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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयास से हुआ भारत-इजरायल के बीच ‘स्वर्ग में बने रिश्ते’ का एहसास

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पिछले साल जुलाई में हुई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल यात्रा और अब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा से भारत-इजरायल के आत्मीय संबंध उभरकर सामने आ रहे हैं। भारत दौरा शुरू करने के साथ ही नेतन्याहू ने भारत-इजरायल को ‘स्वर्ग में बनी जोड़ी’ करार दिया है, तो ऐसा यूं ही नहीं हुआ है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी भूमिका है जिन्होंने दोनों देशों के बीच की समानताओं में भारत की संभावनाओं को पहचाना।

‘स्वर्ग जैसे रिश्ते पर एक वोट का असर नहीं’

देश में नेताओं और मीडिया हाउसेस का एक वर्ग यह मानकर चल रहा था कि यूएन असेंबली में येरूशलम को इजरायल की राजधानी बताने वाले अमेरिकी प्रस्ताव के विरोध में भारत के वोट देने से इजरायल से उसके संबंधों पर असर पड़ेगा।  इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस कयास को सिरे खारिज कर दिया। एक बातचीत में उन्होंने यहां तक कहा कि दोनों देशों के रिश्ते स्वर्ग में बने हैं जो महज एक वोट से नहीं डिग सकते हैं। यानी नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति में उस ईमानदारी को पहचाना है जिसके तहत भारत ने येरूशलम पर अपना रुख अपनाया था।

‘दोनों देशों के लोग और नेता के संबंध अहम’

नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल और भारत के लोगों और नेताओं के बीच का संबंध सबसे विशेष है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महान नेता बताते हुए कहा कि वह अपने देश के लोगों के भविष्य के लिए समर्पित हैं। इजरायली प्रधानमंत्री ने आशा जताई कि उनकी भारत यात्रा से प्रौद्योगिकी, कृषि और विश्व में परिवर्तन ला रहे अन्य क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध मजबूत होंगे। नेतन्याहू ने कहा कि वह खुद और प्रधानमंत्री मोदी, दोनों ही नेता अपने देशों की सुरक्षा करना चाहते हैं।

यूं ही नहीं प्रोटोकॉल तोड़कर मिलते दोनों नेता  

जिस देश और नेता के रुख को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  भारत के हित में महसूस कर लेते हैं, उस नेता से उनके लगाव का रंग स्वाभाविक रूप से जाहिर हो जाता है। कुछ ऐसा ही होता है जब वह इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलते हैं। 14 जनवरी को नेतन्याहू जब दिल्ली के पालम एयरफोर्स स्टेशन पर उतरे, तो प्रधानमंत्री मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर खुद उन्हें गर्मजोशी के साथ रिसीव किया। इससे पहले पिछले साल चार जुलाई को जब पीएम मोदी इजरायल गए थे, तब इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी इसी अंदाज में उनका स्वागत किया था। यह दोतरफा गर्मजोशी भारत-इजरायल के स्वाभाविक संबंधों को सामने लाती है।

दोनों विश्व नेताओं के लिए राष्ट्रधर्म सर्वोपरि 
प्रधानमंत्री मोदी के लिए सबसे पहले अपना राष्ट्र आता है। राष्ट्रहित में कड़े से कड़ा कदम उठाने से भी वह नहीं घबराते। पीएम मोदी के सभी भाषण चाहे वो सार्वजनिक हों या निजी, राष्ट्रीयता से भरे रहते हैं। उनकी यही सबसे बड़ी खासियत है जो इजरायल को पसंद आती है। इजरायल के लिए भी सबसे पहले राष्ट्रधर्म मायने रखता है। 

तुरंत और बड़े निर्णय लेने की क्षमता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देशहित में बड़े से बड़ा निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। भ्रष्टाचार, कालेधन और आतंकवाद के खिलाफ नोटबंदी के निर्णय ने ये साबित कर दिया कि उनके अंदर बड़े से बड़ा निर्णय लेने की गजब की क्षमता है। राष्ट्रहित में इजरायल भी तेज निर्णय लेने के लिए विश्वविख्यात है, चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला हो या फिर आतंक को कुचलने के लिए कठोर कदम उठाने का।

देश पर हमला तो कड़ा जवाब
इजरायल दुनिया का एक मात्र देश है जो अपने ऊपर होने वाली किसी भी तरह की असैन्य या किसी भी हमलावर कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देता है। जब से मोदी सरकार बनी है कश्मीर में भी आतंकियों की कमर टूट चुकी है। सितंबर 2016 के उरी आतंकी हमले के बाद पीओके में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने दुनिया को दिखा दिया कि ये भारत अब मोदी का भारत है।

 आतंक पर दोनों देशों का जीरो टॉलरेंस का रुख

प्रधानमंत्री मोदी के पिछले इजरायल दौरे के वक्त ही वहां के शीर्ष अधिकारियों ने यह साफ कर दिया था कि कश्मीर में चाहे कैसी भी परिस्थिति हो वह इस मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करेगा। यह आतंक के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी के रुख को इजरायल का एक बड़ा समर्थन था। प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व मंच पर जिस तरह से आतंक को जड़ से मिटाने की पहल की है उसने इजरायल और भारत को और करीब ला दिया है।   

दोनों देशों की संस्कृति में समानता

इजरायल और भारत में एक और खासियत है जो दोनों देशों को एक-दूसरे के समीप लाती है। अगर हम हिंदू और यहूदी संस्कृति के इतिहास पर नजर डाले तो दोनों संस्कृतियां 5 हजार साल पुरानी है और दोनों संस्कृतियों का उद्भव स्थल एशिया ही है। मौजूदा दौर में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध तो 26 साल पहले स्थापित हो चुके थे, लेकिन कांग्रेस की सरकारों के दौरान इजरायल को लेकर ढुलमुल नीति रही थी। इसके पीछे तुष्टिकरण की नीति को वजह बताया जाता रहा।

बीजेपी के दौर में ही रिश्ते की असली पहचान

पहली बार इजरायल से रिश्तों में सुधार की पहल तब दिखी जब केंद्र में वाजपेयी सरकार के दौर में तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत आए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जब इजरायल के प्रति भारत का रुख स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया तो दोनों देशों की इस जोड़ी के स्वर्ग में बनने का एहसास हुआ।

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