Home समाचार नीतीश-लालू-तेजस्वी-कांग्रेस की नौटंकी कब तक झेलेगा बिहार?

नीतीश-लालू-तेजस्वी-कांग्रेस की नौटंकी कब तक झेलेगा बिहार?

बिहार की राजनीति नौटंकी क्यों बनती जा रही है? एक रिपोर्ट

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बिहार में तेजस्वी पर तकरार और सियासी रार अभी जारी है। नीतीश कुमार अपनी बात पर अड़े हैं तो लालू प्रसाद के तेवर भी तल्ख हैं… लेकिन सियासी खींचतान के बीच हकीकत ये है कि महागठबंधन की सरकार अभी बरकरार है। एक तरफ नोटबंदी, जीएसटी और राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के साथ खड़े नीतीश की चौंकाती, भरमाती राजनीति है… तो दूसरी तरफ मोदी विरोध की राजनीति को हवा देते रहने वाली लालू प्रसाद की मजबूरी वाली पॉलिटिक्स है। इस गठबंधन की तीसरी कड़ी भी है, कांग्रेस। कांग्रेस चाहती तो है कि वह बिहार की सियासत में संतुलन भूमिका निभाए, लेकिन यह भी सत्य है कि नीतीश-लालू की बेमेल जोड़ी को बैलेंस करने में वह कामयाब नहीं हो पा रही है। बहरहाल ये क्या हो रहा है… ये क्यों हो रहा है… कब तक चलेगा… ये तो संबंधित पक्ष को पता होगा। लेकिन आप इसे सत्ता का संघर्ष, कुर्सी का मोह, सियासत का खेल… जैसे, जो चाहे नाम दे दें… पर बिहार में ये जो कुछ चल रहा है… है तो असल में ‘सियासी नौटंकी’।

नौटंकी नंबर-1
बिहार में राजनीति की बड़ी नौटंकी तब देखने को मिली जब शनिवार को वर्ल्ड स्किल कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को एक मंच पर साथ आना था, लेकिन डिप्टी सीएम नहीं आए। पहले तो आयोजक और अधिकारी भी कन्फ्यूज दिखे कि आखिर क्या हो रहा है? मंच पर नीतीश के साथ बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की भी नेमप्लेट थी। विवादों के बीच पहली बार दोनों सार्वजनिक मंच पर एक साथ दिखते। तेजस्वी का नेमप्लेट भी लगा था, लेकिन ऐन वक्त पर पहले इसे आधा ढक दिया गया। जैसे ही नीतीश पहुंचे, तेजस्वी के ना आने का संकेत मिला तो अधिकारियों ने तेजस्वी का नेमप्लेट को हटा दिया।

नौटंकी नंबर-2
शुक्रवार को खबरें आईं कि बिहार में महागठबंधन को बचाने के लिए सोनिया गांधी सामने आई हैं। उन्होंने नीतीश-लालू दोनों से बात की है। लेकिन शाम होते-होते लालू ने इस बात को खुद ही हवा में उड़ा दिया। उल्टा दावा किया  कि न सोनिया गांधी से बात हुई है, न तेजस्वी इस्तीफा देंगे और न ही महागठबंधन टूटेगा। लेकिन विरोधाभास देखिये, लालू प्रसाद के दावे से इतर नीतीश कुमार की पार्टी के कई प्रवक्ताओं ने साफ-साफ कह दिया है कि तेजस्वी के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है। जाहिर है जेडीयू-आरजेडी का टकराव बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन ये भी सही है कि पीएम मोदी के विरोध की राजनीति के नाम पर इकट्ठा हुआ कुनबा, अब मोदी समर्थन और विरोध की बुनियाद पर ही बिखरता नजर आ रहा है।

नौटंकी नंबर-3
सोशल मीडिया पर आजकल एक वाक्य खूब चर्चा में है, ”एक ने बिना पूंछ के चारा खा डाला, दूजे ने बिना मूंछ के ही घोटाला कर डाला।” जाहिर है चारा खाने या घोटाला करने के लिए मूंछ या पूंछ की जरूरत नहीं, सत्ता की जरूरत होती है। यही सत्ता है जो कभी नीतीश के पेट में दांत देखने वाले को उनके करीब ले आती है, यही सत्ता है जो कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले जयप्रकाश नारायण के चेले लालू प्रसाद कांग्रेस की गोद में बैठ जाते हैं। जाहिर है सब जानते हैं कि सिद्धांत और उसूल की दुहाई सिर्फ जनता को भरमाने के लिए है, सत्ता की सीढ़ी बनाने के लिए है। बहरहाल इतना तो तय हो गया है कि उसूलों और सिद्धांतों से इतर लालू प्रसाद ने बदलते सामाजिक परिवर्तनों को अच्छे से पढ़ा है और अर्थ का महत्व भी खूब जान लिया है। शायद यही कारण है कि लालू कुनबा सत्ता से चिपके रहने के लिए कुछ भी करेंगे।

नौटंकी नंबर-5
अभी दो साल ही हुए हैं महागठबंधन बने हुए, लेकिन इस तरह की तल्खी सामने आना तो कुछ और ही कहानी कहती है। बहरहाल शहाबुद्दीन से जेल में बात करने के टेप लीक होने से लेकर घोटाले में लालू एंड फैमिली के घिरने तक, सब में खूब ड्रामेबाजी हुई है। कभी सुशासन का प्रतीक नीतीश कानून व्यवस्था को लेकर जनता के कठघरे में खड़े दिखे, तो कभी कुशासन का प्रतीक रहे लालू प्रसाद की सत्ता के गलियारों में धमक पर सवाल उठते रहे। जाहिर है नीतीश के लिए ये सहज स्थिति नहीं रही है। ऐसे में बिहार की जनता सुशासन और कुशासन के बीच खुद को फंसा हुआ महसूस करने लगी है।

नौटंकी नंबर-6
नीतीश कुमार की छवि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की रही है। लेकिन लालू प्रसाद के साथ राजनीतिक संबंध फिर से स्थापित होने के साथ ही भ्रष्टाचार को लेकर उनपर सवाल उठने लगे। दरअसल चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू प्रसाद सत्ता से सीधे नहीं जुड़े हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में लालू की हेकड़ी ही चला करती है। आईजीआईएमएस के डॉक्टरों का अपने आवास में ड्यूटी लगवाना हो, या फिर पुलिस महकमे में तबादले का ‘धंधा’, सब में लालू का दखल देखा जाने लगा। जाहिर है नीतीश कुमार को ये नागवार गुजर रहा है, लेकिन सत्ता को साधने में वे इससे भी आंखे मूंदे बैठे रहे।

नौटंकी नंबर-6
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो खबर यह है कि लालू प्रसाद अपनी बेटी रोहिणी का नाम डिप्टी सीएम पद के लिए सामने कर सकते हैं। रोहिणी का नाम अभी तक किसी घोटाले में नहीं आने की वजह से वो डिप्टी सीएम पद की प्रबल दावेदार मानी जा रही हैं। अगर ऐसा होता है तो असल दुविधा तो नीतीश के सामने होगी। नीतीश कभी यह नहीं चाहेंगे कि जिसका राजनीति से कहीं दूर-दूर का नाता नहीं है, वह उनकी बराबरी में बैठे। इतना ही नहीं नीतीश पर समझौतावादी होने का आरोप भी तो लगना तय माना जा रहा है। ऐसे में बिहार की राजनीति में क्या बदलने वाला है इसका तो बस इंतजार ही करना पड़ेगा… अगर कुछ नहीं बदला तो ये नौटंकी तो चालू है ही।

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