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विपक्ष के दूसरे दल ही नहीं, कांग्रेसियों के लिए भी राहुल गांधी बने हुए हैं ‘पप्पू’ !

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वंशवाद के चलते राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष तो बन गए हैं, लेकिन अभी तक एक गंभीर नेता के तौर पर स्वीकार्य नहीं हो पाए हैं। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा हैं क्योंकि दूसरी पार्टियों को तो छोड़ दें, कांग्रेस में ही अभी तक राहुल की स्वीकार्यता नहीं हो पाई हैं। यानी राहुल गांधी आज भी राजनीति के ‘पप्पू’ ही समझे जा रहे हैं। दरअसल 2019 के आम चुनाव से पहले बीजेपी को टक्कर देने के लिए विपक्षी दल एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। जाहिर है कि कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और वो विपक्षी दलों की एकजुटता की अगुवाई करना चाहती है। राहुल गांधी के चलते कांग्रेस के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि तमाम विपक्षी दलों को राहुल की अगुवाई स्वीकार नही हैं।

राहुल की अगुवाई स्वीकार नहीं ! 
एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को लड़ने लायक स्थिति में लाने के लिए एकजुटता की कोशिश कर रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में शरद पवार प्रमुख विपक्षी दलों के साथ दो बैठकें कर चुके हैं। 29 जनवरी को भी इसी तरह की बैठक शरद यादव ने बुलाई थी। जिसमें टीएमसी, बीएसपी, डीएमके, एसपी जैसी पार्टियों ने हिस्सा नहीं लिया। बताया जा रहा है कि बैठक से कांग्रेस की तरफ से ऐसा संदेश दिया गया था कि पार्टी अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी ही उनकी अगुवाई करेंगे। विपक्षी दलों के नेताओं को राहुल की अगुवाई में एकजुट होना गले नहीं उतर रहा, और यही वजह है कि कई दलों के नेता इस बैठक से नदारद रहे।

राहुल अध्यक्ष तो फिर सोनिया कार्ड क्यों खेल रहे हैं कांग्रेस नेता?
कांग्रेस को पता है कि वो सबसे बड़ा विपक्षी दल जरूर है लेकिन लोकसभा में बीजेपी के सामने उसकी औकात कुछ नहीं है। ऐसे में पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस को दर्जनों चुनाव हरवा चुके राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता का तो सवाल ही नहीं उठता। कांग्रेस नेता भी इसे भलीभांति जानते हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों विपक्षी एकता के लिए शरद यादव के घर पर बुलाई गई बैठक में कांग्रेस नेताओं ने सोनिया गांधी कार्ड खेल दिया। इस बैठक में कांग्रेस के दो बड़े नेताओं गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा ने बड़ी चालाकी से सोनिया गांधी के चेहरे को आगे कर विपक्षी एकता को आगे ले जाने का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि भले ही औपचारिक तौर पर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी हैं, लेकिन आज भी असली कमान सोनिया गांधी के हाथ में ही है, और गठबंधन बनाने और दूसरे बड़े फैसले लेने में सोनिया की भूमिका आज भी है। मतलब साफ है कि राहुल गांधी आज भी कांग्रेस नेताओं के लिए पप्पू ही हैं, वंशवाद के नाम पर राहुल को अध्यक्ष जरूर बना दिया गया है, लेकिन पार्टी के भीतर ही राहुल की स्वीकार्यता नहीं है।

सोनिया का राजनीति से दूर रहने का बयान दिखावा
राहुल गांधी की ताजपोशी के वक्त सोनिया गांधी ने कहा था कि वो अब सक्रिय राजनीति से दूर रहेंगी, लेकिन यह बयान भी महज दिखावा लग रहा है। विपक्षी एकजुटता की बैठक में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने सोनिया के नाम की पैरवी करते हुए दलील दी कि पार्टी संविधान के हिसाब से कांग्रेस की संसदीय समिति की नेता अभी भी सोनिया गांधी हैं और विपक्ष की अगुवाई करने में वो खुद को सक्रिय रखेंगी। साफ है कि कांग्रेस की कथनी और करनी में अंतर है। सोनिया गांधी का नाम उनकी बगैर सहमति के तो आगे बढ़ाया नहीं गया होगा। यानी सोनिया गांधी सिर्फ दिखाने के लिए राजनीति से दूर है, सच्चाई यह है कि वो विपक्ष की कमान अपने हाथ में रखना चाहती हैं।

इससे साफ हो गया है कि विपक्ष ही नहीं कांग्रेसियों के लिए भी राहुल गांधी आज भी पप्पू हैं। आप ही बताइए की राहुल गांधी में ऐसा क्या है, जिससे उन्हें विपक्ष की बागडोर सौंप दी जाए। राहुल गांधी उपाध्यक्ष और अध्यक्ष रहते हुए चुनावों में हरवाने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। विश्वास नहीं होता तो नीचे दिए गए आंकड़ों पर नजर डालिए।

राहुल के नेतृत्व में सिर्फ 4 राज्यों में बची कांग्रेस की सरकार
पिछले वर्ष दिसंबर में बीजेपी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। ऐसे में संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस राहुल गांधी के भरोसे कांग्रेस पार्टी देश की सत्ता में फिर से वापसी की उम्मीद कर रही है वह बेहद कमजोर है। राहुल गांधी का रिकॉर्ड तो ये है कि अब तक उनके नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए उसमें कांग्रेस हारती ही चली आ रही है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में हार के बाद अब सिर्फ चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बची है।

गुजरात-हिमाचल प्रदेश के साथ ही पिछले साढ़े तीन वर्षों में कई राज्यों में कांग्रेस से सत्ता छीन चुकी है। लगातार खिसकती जा रही सत्ता से अब कांग्रेस के पास सिर्फ चार राज्य बचे हैं। अब सिर्फ पंजाब, कर्नाटक, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार बची है। इसमें से कर्नाटक, मिजोरम और मेघालय में अगले साल चुनाव होने हैं, जहां कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं है। इसके साथ ही केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी कांग्रेस की सरकार है।

2017 में सात में से छह राज्यों में मिली शिकस्त
पिछले साल सात राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता में कमजोरी की पोल खोल दी। गुजरात, हिमाचल प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस को भारी हार मिली। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता और मेहनत की हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी किसी पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार
2015 में महागठबंधन के चलते बिहार में किसी तरह जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। भ्रष्टाचार और घोटालों के दाग लिए कांग्रेस आखिर स्वयं को पाक-साफ बताने की कोशिश क्यों करती है? 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2014 में 44 सीटों पर सिमट गई
दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। 2014 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं। लगातार मिल रही हार राहुल गांधी के पार्टी की कमान पूरी तरह से संभालने में लगातार देरी भी उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े कर रही है।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार
लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

राहुल के कारण हार के लिए चित्र परिणाम

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