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तुम मुस्लिम का नाम लेकर वोट मांगो तो सही, हम भेदभाव खत्म करने को कहें तो गलत

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान पर कि धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए, विपक्षी नेता बौखलाए हुए हैं। यूपी के फतेहपुर की रैली में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि यूपी में भेदभाव सबसे बड़ा संकट है। ये भेदभाव नहीं चल सकता। हर किसी को उसका हक का मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर होली पर बिजली मिलती है तो ईद पर भी बिजली मिलनी चाहिए। धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर रमजान में बिजली मिलती है तो दिवाली पर भी बिजली मिलनी चाहिए। गांव में कब्रिस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में भेदभाव को सबसे बड़ा संकट मानते हुए राज्य की सत्ताधारी सपा के अलावा कांग्रेस और बसपा पर जोरदार हमला बोला। पीएम मोदी ने ‘सबका साथ सबका विकास’ का मतलब समझाते हुए कहा कि सबको उसका हक मिलना चाहिए, चाहे वह किसी भी माता की कोख से पैदा हुआ हो। प्रधानमंत्री ने कहा कि यूपी की सरकार जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव करती रही है।

बसपा प्रमुख मायावती खुलेआम मुस्लिम समाज से वोट मांग रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मुस्लिम वोट पर अपना हक जताने में पीछे नहीं हैं। अखिलेश यादव कई चुनावी सभाओं में मुस्लिम मतदाताओं आगाह कर चुके हैं कि बिखराव की स्थिति में बीजेपी को फायदा पहुंच सकती है। वे मुस्लिम मतदाताओं को ये याद दिलाना नहीं भूलते कि बसपा सुप्रीमो बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना सकती है।

मुलायम सिंह के राह पर चलते हुए उनके बेटे टीपू (अखिलेश के बचपन का नाम टीपू) ने सपा शासनकाल में मुस्लिम तुष्टीकरण की पुरानी नीतियों को आगे बढ़ाया। उन्होंने श्मशानों की बाउंड्री बनाने के लिए 200 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया। सरकारी जमीन पर मुसलमानों ने नाजायज कब्जा कर लिया लेकिन अखिलेश सरकार ने आंखें बंद कर ली।

यूपी में सभी सरकारी नौकरियों में यादव समुदाय को प्राथमिकता दी गयी। पिछड़े वर्ग के आरक्षण का लाभ सिर्फ यादवों को दिया गया। अखिलेश ने राज्य में नए तरह की धर्मनिरपेक्षता को आगे बढ़ाया। उन्होंने ज्यादातर पुलिस चौकी में दो यादव और एक मुसलमान अधिकारी की नियुक्ति की।

अखिलेश सरकार काम बोलता है का नारा दे रही है, लेकिन राज्य में विद्युतीकरण भी वोटबैंक को ध्यान में रखकर किया गया। केंद्र सरकार की दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में भी समाजवादी पार्टी ने खुलेआम धार्मिक आधार पर भेदभाव किया। इस बात का खुलासा सरकार की जांच रिपोर्ट में हुआ। यूपी सरकार ने तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुए विद्युतीकरण करते वक्त हिंदू इलाकों को छोड़ दिया जबकि मुस्लिम इलाकों में बिजली पहुंचाई गई। मुरादाबाद के सांसद ने तो इस बारे में प्रधानमंत्री से शिकायत भी की थी।

इसी तरह अखिलेश पर पढ़ने वाली स्कूली बच्चियों में भी फर्क करने का आरोप लगा। बीजेपी के विधान परिषद के सदस्य महेंद्र सिंह ने हाल ही में अखिलेश पर आरोप लगाया था कि अगर एक का नाम सलमा है और एक का सरिता है, तो सलमा को रुपया दिया गया और सरिता को छोड़ दिया गया। इसी तरह कब्रिस्तान की बाउंड्री बनाई, श्मशान घाट को छोड़ दिया।

अखिलेश यादव वोट बैंक के लिए केवल और केवल मुसलमानों के पैरोकार बने रहना और दिखना चाहते हैं। ये वही अखिलेश यादव हैं, कि कानून की नजर में दादरी कांड के सूत्रधार व आरोपी परिवार को फ्लैटों और 45 लाख मुआवजा बांटती है। मुस्लिम बहुल कैराना से पलायन कर रहे हिन्दुओं को रोकने की कोशिश नहीं करती है। सरकारी योजनाओं में केवल मुस्लिम कन्या के लिए प्रावधान किया है। मुस्लिम धर्म गुरु को सलाहकार नियुक्त करके उसे राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया। केन्द्र सरकार से मुसलमानों को आरक्षण देने की बात की। उर्दू जुबान और मदरसों, कब्रिस्तानों पर सरकारी खजाना लुटाने में लगे रहे।

उधर मायावती अपनी रैली में मुस्लिम मतदाताओं से बसपा के पक्ष में वोट देने का आग्रह करते हुए कहती है कि समाजवादी पार्टी में बंटवारा हो गया है और वे सपा और कांग्रेस को वोट देकर उसे बेकार न करें। मुस्लिमों को खुश करने के लिए उन्होंने करीब 20 प्रतिशत मतदाताओं को ध्यान में रखकर 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दी है। मुस्लिम वोट पाने के लिए मायावती बाहुबली नेताओं को भी पार्टी में शामिल करने से नहीं हिचकीं। कई मुस्लिम संगठनों ने तो खुलेआम मायावती को समर्थन और वोट देने की बात की है।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की तादाद करीब 20 प्रतिशत है। राज्य विधानसभा की 403 सीटों में से करीब 130-135 सीटों पर मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित होता है। मुस्लिम वोट पाने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपना पूरा जोर लगा देती है। ऐसे में पार्टी दागी और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को भी टिकट देने से नहीं हिचकती है। मायावती खुलेआम मुस्लिम मतदाताओं को डरा रही है कि भाजपा सत्ता में आई तो उनकी उत्पीड़न बढ़ेगा।

ये तो ऐसा ही है कि तुम मुस्लिम-दलित के नाम पर वोट मांगो, सिर्फ मुस्लिम हितों को ध्यान में रखकर काम करो, सिर्फ मुस्लिमों के लिए योजनाएं शुरू करो तो सही और हम बराबरी का जिक्र भी करें तो खराब। हम भेदभाव मिटाने की बात भी करें तो गलत।

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