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दुनिया के सबसे सहिष्णु राष्ट्र को असहिष्णु ठहराने के पीछे क्या साजिश है?

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देश का असहिष्णुता ब्रिगेड फिर जाग उठा है। बिहार चुनाव से पहले मोदी सरकार को बदनाम करने की नीयत से तथाकथित बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों का गैंग सक्रिय हुआ था। अबकी बार कांग्रेस राज में नेताओं के साथ कई पुश्तों तक का वारा-न्यारा कर चुके मुट्ठीभर रिटायर्ड अफसरों ने छाती पीटना शुरू किया है। रोना वही है- देश में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। समाज में अशांति का वातावरण है। संविधान की भावना को आहत किया जा रहा है। लेकिन अगर इन कुटिल मानसिकता को सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देश के उदारपंथी लेखकों के विचारों की कसौटी पर कसें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूर्ववर्ती सरकारों के अहसानों से दबे असहिष्णुता गैंग की छटपटाहट का कारण क्या है ?

पूर्व नौकरशाहों का राजनीतिक स्टंट ?
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पूर्व आईएस,आईपीएस और केंद्रीय सेवाओं के 65 रिटायर्ड अधिकारी आजकल बहुत परेशान हैं। इनको इस बात का कथित रूप से डर सताने लगा है कि देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, मुसलमानों के विरोध में असहिष्णुता बढ़ रही है और बहुसंख्यकवाद का बोलवाला हो गया है। इनकी कथित पीड़ा देखिए कि इन्होंने लोक सेवकों और संवैधानिक संस्थाओं से संविधान की भावना की रक्षा की याचना कर डाली है। इन रिटायर्ड अफसरों का कथित दावा ये भी है कि उनकी खुली चिट्ठी का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है। वो तो देश में बढ़ रही कथित अशांति की भावना से घबराए हुए हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर कांग्रेसी शासन में (इमरजेंसी समेत) सत्ता सुख का आनंद ले चुके वो कौन-कौन अफसर हैं, जिनमें अभी तक संविधान की चिंता बची हुई है। 65 में से जिन चुनिंदा लोगों के नाम हम यहां पर सार्वजनिक कर रहे हैं वो हैं वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रहे जुलियो रिबेरो, प्रसार भारत के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार, योजना आयोग के पूर्व सचिव एन सी सक्सेना, ईएस शर्मा, हर्ष मंदर और अरुणा रॉय। इनमें से अधिकतर नाम वो हैं, जिनका कांग्रेस शासन में काफी दबदबा रहा है।

असहिष्णुता ब्रिगेड की दूषित मानसिकता !
इनकी मोदी विरोधी मानसिकता देखिए कि यूपी में एंटी रोमियो स्कॉयड हो या पशुओं की अवैध कटाई पर रोक इनको सब में मुसलमान विरोधी एजेंडा नजर आ रहा है। यूपी की महिलाएं जहां एंटी रोमियो स्कॉयड से स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही हैं। वहीं इन एजेंडावादी पूर्व नौकरशाहों को इस निर्णय में भी मुसलमानों को निशाना बनाए जाने की भावना नजर आ रही है। इतना ही नहीं ये लोग फ्री स्पीच के बहाने जेएनयू में सक्रिय ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ राष्ट्रविरोधी शक्तियों का भी खुलकर समर्थन करते दिख रहे हैं।

संविधान विरोधी मानसिकता वालों की नई चाल ?
संविधान बचाने का रोना रो रहे इनमें से कई अफसर इमरजेंसी के दौर में संविधान को तार-तार होने के भागी रहे हैं। लेकिन अब वो देश के टुकड़े करने वालों, माताओं-बहुनों के साथ छेड़खानी करने वालों, सरेआम गाय की हत्या करने वालों की भाषा बोलकर संविधान की आत्मा को बचाने का दंभ भर रहे हैं। ये वो लोग हैं जो सरेआम गोहत्या करने वालों, सैनिकों पर पत्थरबाजी करने वालों, सेना प्रमुख को जनरल डायर और सड़क का गुंडा कहने वालों के विरोध में कभी आवाज उठाना नहीं जानते। कालाधन और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान में जब रात के अंधरे में बुजुर्ग आंदोलनकारियों पर जब डंडे बरसाए गए तो इनकी आत्मा को तनिक भी पीड़ा नहीं हुई। क्योंकि इनकी निष्ठा शायद संविधान से कभी रही ही नहीं।

भ्रष्टाचारियों को बचाने की नई चाल ?
सबसे बड़ी बात ये है कि इन अधिकारियों में भ्रष्टाचार और कालाधन के विरोध में सरकार के निर्णयों से भी आहत हैं। ये लोग Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) और आयकर कानूनों में संशोधनों से भी परेशान हैं। इनका आरोप है कि ये सब तथाकथित सिविल सोसाइटी के लोगों को परेशान करने का माध्यम है। इन दलीलों से अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं रहा कि बढ़ती असहिष्णुता के आरोपों के बहाने ये लोग अपना कौन सा दर्द बांटना चाह रहे हैं।

भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश
भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश है, ये बात किसी राष्ट्रवादी ने नहीं कही है। ये विचार हैं सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देश के प्रख्यात उदारवादी लेखक Khalaf Al-Harbi के। उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से कहा है कि भारत धरती पर सबसे सहिष्णु देश है। उनके अनुसार तरह-तरह के धर्म के लोगों की उपस्थिति के बाद भी भारत न कभी असहिष्णु हुआ और न ही कभी हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा है कि भारत को देखकर उन्हें ईर्ष्या होती है। क्योंकि एक धर्म, एक भाषा के बावजूद मुस्लिम देशों में मारकाट मची रहती है।

ये सच्चाई है कि अगर भारतीय जनमानस में असहिष्णुता के बीज होते तो क्या सदियों-सदियों में लुटेरों के रूप में आए लोगों को भी यहां पर कभी शरण मिलती। लेकिन यही भारतीयता है। यहां लुटेरा भी आया तो उसे भी यहां पर शरण मिला। समय के साथ उन्हीं लुटेरों के वंशजों ने भारत पर शासन तक किया। सबकुछ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ सदियों से चला आ रहा है। वसुधैव कुटंबकम की संस्कृति हमें विरासत में मिली हुई है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति, गुट या कोई समूह एक एजेंडे की तहत असहिष्णुता का वातावरण दिखाने की कोशिश करे, तो बात साफतौर पर समझ में आ जाती है। क्योंकि यही भारत है जिसने ऐसे ही जयचंदों के चलते सदियों तक गुलामी झेला है। 

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