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मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए तोड़ा-मरोड़ा गया मेनका का बयान, आप खुद देखिए सबूत

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मोदी सरकार को बदनाम करने का एक सिलसिला सा चल पड़ा है। किसी बात को किसी संदर्भ में जोड़कर ऐसा माहौल बना दिया जाता है, मानो मोदी सरकार से ज्यादा जनविरोधी कभी कोई सरकार रही ही नहीं। ताजा मामला मेनका गांधी का है। मेनका गांधी लाइव स्ट्रीम के जरिए सोशल मीडिया पर आयीं। 2 लाख लोग इस इवेंट से ऑनलाइन जुड़े। करीब 700 प्रश्न आए। एक प्रश्न ऐसा था जिसके जवाब को लेकर सोशल मीडिया में मेनका गांधी को ट्रोल किया जाने लगा।

आप आश्चर्य करेंगे जब ये सुनेंगे कि मेनका गांधी ने ऑनलाइन कहा हो कि उन्होंने एक भी व्यक्ति की आत्महत्या की खबर न पढ़ी है, न सुनी है। मेनका गांधी के मुंह से ‘ऐसा कहा गया’, अगर आपको बताया जाएगा तो आप क्या प्रतिक्रिया देंगे? जो प्रतिक्रिया देंगे, वह कुछ इस तरह से होगा- बिना पढ़े-लिखे मंत्री बन गयीं क्या?, ऐसे ही मंत्री से बनेगा न्यू इंडिया?, मोदी सरकार ऐसे मंत्री के जरिए क्या बदलाव कर देंगे?, जो अखबार नहीं पढ़तीं, जिन्हें अपने देश में आत्महत्या की घटनाओं का पता ना हो, वो भला मंत्रालय कैसे संभाल रही होंगी?…वगैरह…वगैरह। जाहिर है ऐसी ही प्रतिक्रियाओं से सोशल मीडिया में मेनका गांधी ट्रोल करने लगीं।

सोशल मीडिया पर आम लोगों ने ही नहीं, पत्रकारों ने भी मेनका गांधी को ट्रोल किया। नेशनल क्राइम ब्यरो के आंकड़े जारी किए। सवाल किए कि आत्महत्याओं की इतनी घटनाएं घटी हैं। क्या आपने कभी एक भी न सुना, न पढ़ा?

सोशल मीडिया ही नहीं, मेन स्ट्रीम की मीडिया इंडियन एक्सप्रेस, अमर उजाला जैसे अखबार भी मंत्री को गलत तरीके से पेश कर न सिर्फ मंत्री, बल्कि पूरी सरकार का अपमान कर रहे हैं।

सच्चाई क्या थी?
सच्चाई यह थी कि मेनका गांधी से सवाल किया गया-

What Our Govt is doing to reduce highter suicide rate among men, majority of which is due to Gynocentric Gender-Biased laws.?

यह सवाल आम आत्महत्या का नहीं है, न ही किसानों की आत्म हत्या से जुड़ा है। लिंगभेद के कारण पुरुषों की आत्महत्या से जुड़ा ये सवाल है। इसके जवाब में मेनका गांधी ने क्या कहा-

“Which men committed suicide??? Why not try and resolve the situation rather than commit suicide- I have not heard/read of a single case.”

औसत बुद्धि का व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि मेनका गांधी लिंग भेद के कारण आत्महत्या पर पूछ रही हैं कि किस व्यक्ति ने आत्महत्या की? क्यों नहीं उसने आत्महत्या से पहले समस्या का हल ढूंढ़ने की कोशिश की? मैंने एक भी ऐसे केस के बारे में न सुना है, न पढ़ा है।

आप समझ सकते हैं कि जो पढ़ी लिखी मेनका गांधी लिंगभेद के कारण पुरुषों के आत्महत्या करने के दावे को नकार रही हो, उन्हें देश में आत्महत्या की घटनाओं और यहां की सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी तो अवश्य होगी।

मगर, सोशल मीडिया ने मेनका गांधी को निरक्षर, अज्ञानी, मूर्ख न जाने क्या-क्या कह डाला। इस बहाने मोदी सरकार को अकर्मण्य और बदनाम बताने के सारे मुहावरे इस्तेमाल कर लिए गये।

दरअसल मोदी सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में एक पूरा गैंग हाथ धोकर पड़ा हुआ है जो बातों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है। पीएम मोदी, उनकी सरकार और उनके मंत्रियों को बदनाम करता है। मेनका गांधी तो उदाहरण भर हैं।

क्या ये माना जा सकता है कि इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला जैसे अखबारों को भी मेनका गांधी की सोच-समझ के स्तर का पता नहीं होगा? क्या उन्होंने झूठ को परखने की कोई कोशिश की? कैसी पत्रकारिता है जो देश के एक जिम्मेदार मंत्री के बयान की सच्चाई को परखे बिना खबर छापती है, उन्हें ट्रोल करने लगती है? अब भी क्या यह कहना बाकी है कि मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए देश में मीडिया का एक वर्ग मौके गढ़ रहा हैं?

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