Home तीन साल बेमिसाल प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से सशक्त हुआ गरीबों का आर्थिक आधार

प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से सशक्त हुआ गरीबों का आर्थिक आधार

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार की नीति है कि उनके काम की समीक्षा हमेशा उन्हें और बेहतर से बेहतरीन करने को प्रेरित करती है। यह और बात है कि राहुल गांधी जैसे ‘नौनिहाल’ इस बात को अभी तक नहीं समझ पाए कि इस वक्त देश की कमान एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री के हाथों में है, इसीलिए वे सवालों के जवाब तलाश करने की बजाय जवाबों के सवाल ही ढूंढ़ते रह जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की सूझ-बूझ पूर्ण नीतियों की सफलता का ताजा उदाहरण इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईइजी) की नवीनतम रिपोर्ट है। आइए, इसी पर एक नजर डालें-

मनरेगा से हुआ गरीबों का आर्थिक सशक्तीकरण
इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ की इस हालिया रिपोर्ट के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत कराए गए विविध कार्यों की सहायता से गरीब परिवारों की आय में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त खेतों की कुल उत्पादकता में भी 32 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई है। 29 राज्यों के 30 जिलों में 1160 ग्रामीण परिवारों को इस सर्वेक्षण के लिए चुना गया था। इस अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अनाज उत्पादन में 11.5 प्रतिशत और सब्जी के उत्पादन में 32.3 प्रतिशत की बढ़त हुई है। यह स्थिति मनरेगा के अंतर्गत कराए जाने वाले विविध कार्यों में गरीब परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के कारण हुई है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि है।

गरीबी के नाम पर गरीबों को हटाती रही पूर्ववर्ती सरकार
इससे पहले की सरकारों ने कभी भी गरीबों की सुध लेने की आवश्यकता ही महसूस नहीं की। उनकी ‘विदेशी बुद्धि’ के लिए इस देश का गरीब कभी भी एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं रहा, इसीलिए उनके लिए हमेशा से ही गरीबी हटाने का मतलब गरीबों के अस्तित्व को ही हटा देना रहा है। उनके लिए विकास की परिभाषा का अर्थ निजी स्वार्थों से परिपूर्ण रहा है। भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार ही उनके संपूर्ण कार्यकाल की विशेषता रही है। उनके शासन काल में बिचौलियों की भूमिका चरम पर रही है। इस स्थिति में दशकों बाद परिवर्तन प्रधानमंत्री मोदी के शासन काल में ही देखने को मिला है। उन्होंने पहले से चल रही योजनाओं के अस्तित्व को नकारा नहीं, बल्कि उसकी कमियों और उससे जुड़े भ्रष्टाचार को दूर करके उसे गरीबों के लिए उपयुक्त बना दिया।

मनरेगा को दी मोदी सरकार ने गति
प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के कार्यकाल में मनरेगा के सफल क्रियान्वयन पर पूरा-पूरा ध्यान दिया गया। समावेशी वित्तीय विकास जैसी कई योजनाएं, जैसे जनधन योजना सहित लगभग दर्जन-भर से अधिक योजनाएं गरीबों के हितों को ध्यान में रखकर बनीं और व्यावहारिक रूप से कार्यान्वित भी की गईं, उदाहरण के तौर पर, अटल पेंशन योजना और जीवन और दुर्घटना बीमा योजना आदि। यह न केवल न्यूनतम आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को ध्यान में रखकर बनाई गईं, बल्कि इनसे जुड़े उनके आर्थिक लाभ भी सुनिश्चित किए गए। मनरेगा जैसी योजना भी पूरवर्ती सरकारों के भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं रह पाई। काम दिलाने के नाम पर अधिकारियों द्वारा रिश्वत ली जाती रही थी। कड़ी मेहनत के बावजूद श्रमिकों के भुगतान में कोताही बरती जाती थी। यह मोदी सरकार के समक्ष आई चुनौतियों में सबसे बड़ी थी, जिसका समाधान उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से किया।  

यूपीए शासन में ढाई गुना महंगा था खान-पान
एनडीए सरकार पर सवाल उठाने वाले राहुल गांधी को यूपीए सरकार के दस वर्षों के कार्यकाल के दौरान बढ़ी बेतहाशा महंगाई आज याद नहीं हैं, लेकिन हम उन्हें याद दिला देते हैं कि यूपीए शासन में जब राहुल और सोनिया गांधी रिमोट कंट्रोल से देश की सरकार चला रहे थे, तब देश में सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ी थी। दाल, सब्जी, दूध जैसी खाने-पीने की चीजों के दाम ढाई गुना से ज्यादा बढ़ गए थे। 

आंकड़ों पर गौर करें तो सन् 2004 से 2013 के बीच खाने-पीने की वस्तुओं के दामों में 157% बढ़ोतरी हुई। सब्जी के उत्पादन में देश पूरी दुनिया में दूसरे नंबर है, इसके बावजूद यूपीए के कार्यकाल में सब्जियों के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई और यह 350 % तक जा पहुंची। 2004 से 2013 के बीच प्याज की कीमतों में 521% की बढ़ोतरी हुई। यूपीए सरकार के दौरान अक्टूबर 2013 में प्याज के दाम 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए थे। टमाटर भी जुलाई-अगस्त 2013 के दौरान 70 रुपये प्रति किलो तक बिक गया। प्याज, टमाटर तो छोड़िया आलू, बैंगन, भिंडी ने भी आम आदमी का दम निकाल दिया था। दालों के दाम 2005 से जो बढ़ने शुरू हुए, वे 2010 तक दोगुने हो गए। 2012 में इनकी कीमतों में फिर इजाफा हुआ और 2013 में तो दालों के दामों में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई। यूपीए के दस वर्षों के शासन के दौरान दूध की कीमतें 119 फीसदी बढ़ गईं जबकि अंडे के दाम 124 फीसदी उछल गए। चीनी के रेट में भी 106 फीसदी की बढ़ोतरी हुई यानी चीनी दोगुने से ज्यादा महंगी हो गई। यूपीए शासन के ये जो आंकड़े बताए गए हैं, वे थोक मार्केट के थे, यानी खुदरा मार्केट में तो खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छूने लगे थे। गरीब की थाली से पोषण तो दूर की बात, दाल-रोटी तक गायब होने लगी थी।

प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक सुधार
प्रधानमंत्री मोदी ने तीन सालों में देश में कई ऐतिहासिक आर्थिक सुधार किए-
• नोटबंदी से ‘क्लीन मनी’ अभियान को बढ़ाया
• जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरण किया
• डिजिटलाइजेशन से आर्थिक प्रणाली को पारदर्शी बनाया
• व्यापार संतुलन बनाया
• भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की नीतियां लागू की
• विदेशी कर्ज को घटाया
• विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया
• तीन सालों में हुए 7000 छोटे और सूक्ष्म नियमों में सुधार किया

विदेशी पूंजी के निवेश से दूर की देश की आर्थिक समस्या
प्रधानमंत्री मोदी ने देश में ‘सबका विकास’ के संकल्प को पूरा करने के लिए, धन की आवश्यक्ता को पूरा करने हेतु जिन आर्थिक सुधारों को लागू किया, उसका ही परिणाम है कि देश में ऐतिहासिक विदेशी पूंजी का निवेश हो रहा है। कांग्रेस के दस सालों के शासन के दौरान, जिसमें देश के प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह थे, भी ऐसा पूंजी निवेश नहीं करवा सके जो प्रधानमंत्री मोदी के तीन साल के शासन के दौरान करवा दिया।

साफ है कि देश का शासक होना और देश का सेवक होना दो अलग बातें हैं, जिसे इस देश की विरासत को अपनी खानदानी बपौती समझते आ रहे पप्पू कभी नहीं समझ पाएंगे, इसीलिए तो हम कह रहे हैं कि ‘रहने दो पप्पू, तुमसे न हो पाएगा।’

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