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‘यादववाद-मुस्लिमवाद’ के चक्रव्यूह में फंस गए नीतीश !

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बिहार की राजनीति में बाहर से तो सब शांत-शांत दिख रहा है लेकिन अंदर खाने बड़ी हलचल है। परदे के पीछे कुछ और खेल चल रहा है। महागठबंधन के भीतर जोड़-तोड़ और नफा-नुकसान पर मंथन चल रहा है और इस पूरे प्रकरण को सियासत के तराजू पर तौला जा रहा है। वक्त और मौके का इंतजार है, खतरा नीतीश की पार्टी में बगावत का भी है।

बगावत का खतरा
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव के इस्तीफे को लेकर फिलहाल चुप्पी साध ली है। लेकिन अंदर ही अंदर घमासान है। एक तरफ महागठबंधन पर संकट के बादल हैं तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार की पार्टी में भी उथल-पुथल है। कहा जा रहा है कि अगर नीतीश कुमार महागठबंधन तोड़ने और एनडीए के साथ जाने का निर्णय करते हैं तो जेडीयू के 71 में से करीब 20 विधायक और 12 में से 6 सांसद नीतीश कुमार से नाता तोड़ एक नई पार्टी बना सकते हैं।

यादववाद का जोर
दरअसल खबरें थीं कि अगर महागठबंधन टूटता है तो नीतीश कुमार एनडीए का सपोर्ट लेकर अपनी सरकार बचा सकते हैं। लेकिन खबरें हैं कि ऐसी सूरत में जेडीयू के अधिकांश यादव और मुस्लिम विधायकों ने बीजेपी के साथ जाने की बजाय अलग रास्ता अपनाने का मन बना लिया है। कहा जा रहा है कि लालू यादव ने इस स्थिति की कल्पना टिकट बंटवारे के वक्त ही कर ली थी, इसलिए जेडीयू से अधिकांश यादव विधायकों को लड़वाया और जितवाया।

कोविंद पर कलह
नीतीश कुमार के इस एलान के बाद कि वे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए सपोर्ट करेंगे, पार्टी का एक खेमा नाराज हो गया। पार्टी के अंदर चल रही हलचल की बानगी केरल से पार्टी के एकमात्र सांसद वीरेंद्र कुमार ने बता दिया था। उन्होंने न सिर्फ बीजेपी के साथ मिलने की खबरों का खंडन कर दिया बल्कि रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के पार्टी के एलान को भी नजरअंदाज कर दिया।

शरद खेमा भी नाराज
दरअसल शरद यादव के बारे में कहा जा रहा है कि वे भी नीतीश के कई फैसलों से असहमति रखते हैं। लालू यादव के भ्रष्टाचार का मामला हो, तेजस्वी के इस्तीफे का मुद्दा हो या फिर रामनाथ कोविंद के समर्थन की घोषणा, शरद और नीतीश के सुर अलग-अलग हैं। जाहिर है शरद यादव की नाराजगी पार्टी में नई हलचल पैदा कर सकती है। ऐसे में नीतीश कुमार की पार्टी पर बिखराव और टूट का खतरा मंडरा रहा है।

लालू के जाल में फंसे नीतीश
अगर महागठबंधन टूटता है तो इस सूरत में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और आरजेडी को ही होने वाला है। सालों तक सत्ता से दूर रहे दोनों दल सत्ता गंवाना नहीं चाहते। जाहिर है इसी से बचने के लिए लालू और कांग्रेस मिलकर जेडीयू में बागी सुर को हवा दे रहे हैं। दरअसल बिना जेडीयू को तोड़े और बिना एनडीए के समर्थन के बिहार में सरकार बनाना मुश्किल है। ऐसे में कहा जा रहा है कि लालू यादव अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए नीतीश की पार्टी को तोड़ने का चक्रव्यूह रच चुके हैं।

‘Zero tollerance’ में देरी से बढ़ी मुसीबत
सभी जानते हैं कि नीतीश कुमार अपने फैसले बेलाग और बेखौफ लेते हैं। वे दुविधापूर्ण राजनीति को पसंद नहीं करते हैं। लेकिन तेजस्वी यादव के मामले में ज्यादा देर तक चले मंथन ने लालू-शरद को एक मौका दे दिया कि नीतीश कुमार के गेम को खराब किया जाए। दरअसल नीतीश कुमार की छवि एक ईमानदार और कर्मठ नेता के साथ भ्रष्टाचार विरोधी नेता की है। लेकिन तेजस्वी यादव के मामले में समझौतावादी और अवसरवादी राजनीति ने उनकी सियासत की नींव हिलाकर रख दी है।

पार्टी में टूट बचाने की चुनौती
बहरहाल यादववाद यानि शरद यादव और लालू यादव की चुनौती एक तरफ है, मुस्लिम विधायकों की नाराजगी दूसरी तरफ। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार का एनडीए के साथ जाने के फैसले का सीमांचल और कोशी इलाके से चुनकर आने वाले एमएलए भी अलग राह अपना सकते हैं। ऐसे में अगर नीतीश कुमार महागठबंधन तोड़कर एनडीए में शामिल होने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अपनी ही पार्टी में सबसे ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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