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हरतोष सिंह बाल की Hate-Mongering की पत्रकारिता

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देश के संविधान की दुहाई देने वाले पत्रकार आज स्वयं ही नफरत की भाषा बोल और लिख रहे हैं। अपने को उदारवादी और आधुनिक मानने वाले इन पत्रकारों का गिरोह एक खास एजेंडे को चलाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। इन Hate-mongers पत्रकारों के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होते हैं। हरतोष सिंह बाल भी एक ऐसे पत्रकार हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ Hate-mongering की पत्रकारिता करते हैं।

हरतोष सिंह बाल, पूर्व में ओपन पत्रिका के संपादक रह चुके हैं, आजकल The Caravan पत्रिका के संपादक हैं। हरतोष के लेखों और Tweets में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति सिर्फ और सिर्फ नफरत ही दिखाई देती है। हरतोष सिंह बाल जैसे पत्रकार प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नफरत और घृणा के भाव के साथ पत्रकारिता करते हैं। क्या ऐसा करना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध नहीं है? जी हां ऐसा करना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है, लेकिन ये गिरोह इसे उदारवादी और आधुनिक सभ्यता का मापदंड मानता है। आइए, आपको हरतोष सिंह बाल की Hate-mongering की पत्रकारिता के कुछ तरीकों से परिचित करवाते हैं-

Hate-mongering की पत्रकारिता- 1 हरतोष सिंह बाल ने 14 फरवरी को एक Tweet से यह स्पष्ट कर दिया कि वह प्रधानमंत्री मोदी से क्यों नफरत करते हैं, और किससे लगाव रखते हैं। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ तथ्यों का उल्लेख करके यह स्पष्ट किया था कि प्राचीन भारत में प्रजातंत्रिक व्यवस्था कैसे काम करती थी। प्रधानमंत्री मोदी का यह उल्लेख हरतोष के गले नहीं उतरा, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का योगदान कम हो रहा था। हरतोष के इस Tweet को पढ़कर आपको यह समझ में आ जाएगा कि हरतोष Hate-mongering की पत्रकारिता क्यों करते हैं-

Hate-mongering की पत्रकारिता-2 9 फरवरी को हरतोष ने एक Tweet के जरिए पूरी तरह से साफ कर दिया कि उनकी पत्रकारिता में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति इतनी Hate-mongering क्यों होती है? आप भी उस Tweet को पढ़कर यह समझिए की तर्कहीन रुप से किसी के उद्धरण को हरतोष बाल अपना उत्तर सही ठहराने के लिए कैसे प्रयोग करते हैं-

Hate-mongering की पत्रकारिता-3  प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ हरतोष बाल किस हद तक Hate-mongering कर सकते हैं, इसका पता उनके 8 फरवरी के Tweet से लगता है। संसद में भाषण के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने तीन तलाक पर अपराध की सजा के तर्क को समझाते हुए कुछ तर्क दिए थे। ये सारे ही तर्क सही थे, लेकिन हरतोष को जब यह नहीं सूझा कि कैसे इस तार्किक सोच को अनुचित ठहराया जाए, तो उन्होंने नफरत से भरे हुए भावों के साथ Tweet पर लिखा-

Hate-mongering की पत्रकारिता-4 4 फरवरी को हरतोष बाल ने Twitter पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ जो कुछ लिखा उससे घटिया और नफरत फैलाने वाली बात नहीं लिखी जा सकती है। 4 फरवरी के इस Tweet को पढ़कर किसी भी सभ्य व्यक्ति को शर्म तो आ सकती है, लेकिन हरतोष को शर्म नहीं आती है।

Hate-mongering की पत्रकारिता-5 हरतोष बाल के मन में प्रधानमंत्री मोदी के प्रति इतनी नफरत भरी है कि 4 फरवरी के Tweet में भद्दे शब्दों में, ऐसा कुछ लिखा, जो सिर्फ अपने को आधुनिक और उदारवादी कहने वाला हरतोष बाल जैसा व्यक्ति ही लिख सकता है। आप भी हरतोष के इस Tweet को देखिए-

Hate-mongering की पत्रकारिता-6 1 फरवरी को राजस्थान में हुए उपचुनावों के परिणाम आने पर हरतोष बाल जैसे एजेंडा पत्रकारों को प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करने का मौका मिला। इस मौके पर हरतोष ने बड़ी ही बचकानी बातों से अपनी नफरत को Twitter पर उजागर किया-

Hate-mongering की पत्रकारिता-7 5 फरवरी के Tweet में हरतोष बाल ने जिस तरीके से दिल्ली में युवक अंकित की मौत पर उठे सवाल का जवाब दिया, उससे यह समझने में कोई कसर नहीं रह जाती है कि हरतोष जैसे उदारवादी और आधुनिक पत्रकार मौतों पर किस तरह की पत्रकारिता करते हैं। इस Tweet को पढ़कर, ऐसी पत्रकारिता पर शर्म आती है-

Hate-mongering की पत्रकारिता-8 जम्मू कश्मीर के सुंजवां सैनिक कैंप पर हुए आतंकी हमले को लेकर 11 फरवरी के Tweet में हरतोष ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अमर्यादित और तर्कहीन रुप से परिस्थितियों को पेश करते हुए, नफरत की आवाज पैदा की। इस नफरत पैदा करने वाले Tweet को देखिए-

Hate-mongering की पत्रकारिता-9 अब हरतोष बाल के 9 फरवरी के Tweet को देख कर लगता है कि इनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है। स्वयं नफरत के बीज बोने वाले हरतोष बाल जैसे लोग, समाज को आधुनिकता और उदारवादिता का पाठ पढ़ाने का दम भरते हैं-

Hate-mongering की पत्रकारिता-10 हरतोष जो अपने को आधुनिक और उदारवादी पत्रकार मानते हैं, उनके 2 फरवरी के Tweet को पढ़कर लगता है कि अधकचरे तथ्यों के आधार पर किसी व्यक्ति या योजना पर शंका करना इनकी सोच का हिस्सा है। आयुष्मान भारत पर अभी सरकार ने खर्च के कोई आंकड़े नहीं दिए हैं, लेकिन हरतोष जैसे पत्रकारों ने अपने गणित से इसे कोसने का मौका नहीं छोड़ा।

देश में यदि हरतोष सिंह बाल जैसे आधुनिक और उदारवादी पत्रकारों का गिरोह, प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ लिखना और बोलना अपनी पत्रकारिता का मकसद समझता है, तो वह दिन बहुत दूर नहीं है जब पत्रकारिता पर से देशवासियों का विश्वास पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।

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