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राजनीतिक हताशा की शिकार ममता

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क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक हताशा की शिकार हो गई हैं? नोटबंदी के बाद ममता बनर्जी जिस तरह का बर्ताव कर रही हैं उससे तो यही कहा जा सकता है.

नोटबंदी पर पश्चिम बंगाल से बाहर निकल दिल्ली, लखनऊ और पटना में रैली कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीति से हटाने की बात कर रही हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गद्दार कह रही हैं.

आखिर ममता को मिर्ची क्यों लगी है? नोटबंदी पर मोदी सरकार के खिलाफ अभियान को फुस्स होते देख अब केंद्र सरकार पर तख्ता पलट का आरोप लगा रही हैं.

पटना से कोलकाता आते वक्त प्लेन लैंडिग में जरा सी देरी होने पर भड़क उठती हैं और हत्या की साजिश करने का आरोप लगा बैठती हैं. अब कोलकाता में राज्य सचिवालय के पास और कई और जगहों पर सेना की तैनाती पर खफा हो गईं. उनका आरोप है कि नबन्ना भवन समेत राज्य में कई जगहों पर सेना की तैनाती तख्ता पलट के तहत की गई है.

ममता बनर्जी गुरुवार रात नबन्ना में थीं. उन्होंने कहा था कि जब तक सेना नहीं हटाई जाती वो भवन से बाहर नहीं निकलेंगी.

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ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा में इसे एक साजिश करार देने की कोशिश की. जिसपर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में सेना की मौजूदगी नियमित अभ्‍यास का हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि सेना के नियमित अभ्‍यास पर विवाद पैदा करना वास्तविक स्थिति पेश करने की बजाए राजनीतिक हताशा का परिचायक है.

रक्षा मंत्री ने राज्य सरकार के उस दावे को भी खारिज किया कि स्थानीय प्रशासन को इस बारे में नहीं बताया गया. उन्होंने कहा कि कोलकाता पुलिस के कहने पर ही तारीखों को बदला गया. पहले यह तारीख 28 से 30 नवंबर थी लेकिन कोलकाता पुलिस के आग्रह पर उसे बदलकर दो दिसंबर कर दिया गया.

पर्रिकर ने कहा कि पश्चित बंगाल के अलावा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में ये अभ्‍यास किये गए.

आखिर ममता ऐसा कर क्यों रही हैं. क्या वह प्रदेश की राजनीति से आगे निकल केंद्र की राजनीति में खुद को स्थापित करना चाह रही हैं. लेकिन क्या इस तरह की हरकतों से वह कामयाब हो पाएंगी.

या फिर कहानी कुछ और है. क्योंकि कुछ दिन पहले ही बीजेपी प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि बंगाल की मुख्यमंत्री बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में जी-जान से लगी हुई हैं लेकिन सारधा की क्वीन इसमें कितनी सफल होती हैं यह तो समय ही बताएगा.

-हितेंद्र गुप्ता

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