ऊपज नहीं, निहित स्वार्थों की पैदाइश है। लालू यादव को अपने सियासी कुकर्मो से रक्षा के लिए सत्ता का हथियार चाहिए। तो कांग्रेस उस सत्ता लोलुप मछली की तरह है जो कुर्सी के बिना छटपटाने लगती है। यही नहीं कांग्रेस अगर गठबंधन नहीं करती तो वहां अबतक कोई उसका नामलेवा भी नहीं बचता। जबकि नीतीश कुमार को कुर्सी पसंद है। जिस लालू के जंगलराज का विरोध करके वो पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे, उन्हीं के साथ हाथ मिलाने से अब उन्हें कोई परहेज नहीं है। उन्हें न तो सजायाफ्ता लालू के सजायाफ्ता शहाबुद्दीन से जेल में फोन पर बात करने में उन्हें कोई आपत्ति है और न ही लालू के आरोपी बेटे को कैबिनेट से निकालने की कोई जल्दबाजी।

जब चोरी पकड़ी जाती है, तो सेक्युलर-सेक्युलर चिल्लाते हैं!
विशेष रूप से कांग्रेस की अगुवाई वाली तमाम सियासी दलों की एक मानसिकता जगजाहिर हो चुकी है कि जब उनकी चोरी पकड़ी जाती है, तो वो जोर से सेक्युलर-सेक्युलर चिल्लाना शुरू कर देते हैं। लालू हों या सोनिया-राहुल इन्होंने अपनी करतूतों को छिपाने के लिए छद्म धर्मनिर्पेक्षता का चादर ओढ़ रखा है। नीतीश भी कम धुरंधर नहीं हैं, वो अपनी छवि और चेहरे को बचाते हुए कभी इस घाट का तो कभी उस घाट का पानी पीते रहते हैं।

यूपी में रसातल में घुस चुकी है कांग्रेस!
कांग्रेस ने सोचा था कि बिहार की तरह की चालबाजी के सहारे वो उत्तर प्रदेश में भी अपना उल्लू-सीधा करने में सफल हो जाएगी। लेकिन यूपी को लालू-अखिलेश का साथ पसंद नहीं आया। राहुल को तो देश की जनता अनगिनत बार नकार चुकी है, उनके साथ ने अखिलेश की सियासयत की भी हवा निकाल दी। दरअसल बिहार और यूपी के चुनाव में करीब 15 महीने के अंतर ने स्वार्थ आधारित गठबंधनों की पोल खोल कर रख दी। यूपी के मतदाताओं ने कांग्रेस का वो हाल कर दिया है अब वहां मुश्किल से कोई उसका नामलेवा बचा है।

कभी टीएमसी से ममता, कभी लेफ्ट से दोस्ती
एक परिवार की चाकरी के चलते कांग्रेस का नैतिक पतन पहले ही हो चुका था। सत्ता के लिए स्वार्थ की राजनीति ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है। पश्चिम बंगाल इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। यहां कांग्रेस कभी टीएमसी के साथ जुड़ती है, तो कभी वामपंथियों की पिच्छलग्गू बन जाती है। सच कहा जाय तो पार्टी नेतृत्व को पता ही नहीं चल पा रहा है उनकी सेहत के लिए क्या बेहतर है? अभी भी राज्य में वो ममता सरकार का विरोध करती है, लेकिन मोदी सरकार के विरोध के नाम पर केंद्र की राजनीति में उसके साथ खड़ी रहती है।

केरल में लेफ्ट से दुश्मनी दिल्ली में प्रेम!
कांग्रेस और वामपंथियों का रिश्ता ऐतिहासिक मोड़ पर है। पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक समय तक लेफ्ट फ्रंट का विरोध करने के बाद पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने उन्हीं के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा। जबकि उसी समय केरल में दोनों दो विरोधी बनकर चुनाव लड़े। लेकिन जब बात केंद्र की राजनीति की होती है तो वामपंथी दल और कांग्रेस पार्टियां जुड़वां बहनों की तरह नजर आने लगती हैं।

आज कांग्रेस के पास कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है। उसका मूल सिद्धांत है सोनिया-राहुल की भक्ति, भ्रष्टाचारियों का समर्थन, छद्म धर्मनिर्पेक्षता को बढ़ावा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध। बस इन्हीं सिद्धांतों के बूते वो राष्ट्रीय राजनीति करना चाहती है। बिहार की वर्तमान राजनीतिक स्थिति इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। नतीजा ये हो रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति में तो उसका वजूद सिमट ही चुका है, धीरे-धीरे राज्यों की राजनीति से भी विलुप्त होती जा रही है।

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