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पीएम मोदी के नेतृत्व कौशल से रक्षा क्षेत्र में सशक्त हो रहा भारत

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आठ जून, 2017 को आर्मी चीफ बिपिन रावत ने कहा था कि भारतीय सेना पड़ोसी देशों की किसी भी प्रकार की हिमाकत से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है और एक साथ ढाई मोर्चे (चीन, पाकिस्तान और आंतरिक सुरक्षा) पर युद्ध लड़ने की काबिलियत रखती है। आर्मी चीफ के इस बयान का मतलब क्या था यह चीन के साथ डोकलाम विवाद के सामने आने के बाद स्पष्ट तौर पर समझ आ रही है। दरअसल एक तरफ चीन तो दूसरी तरफ पाकिस्तान से सैन्य टकराव का अंदेशा है तो एक तीसरा मोर्चा भारत के आंतरिक हालात भी हैं, जहां सेना को मुकाबला करना पड़ रहा है। सेना पर लगातार राजनीतिक हमले, गोला बारूद और असलहों की कमी की बातों का प्रचार, केंद्र सरकार की कोशिशों को कमतर दिखाने की कोशिश, चीन के मुकाबले भारत को कमजोर आंकने का कुत्सित प्रयास और आंतरिक सुरक्षा के हालात बिगाड़ने की साजिश इसी तीसरे मोर्चे के संघर्ष की ओर इशारा करती है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है? क्या हमारी सेना में कमी है? क्या हमारी पूरी तैयारी नहीं है? क्या हमारी सरकार की कोशिशें नाकाफी हैं? जाहिर तौर पर ऐसे बहुतेरे सवाल हैं जो संदेह पैदा करते हैं। लेकिन सच क्या है? आइए इस रिपोर्ट के जरिये जानने का प्रयास करते हैं।

ऑपरेशन ढाई मोर्चा के लिए चित्र परिणाम

ऑपरेशन ढाई मोर्चा
आर्मी चीफ ने जब कहा था कि हमारी सेना ढाई मोर्चे पर लड़ने को तैयार है तो यह उनकी दूरदृष्टि को बताती है। दरअसल उन्हें पहले से अंदेशा था कि भारत के सामने ऐसे हालात उत्पन्न हो सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि हमारी सेना की ऐसी तैयारी भारत के दुश्मनों से निपटने के लिए ऑपरेशन 2.5 मोर्चे की शुरुआत मोदी सरकार के सत्ता संभालते ही हो गई थी। सेना प्रमुख के इस बयान से भारत की तैयारियों की आहट मिल गई है, और एक तरह से सरकार ने देश के सभी दुश्मनों को हराने का ब्लू प्रिंट जारी कर दिया है।

सेना को खरीद की छूट के लिए चित्र परिणाम

सेना को खुले हाथ
सीमा पार बैठे दोनों दुश्मनों से निपटने के लिए सरकार ने सीमित युद्ध से मुकाबले की पुख्ता तैयारी की है। इसके तहत सबसे बड़ा फैसला ये किया गया है कि उप सेना प्रमुख अब 40 हजार करोड़ के हथियार खुद खरीद सकेंगे। यानि अब उप सेना प्रमुख को 40 हजार करोड़ तक के हथियार खरीदने के लिए सरकार से हरी झंडी मिलने का इंतजार नहीं करना होगा। उन्हें इसके लिए न तो रक्षामंत्री से मंजूरी की जरूरत होगी, न ही सेना मुख्यालय और कैबिनेट के फैसले का इंतजार करना होगा। जाहिर तौर पर सरकार के इस फैसले से सेना की ताकत कई गुना बढ़ गई है। सेना को मिली छूट से इस साल मार्च तक 19 बड़े रक्षा सौदे किए, जिसमें 11 गोला बारूद के लिए किए गए।

सेना और मोदी के लिए चित्र परिणाम

सीएजी रिपोर्ट पर संज्ञान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही सबसे पहले सेना को सशक्त करन का जिम्मा उठाया है। इसके तहत सेना को गोला बारूद की कमी न हो इसके लिए कई देशों से समझौते किए हैं और चरणबद्ध तरीके से इसकी आपूर्ति सुनिश्चित की गई है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2013 में जो हालात थे उसके तहत सेना के पास गहन युद्ध के समय के लिए 10 दिन का भी गोला बारूद नहीं था, लेकिन सितंबर 2016 तक की स्थिति में सुधार है और हालात अब गहन युद्ध के समय 20 दिन तक गोला बारूद की कमी नहीं होने तक आ गए हैं। दरअसल सरकार सोचती है कि चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हों तो गोला-बारूद का भंडार हर वक्त पूरा रहना चाहिए ताकि युद्ध होने पर 40 दिन तक मुकाबला किया जाए सके। 2019 तक इन आपूर्ति को 40 दिनों तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है।

मोदी जिनपिंग के लिए चित्र परिणाम

मजबूत चीन के सामने सशक्त भारत
1962 के युद्ध के समय भारत सामरिक और रणनीतिक रूप से मजबूत था, बावजूद इसके भारतीय सेना चीन से हार गई। जाहिर तौर पर नेतृत्व की कमी की एक बड़ी भूमिका रही लेकिन तथ्य दूसरे भी हैं। हमारे सैनिक न तो आवश्यक हथियार से सुसज्जित थे, न ही खतरनाक पहाड़ी इलाके में जरूरी नक्शे थे। एयरफोर्स की क्षमता काफी थी लेकिन इसका इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका। लेकिन भारत ने अब इन तीनों क्षेत्रों में मजबूती हासिल की है। भारत के पास सशक्त नेतृत्व के साथ मजबूत सेना है। वायु सेना की ताकत उसके मिसाइल सिस्टम से काफी बढ़ गई है वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में थल सेना के पहुंचने के लिए बुनियादी ढांचा भी तैयार किया जा रहा है।

73 सड़कों का निर्माण के लिए चित्र परिणाम

73 सड़कों का निर्माण
बीते हफ्ते केंद्र सरकार ने संसद में बयान दिया था कि मोदी सरकार आने के बाद भारत-चीन सीमा से लगीं 73 में से 27 सड़कों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और बाकी सड़कों के 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा। दरअसल 1999 में कारगिल युद्ध में हमारे 537 सैनिक शहीद हुए थे जिसमें यह कमी निकलकर आई कि हमारे सैनिकों के पास न तो बर्फबंदी वाले इलाके के लिए अपेक्षित कपड़े और जूते थे और न ही सेना के लिए दुश्मनों को ठिकाने लगाने वाली जगहों तक पहुंच के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण था। कारगिल एक ऐसी लड़ाई ऐसी थी जिसमें भारत को पता ही नहीं चला कि दुश्मन कब सिर पर आ बैठा। जाहिर तौर पर पर सेना की आवश्यकताओं के मद्देनजर भारत सरकार ने इन बुनियादी जरूरतों और ढांचों के निर्माण में तेजी दिखाई है।

सेना को खरीद की छूट के लिए चित्र परिणाम

रक्षा क्षेत्र में 100% FDI
20 जून 2016 को भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी। सरकार ने ये मंजूरी रक्षा और एविएशन के क्षेत्र में 100 फीसदी दी थी। जिसके बाद विदेशी कंपनियां भारत में कारखाने लगाने के लिए आगे आनें लगी हैं। इतना ही नहीं सरकार के इस फैसले से रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ को सफलता मिली है। जाहिर तौर पर मोदी सरकार के इस फैसले से भारत ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन रहा है।

भारत बनेगा मैन्यूफैक्चरिंग हब
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत में ज्यादा से ज्यादा विदेशी निवेश और उत्पादन पर जोर दे रहे हैं। उनकी इस मुहिम में देश-विदेश की नामी-गिरामी कंपनियां जुड़ती चली जा रही हैं। अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन को यदि भारत में एफ-16 विमान बनाने की अनुमति मिल गई तो भारत एफ-16 विमानों के रखरखाव का ग्लोबल हब भी बन सकता है। लॉकहीड मार्टिन के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर केओकी जैक्सन ने दिल्ली में बताया कि यदि हमें अनुमति मिली तो हम टाटा के साथ मिलकर भारत में एफ-16 के ब्लॉक 70 का निर्माण करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस वक्त दुनिया में करीब 3000 एफ-16 विमान हैं। भारत इनकी सर्विसिंग का केंद्र भी बन सकता है।

भारत में निर्माण और दुनिया भर में निर्यात
इससे पहले बीते जून में एफ-16 फाइटर प्लेन भारत में बनाने के लिए अमेरिका की एयरोस्पेस कंपनी लॉकहीड मार्टिन और टाटा समूह के टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के बीच समझौता हुआ था। दरअसल लॉकहीड मार्टिन ने अपने युद्धक विमान एफ-16 के अत्याधुनिक संस्करण एफ-16 ब्लॉक-70 की मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट टेक्सास से भारत ट्रांसफर करने का इरादा रखता है। उसका इरादा भारत से ही इन विमानों की स्थानीय और वैश्विक मांग को पूरा करना है। 

एफ-16 की क्षमता है बेजोड़
एफ-16 लड़ाकू विमानों को इंडियन एयरफोर्स में शामिल किया जाएगा या नहीं, ये बाद में तय होगा। क्योंकि एफ-16 का इस्तेमाल पाकिस्तान भी करता है। हालांकि एफ-16 विमान दुनिया चौथी पीढ़ी के विमानों में सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। एफ-16 मैक 1.2 की गति से उड़ता है और दुनिया के तमाम युद्धक्षेत्रों में अपनी उपयोगिता साबित कर चुका है।

मेक इन इंडिया के दो युद्धपोत
अभी तक सरकारी शिपयार्डों में ही युद्धपोतों के स्वदेशीकरण का काम चल रहा था। लेकिन देश में पहली बार नेवी के लिए प्राइवेट सेक्टर के शिपयार्ड में बने दो युद्धपोत पानी में उतारे गए हैं। रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड ने मंगलवार (25 जुलाई) को गुजरात के पीपावाव में नेवी के लिए दो ऑफशोर पैट्रोल वेसेल (OPV) लॉन्च किए, जिनके नाम शचि और श्रुति हैं।

रक्षा क्षेत्र में उलब्धियां

  • 2 साल में 60 प्रतिशत से ज्यादा पूंजीगत खर्च भारतीय कंपनियों पर खर्च किया गए हैं।
  • 3 साल में भारतीय विक्रेताओं से खरीद पर 1.05 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय।
  • भारतीय कंपनियों को 2.46 लाख करोड़ रुपये के 96 बड़ी खरीद को स्वीकृति।
  • रक्षा हथियार उत्पादन के लिए मेक इन इंडिया के तहत 116 इंडस्ट्रियल लाइसेंस जारी किये जा चुके हैं।
  • ऑटोमेटिक रूट द्वारा 49 प्रतिशत तक FDI की स्वीकृति मिली।

डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी जल्द
घरेलू रक्षा विनिर्माण के लिए नीति बनाने का काम बहुत तेजी से चल रहा है। इस नीति से डिफेंस क्षेत्र में मैन्यूफैक्चरिंग को प्रोत्साहन मिलने के साथ ही बड़े-बड़े फाइटर जेट्स, युद्धक जहाज और पनडुब्बियों का भी भारत में निर्माण संभव हो सकेगा और आयात पर होने वाले खर्च में भारी कमी आएगी। इस समय भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियारों का आयातक है। देश अपने जीडीपी का 1.8 प्रतिशत हथियारों पर खर्च करता है, क्योंकि वो अपने 70 प्रतिशत रक्षा उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है। मोदी सरकार इसी स्थिति में बदलाव लाना चाहती है।

मेक इन इंडिया की पहल
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। यही नहीं रक्षा के क्षेत्र में सबसे अधिक खर्च करने वाले देश में भारत का स्थान छठा है। भारत परंपरागत रक्षा उपकरणों का सबसे बड़े आयातक देशों में शामिल है। ये अपने कुल रक्षा बजट का करीब 30 प्रतिशत इसपर खर्च करता है। मैन्युफैक्चरिंग में स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए मेक इन इंडिया के तहत पहल की गई है।

स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस
इसका लक्ष्य रक्षा के क्षेत्र में विदेशों पर से निर्भरता खत्म करने की है। पिछले कुछ सालों में इसका बहुत ही अधिक लाभ भी मिल रहा है। रक्षा मंत्रालय ने भारत में निर्मित कई उत्पादों का अनावरण किया है, जैसे HAL का Tejas (Light Combat Aircraft), composites Sonar dome, Portable Telemedicine System (PDF),Penetration-cum-Blast (PCB), विशेष रूप से अर्जुन टैंक के लिए Thermobaric (TB) ammunition, 95% भारतीय पार्ट्स से निर्मित वरुणास्त्र (heavyweight torpedo) और medium range surface to air missiles (MSRAM).

Buy and Make (Indian)
भारत में बनाओ और भारत में बना खरीदो, इस नीति के तहत रक्षा मंत्रालय ने 82 हजार करोड़ की डील को मंजूरी दी है। इसके अतर्गत Light Combat Aircraft (LCA), T-90 टैंक, Mini-Unmanned Aerial Vehicles (UAV) और light combat helicopters की खरीद भी शामिल है। इस क्षेत्र में MSME को प्रोत्साहित करने के लिए कई सुविधाएं दी गई हैं।

नीतिगत पहल और निवेश
रक्षा उत्पादों का स्वदेश में निर्माण के लिए सरकार ने 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी हुई है। इसमें से 49 प्रतिशत तक की FDI को सीधे मंजूरी का प्रावधान है, जबकि 49 प्रतिशत से अधिक के FDI के लिए सरकार से अलग से मंजूरी लेनी पड़ती है।

रक्षा क्षेत्र में निर्यात
वित्त वर्ष 2015-16 में कुल रक्षा निर्यात 2059 करोड़ से भी अधिक हुआ था, जबकि 2014-15 में ये आंकड़ा 1682 करोड़ रुपये का रहा था। भारत में बने इन रक्षा उत्पादों का निर्यात 28 से अधिक देशों में किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम और ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के द्वारा जो कुछ बड़े रक्षा उपकरणों का निर्यात किया गया वो हैं- पेट्रोल वैसल्स, हेलीकॉप्टर एवं उसके पार्ट्स, सोनार एवं राडार, राडार वॉर्निंग रिसिवर्स (RWR), छोटे हथियार, हल्के इस्तेमाल बाले गोलाबारूद, ग्रेनेड और संचार उपकरण।

रक्षा उत्पादों के निर्यात के लिए विशेष रणनीति
इसके तहत रक्षा उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और संस्थागत व्यवस्था तय की है। इसके अंतर्गत विदेश व्यापार नीति के तहत गाइडलाइंस तय किए गए हैं। जिसमें निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विदेशों में भारतीय दूतावासों और उच्चायोगों से सहयोग लेने की व्यवस्था है।

रक्षा उत्पादों के लिए मेक इन इंडिया पोर्टल
इस पोर्टल की मदद से रक्षा क्षेत्र में उत्पादन करने की इच्छुक कंपनियों को नीतिगत और प्रक्रिया से जुड़ी सभी तरह की जानकारी मिलती है। यही नहीं उन्हें इसका भी पता चलता है कि वो जांच सुविधाओं के लिए रक्षा संगठनों से जुड़े किस यूनिट की मदद ले सकते है। ये पोर्टल निवेशकों को इससे जुड़ी तमाम जानकारियां उपलब्ध कराता है।

स्किल डेवलपमेंट
इसके तहत 8 ITI का चुनाव किया गया है जो रक्षा उत्पाद के क्षेत्र में अपनी संरचना का विस्तार करने के लिए ट्रेनिंग के स्तर को सुधार सकते हैं। इसके लिए रक्षा संगठन उन्हें ट्रेनिंग के लिए आवश्यक विशेष उपकरण भी उपलब्ध कराते हैं।

मोदी सरकार डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में भारत को एक बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर तैयार करने की ओर अग्रसर है। सरकार की मंशा है कि न्यू इंडिया में देश रक्षा उत्पादों के क्षेत्र में न सिर्फ आत्मनिर्भर बने, बल्कि वो उसका नाम दुनिया के एक बहुत बड़े निर्यातक के तौर पर उभर कर सामने आए। यही वजह है कि सरकार ने 2025 तक हथियारों और रक्षा उपकरणों पर 250 अरब डॉलर खर्च करने की योजना तैयार की है।

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