Home विचार क्या उम्मीदवारी त्यागने का नैतिक साहस दिखाएंगी मीरा कुमार ?

क्या उम्मीदवारी त्यागने का नैतिक साहस दिखाएंगी मीरा कुमार ?

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17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए की ओर से रामनाथ कोविंद ने शुक्रवार 23 जून को अपना नामांकन भरा। पर्चा भरने के बाद रामनाथ कोविंद ने कहा कि वो राष्ट्रपति पद की गरिमा कायम रखने की पूरी कोशिश करेंगे। विपक्ष ने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है जो 27 जून को अपना नामांकन भरने वाली हैं। हालांकि मीरा कुमार की राष्ट्रपति उम्मीदवारी को लेकर विपक्ष की फूट सतह पर आ चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार सीधा सवाल खड़ा कर चुके हैं कि मीरा कुमार को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का ख्याल इस बार ही क्यों आया? नीतीश के इस सवाल का जवाब उस कांग्रेस को सूझ ही नहीं रहा जिसने सिर्फ दलित होने का हवाला देकर मीरा कुमार को चुनाव मैदान में हारने के लिए खड़ा कर दिया।

ये दोस्ती जल्द ही टूटेगी!

कांग्रेस समेत विपक्ष के जिन 17 दलों ने मीरा कुमार की उम्मीदवारी पर हामी भरी उनमें बिहार में गठबंधन सरकार की सहयोगी आरजेडी भी है। आरजेडी के मुखिया लालू प्रसाद यादव को उम्मीद थी कि अपने यहां इफ्तार के दिन वो नीतीश कुमार को भी मीरा कुमार की उम्मीदवारी पर समर्थन के लिए मना लेंगे। लेकिन लालू को बड़ा झटका लगा जब नीतीश अपने रुख से टस से मस नहीं हुए। इफ्तार के बाद नीतीश ने लालू के दो बयान पर अपना दो टूक जवाब लेकर आए: लालू ने कहा था कि बिहार की बेटी के सम्मान की बात है इसलिए नीतीश कुमार को अपने रुख पर दोबारा सोचना चाहिए। नीतीश ने कहा कि बिहार की बेटी के सम्मान की याद पिछले दो राष्ट्रपति चुनाव के समय क्यों नहीं आई?  जहां हार तय है वहीं क्यों बिहार की बेटी को उम्मीदवार बनाया जा रहा है? लालू ने ये भी कहा था विपक्षी महागठबंधन की उम्मीदवार मीरा कुमार को समर्थन ना देकर नीतीश कुमार ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं, इस पर नीतीश ने साफ-साफ कहा कि करने दीजिए हमें ऐतिहासिक भूल। मुख्यमंत्री ने मीडिया से स्पष्ट कहा कि लालू यादव बोलने के लिए स्वतंत्र हैं, मैं अपने फैसले पर कायम हूं। यानी नीतीश राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को समर्थन देने के रुख को सख्ती से दोहरा गए। वहीं, लालू पर निशाना साधते हुए बिहार बीजेपी के नेता सुशील मोदी ने कहा कि रामनाथ कोविंद के नामांकन के बाद आज लालू प्रसाद का दलितों के प्रति प्रेम उमड़ा है लेकिन जब उनके 15 वर्षों के राज के दौरान बिहार में सैकड़ों दलित गाजर-मूली की तरह काटे गये थे, तब वह कहां थे?

लालू के काम नहीं आई दावत की राजनीति

नीतीश कुमार के रुख ने लालू यादव के अंदर खलबली मचा दी है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं-एक तो लालू यादव का परिवारिक कुनबा आजकल बेनामी संपत्ति से जुड़े मामलों के जाल में बुरी तरह उलझ-पुलझ गया है और दूसरा ये कि नीतीश कुमार चार साल पहले तक बीजेपी के साथ रहे थे, इसलिए लालू उनके बदले रुख से अपने लिए आने वाले खतरों को भी भांप रहे होंगे। लालू के घर इफ्तार की दावत तो चलती रही, लेकिन नीतीश कुमार के पाले में नहीं आने से लालू का सारा मजा किरकिरा होता दिखा। राजनीतिक हलकों में इस बात के भी मायने निकाले जा रहे हैं कि नीतीश के लालू के यहां पहुंचने पर उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी यादव उन्हें गेट से पैदल ही अंदर तक ले गये। मुख्यमंत्री की गाड़ी कैंपस के अंदर नहीं गई। इतना ही नहीं लौटते वक्त तो मुख्यमंत्री पैदल ही अपने आवास एक अणे मार्ग तक गये। सवाल ये उठ रहे हैं कि कहीं ये सब नीतीश पर लालू की खीझ का नतीजा तो नहीं?

बलि का बकरा बनने को कैसे तैयार हुईं मीरा?

उधर मीरा कुमार हैं जिनकी उम्मीदवारी के चलते विपक्ष में कोहराम मचा है, लेकिन वो चुनाव लड़ने पर आमादा दिख रही हैं। सवाल है कि जिस मीरा कुमार ने अब तक के अपने करियर में कभी दलित होने का फायदा नहीं उठाया, वो मीरा कुमार क्यों आज दलित बताकर उम्मीदवार बनाये जाने के बावजूद रामनाथ कोविंद के खिलाफ चुनाव लड़ने को तैयार दिख रही हैं? क्या अपनी पार्टी में मिल रहे इस नकली सम्मान को वो समझ नहीं पा रहीं? मीरा कुमार के पिता बाबू जगजीवन राम को कांग्रेस ने हमेशा इसलिए हाशिये पर रखा था क्योंकि पार्टी आलाकमान को किसी बड़े पद के लिए गांधी-नेहरू परिवार के बाहर का चेहरा पसंद नहीं रहा। कांग्रेस की इस चाल को हर कोई पढ़ चुका है कि दलित की दुहाई देकर उसने मीरा कुमार को उम्मीदवार तो बना दिया है लेकिन अगर विपक्ष के उम्मीदवार की जीत तय होती तो मीरा कुमार किसी भी सूरत में राष्ट्रपति की कैंडिडेट नहीं बनाई गई होतीं। यानी रामनाथ कोविंद के सामने कांग्रेस को बलि का बकरा बनने वाला उम्मीदवार चाहिए था जो उसे मीरा कुमार में ही दिखा।

मीरा कुमार से नैतिकता का है तकाजा

राष्ट्रपति चुनाव में अगर सत्ता और विपक्ष के सभी दलों के वोटों पर पर नजर डालें तो एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद एकतरफा जीतते नजर आ रहे हैं। उनके पक्ष में 63 फीसदी से ज्यादा वोट हैं। एनडीए ने राष्ट्रपति के लिए रामनाथ कोविंद के रूप में गैरविवादित और कर्मठ चेहरा देकर विपक्ष को भी उनके नाम पर मनाने की कोशिश की। लेकिन विपक्ष खासकर कांग्रेस को लगा कि उम्मीदवार नहीं उतारने से उसका राजनीतिक अस्तित्व और संकट में आ जाएगा। नतीजा मीरा कुमार के नाम पर उसने अपने साथ कुछ सहयोगियों से भी मुहर लगवा ली। लेकिन मीरा कुमार भी इस बात को महसूस कर रही होंगी कि किन परिस्थितियों में कांग्रेस उन्हें उम्मीदवार बनाने को मजबूर हुई? क्या वो अंतरात्मा की आवाज पर सियासी चाल से भरी अपनी उम्मीदवार का त्याग करने का नैतिक साहस दिखाएंगीं?

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