Home तीन साल बेमिसाल सरकारी संस्थानों की नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता- मोदी सरकार की नीति

सरकारी संस्थानों की नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता- मोदी सरकार की नीति

शिक्षण संस्थानों में विपक्ष की 'डर्टी पॉलिटिक्स' का सटीक विश्लेषण

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तीन साल पहले केंद्र की सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने सरकारी संस्थानों में निष्पक्ष और पारदर्शी नियुक्तियों पर जोर दिया। इससे उस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की गई..जिसमें भाई-भतीजावाद से लेकर मन मुताबिक विचारधारा के लोगों की नियुक्ति की जाती थी। कम से कम 60 वर्षों तक इस देश ने देखा कि किस तरह कई बार आवश्यक योग्यताओं की शर्तों को ताक पर रखकर किसी खास व्यक्ति को सिर्फ उस पार्टी की विचारधारा का हिमायती होने के कारण ही बड़ा पद दे दिया जाता था।

खतरनाक परंपरा को किया खत्म
पिछली सरकार में नियुक्ति की खतरनाक परंपरा कायम कर दी गई थी। जिसके चलते शिक्षण-प्रशिक्षण समेत कई सरकारी संस्थानों में छात्रों या प्रशिक्षणार्थियों में जहर भरने का काम सुनियोजित तरीके से चलता था। ऐसे तमाम पदों पर आसीन लोग अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर इस तरह की गतिविधियों या फैसलों पर ज्यादा जोर देते थे..जिनसे दूसरी विचारधारा के नेताओं या पार्टियों में खुन्नस पैदा हो। लेकिन मोदी राज में वो धंधा समाप्त कर दिया गया। दरअसल पिछले तीन साल में जिस भी सरकारी संस्थान में नए प्रमुख बने हैं वो उस पद के लिए आवश्यक योग्यताओं को पूरा करने के साथ बने हैं..अच्छी बात तो ये है कि इसमें उन चेहरों को भी मौका मिल रहा है जिन्हें काबिलियत रखने के बावजूद सिर्फ इसलिए मौका नहीं दिया जा रहा था क्योंकि अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा के चलते साठ वर्षों तक सत्ता में रही पार्टी के राजनीतिक मानदंडों पर वो खरा नहीं उतरते थे।

पहले पारदर्शिता नहीं, खास विचारधारा को मिलती थी अहमियत
पिछले शासन के दौरान ऐसे चेहरों और नामों की कमी नहीं जिन्हें खास पद देने के पीछे उनकी योग्यताओं का मान करना कम, उनका कांग्रेस या लेफ्ट की विचारधारा से जुड़ा होना ज्यादा महत्वपूर्ण रहा। क्या नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन वामपंथी विचारधारा के समर्थक नहीं होते तो उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का चांसलर बनाया गया होता? फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया-FTII में संतोष सिवन, पल्लवी जोशी और जान्हवी बरुआ को एक खास विचारधारा के हिमायती होने के चलते ही उसका सदस्य बनाया गया था। गोपालकृष्ण गांधी को इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज-IIAS का चेयरपर्सन या फिर प्रवीण सिंक्लेयर को NCERT का निदेशक किसी खास आइडियोलॉजी के होने के चलते ही बनाने की बात होती रही है। 

विचार के चलते इतिहास को भी तोड़ा-मरोड़ा गया था !

यही नहीं बीएचयू के वाइस चांसलर के रूप में जिन चेहरों की पिछली सरकारों के दौरान नियुक्ति हुई थी..उनका राजनीतिक झुकाव भी किसी से छुपा है क्या? एमएल धर हों या हरि नारायण, आरपी रस्तोगी हों या सीएस झा सब किसी ना किसी खास विचारधारा से जुड़े रहे थे। पिछली सरकारों में इतिहासकार डीएन झा या रोमिला थापर की विचारधार किसी से छिपी नहीं रही है। अपनी विचारधारा के चलते उनपर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर इतिहास लेखन के भी आरोप लग चुके हैं। 

‘सेकुलर’ के नाम पर सियासी धंधा अब भी चालू!
ऐतिहासिक तथ्य ये है कि धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज्म के नाम पर ज्यादातर पार्टियां और नेता असल में छलावा ही करते आए हैं…और ये धंधा अभी भी चल रहा है। लेकिन कहते हैं ना ये तो पब्लिक है…सब जानती है…वोट बैंक की इस सियासत को आज लोगों ने पकड़ लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा समावेशी नीति पर जोर देते रहे हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ उनके विकासवादी नीति की आत्मा में बसता है। पीएम मोदी जब भी बात करते हैं सवा सौ करोड़ देशवासियों की बात करते हैं…यानी उनकी सरकार का हर कदम राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर है..और इसमें देश की पूरी जनसंख्या का भी हित है।

शिक्षण संस्थानों में कौन भड़काता है आग?
9 फरवरी 2016 जेएनयू परिसर में क्या हुआ था, ये सब जानते हैं। जिस भारत मां की रक्षा में सीमा पर हमारे सैनिक जान देने में परवाह नहीं करते उस भारत मां के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाये जाते हैं। ये किसे गवारा हो सकता है और इसे बर्दाश्त करना क्या देशद्रोह के समान नहीं? शिक्षण संस्थाएं देश के भविष्य निर्माण के लिए हैं, देश की एकता और अखंडता के लिए शिक्षा देने की जगह होती हैं ये। वहां भारत के विभाजन के नारों का गूंजना क्या किसी सच्चे देशभक्त को रास आ सकता है? क्या भारत में रहकर पाकिस्तान परस्त होना संगीन जुर्म नहीं? आजादी का मतलब उद्दंडता नहीं … लेकिन जनता सब कुछ जानती है, उन्हें पता है कि पीएम मोदी के रहते ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों की दाल गलने वाली नहीं है। 

देशद्रोहियों को अहमियत देने का क्या मतलब ?
जेएनयू में भारत विरोधी नारों पर देशवासियों का गुस्सा अभी थमा भी नहीं था कि उसके ठीक एक वर्ष बाद उसी तर्ज पर दिल्ली यूनिवर्सिटी को देशद्रोही गतिविधियों से सुलगाने की कोशिश की गई। जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने के आरोपियों में से एक उमर खालिद को दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में आने का न्योता दिया जाना क्या जान-बूझकर आग भड़काना नहीं था? क्या उमर को बुलाने वाले देशद्रोह को बढ़ावा नहीं दे रहे? क्या शिक्षण संस्थानों में ऐसी हरकत होनी चाहिए जो पढ़ाई की जगह विवाद-हंगामा और तनाव को बढ़ावा देने वाली हो…जिसमें देश की भावनाओं को भड़काने के सोचे-समझे प्रयास हों?

देश विरोधियों के खिलाफ सरकार का रुख सख्त

केंद्र की मोदी सरकार ने अपना ये रुख साफ कर दिया है कि शिक्षण संस्थानों में सिर्फ पढ़ाई की बात होगी…शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी की बात होगी और उसे किसी भी हाल में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाएगा। सरकार के इस रुख ने उन नेताओं को, पार्टियों को या फिर उनसे जुड़े संगठनों पर शिकंजा कस दिया है जो शिक्षा स्थलों पर छात्रों का इस्तेमाल कर अपने-अपने मतलब की राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे हैं। 

अपनी करनियों से ही अपना अस्तित्व खो रहा है विपक्ष
दरअसल मोदी सरकार की उपलब्धियों के साये में कई नेता अंधेरे में खो चुके हैं और अब उनके पास राजनीति में करने को कुछ बचा नहीं है। कई ऐसे नेता है जिनका असली खेल जनता को समझ में आने लगा है और इसी वजह से वो अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सबने कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का हाल देखा। कभी लगातार यूपी पर राज करने वाली कांग्रेस को 403 में से 8 सीटें मिलीं, वहीं ये परिणाम यूपी में वामपंथी पार्टियों के अस्तित्व खत्म होने पर मुहर लगा गया। लेफ्ट पार्टियां 403 में से 105 सीटों पर चुनाव लड़ी थीं, इन तमाम 105 सीटों को मिलाकर उनके खाते में महज एक लाख के करीब वोट गए। क्या इसके बाद और कुछ बताने की जरूरत भी बच जाती है लेफ्ट पार्टियों के बारे में। राष्ट्रहित में मोदी सरकार के बढ़ते कदमों से जलन की आग में ये पार्टियां उन इक्के-दुक्के राज्यों में भी भस्म हो जाएंगी…जहां थोड़ा बहुत समर्थन उन्हें अब तक मिला हुआ है। 

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