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क्या खुद को संवैधानिक सत्ता से ऊपर मानते हैं केजरीवाल?

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दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर विवादों में हैं। आजादी के बाद से सात दशकों में स्थापित संवैधानिक मानदंडो के खिलाफ केजरीवाल ने एक प्रकार से छापामार युद्ध छेड़ रखा है। क्रोधी स्वाभाव के साथ-साथ सत्ता की पूरी ताकत अपने पास ले लेने की आतुरता में संविधान के नियमों की धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आ रहे है। पिछले दो सालों में उनकी बातों और कामों ने यही साबित किया है कि वह और उनकी टीम संविधान की मर्यादाओं के दायरों को नहीं मानती है। इस बार उन्होंने चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। ऐसा नहीं कि आप संयोजक केजरीवाल पहली बार किसी संवैधानिक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं। वे इसके पहले भी वो कई बार इस तरह के सवाल उठा चुके हैं।

संवैधानिक संस्थाओं पर केजरीवाल ने कब-कब चोट किए हैं, आइए इसकी पड़ताल करते हैं-

चुनाव आयोग पर धांधली का आरोप
11 मार्च को पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणाम आने पर केजरीवाल बौखला गये। उनको उम्मीद थी कि पंजाब में आप की सरकार तो बनेगी ही और गोवा में भी उनकी स्थिति अच्छी रहेगा। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। अपनी इस खीझ और जनता के सामने अपनी हार की शर्म को इज्जत का रूप देने के लिए उन्होंने कहा कि मुझे जनता ने नहीं ईवीएम ने हराया है। चुनाव आयोग की मिलीभगत से मशीनों में छेड़छाड की गई है जिससे पंजाब में आप को पड़ने वाले वोट अकाली दल को ट्रांसफर हो गए। जबकि 2004 से पूरे देश में ईवीएम से ही चुनाव हो रहे हैं। दिल्ली में ही केजरीवाल को इन्ही मशीनों से 70 में से 67 सीटें मिला थी, तब उन्होंने चुनाव आयोग पर गडबड़ी करने का कोई आरोप नहीं लगाया था।

गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
क्या आप गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की बात सोच सकते हैं? नहीं ना? ऐसा वही सोच सकते हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र में भरोसा नहीं है। जैसे- आतंकवादी, नक्सलवादी। लेकिन आपकी सोच गलत है। ऐसा खुद को अराजकतावादी कहने वाले अरविंद केजरीवाल भी कर सकते हैं। केजरीवाल ने कहा था कि 26 जनवरी का उत्सव संसाधनों की बर्बादी है। जो इंसान मुख्यमंत्री रहते संविधान दिवस तक की परवाह नहीं करे, वो वाकई अराजकतावादी ही हो सकता है।

रिजर्व बैंक के कामकाज पर सवाल
नवंबर में नोटबंदी का विरोध करते हुए केजरीवाल ने रिजर्व बैंक के काम करने के तरीकों की जमकर आलोचना की और सरकार के सामने घुटने टेक कर स्वायत्तता समाप्त करने का आरोप लगाया। जिसका सोशल मीडिया में काफी मजाक भी उड़ाया गया।

सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल
29 सितम्बर 2016 को पाकिस्तान के खिलाफ सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर सवालिया निशान लगाते हुए बयान दिया कि पाकिस्तान किसी भी तरह की सर्जिकल स्ट्राइक से इंकार कर रहा है, इसलिए सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत देने चाहिए।

उच्च न्यायालय के फैसले को जनविरोधी बताना
4 अगस्त 2016 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने जब यह आदेश दिया कि उपराज्यपाल केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं और राज्य के प्रशासन में सरकार के निर्णय में उनकी सहमति आवश्यक है। इस निर्णय पर केजरीवाल के वरिष्ठ सहयोगी आशीष खेतान ने कहा की यह जनविरोधी फैसला है। इस फैसले पर उपमुख्यमंत्री और केजरीवाल के घनिष्ठ सहयोगी मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उच्च न्यायलय दिल्ली को मात्र केन्द्र शासित क्षेत्र मानता है। यदि संविधान के अनुसार दिल्ली मात्र केन्द्र शासित प्रदेश है तो इसमें संशोधन करके दिल्ली को विधानसभा के साथ केन्द्र शासित क्षेत्र क्यों बनाया गया। यदि दिल्ली में उपराज्यपाल को ही प्रशासन देखना है तो क्यों संविधान का संशोधन करके एक राज्य विधानसभा दी गई? क्यों एक चुनी हुई सरकार की व्यवस्था बनायी गई? हमलोगों को निशाना बनाया गया है क्योंकि हमलोग भ्रष्टाचार से शहर को मुक्त करना चाहते हैं। मनीष सिसोदिया ने सीधे- सीधे उच्चन्यायलय पर निशाना साधने का आरोप मढ़ दिया।


मुख्यमंत्री आवास के आसपास धारा 144 लागू करना

धरने और प्रदर्शन की राजनीति से सत्ता पर काबिज होने वाले केजरीवाल को जनता के धरने ओर प्रदर्शन से इतना डर लगने लगा कि उन्होंने 3 अगस्त 2016 को यह फरमान जारी कर दिया कि मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर धारा 144 लागू रहेगी। दूसरे ही दिन उपराज्यपाल ने इस आदेश को रद्द कर दिया। क्योंकि पुलिस कानून के तहत सीआरपीसी की धारा 144 लगाने का अधिकार डीसीपी या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारियों के पास होता है और दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल के अधीन काम करती है।

एसीबी में अपने अधिकारी को नियुक्त करना
दिल्ली पुलिस की एंटी करप्शन ब्रांच में किसी भी अधिकारी को नियुक्त करने का अधिकार दिल्ली के संविधान के तहत उपराज्यपाल के पास है। इस शक्ति का उपयोग करते हुए उपराज्पाल ने एमके मीणा को एसीबी का मुखिया बना दिया लेकिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल की इस नियुक्ति को मानने से इंकार कर दिया और अपने एक अधिकारी एसएस यादव की नियुक्ति कर दी और यह आदेश दिया कि वह केन्द्र या राज्य किसी अधिकारी के जांच के लिए स्वतंत्र है। केजरीवाल के इस आदेश को बाद में उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार कर दिया।


डीडीसीए जांच के लिए सुब्रमण्यम कमेटी का गठन

21 दिसम्बर 2015 को केजरीवाल ने दिल्ली सरकार की कैबिनेट बैठक में डीडीसीए की जांच करने के लिए एक सदस्यीय गोपाल सुब्रमण्यम कमेटी को गठन करने का फैसला लिया। यह फैसला बौखलाहट में उस घटना के बाद लिया था जिसमें उनके मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार के दफ्तर पर सीबीआई ने भ्रष्टाचार की आरोपों की जांच के छापा मारा था। जबकि संविधान के अनुसार दिल्ली सरकार उपराज्यपाल की सहमति से ही किसी भी जांच समीति का गठन कर सकती है। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केजरीवाल के इस फैसले को भी असंवैधानिक करार कर दिया।

इससे साफ होता है कि केजरीवाल को सेना, संविधान, न्यायालय किसी पर भी भरोसा नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि फिर केजरीवाल पर क्यों भरोसा किया जाए।

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