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नेहरू-गांधी परिवार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाए ‘पहरे’!

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”एक स्वतंत्र प्रेस एक जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला है। हम सभी प्रकारों के प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को कायम रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। 125 करोड़ भारतीयों की कौशल, ताकत और रचनात्मकता दिखाने के लिए हमारी मीडिया का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जा सकता है। मीडिया का मुख्य कार्य बेजुबानों को जुबान देना है।”


16 नवंबर, 2017 को राष्ट्रीय प्रेस दिवस (National Press Day) पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिए इस संदेश से समझा जा सकता है कि वे प्रेस की स्वतंत्रता की कितनी बड़ी ताकत मानते हैं और इसके प्रति कितने संवेदनशील हैं।

हालांकि हमारे सामने ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाले शासन की सच्चाई भी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 18 मार्च, 2018 को पार्टी के 84वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता की बात की और कहा, ”प्रेस के लोग डरे हुए हैं, सुप्रीम कोर्ट के जजों को न्याय के लिए मीडिया के सामने आना पड़ा।”

राहुल गांधी की बातों में कितनी सच्चाई है, इस बात को लेकर हमने पड़ताल करनी शुरू की। सबसे पहले मन में प्रश्न उठे कि कांग्रेस जो कह रही है क्या वही सत्य है? क्या वाकई में कांग्रेस प्रेस की आजादी के लिए चिंतित है या फिर इसे एक ‘चुनावी टूल’ के तौर पर इस्तेमाल कर रही है? हमारी पड़ताल में जो हकीकत सामने आई वे बेहद चौंकाने वाले हैं।

दरअसल कांग्रेस के शासनकाल में प्रेस की स्वतंत्रता पर कई बार कुठाराघात किए गए। विशेषकर नेहरू-गांधी परिवार ने प्रेस की स्वतंत्रता का दमन करने के लिए कभी कानून बनाकर तो कभी आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाया।

आइये हम नजर डालते हैं गांधी परिवार द्वारा प्रेस की आजादी को खत्म करने के लिए कांग्रेस की कुत्सित कोशिशों पर :-

जवाहर लाल नेहरू ने प्रेस की आजादी पर लगाए बैन

  • कांग्रेस के नेता अक्सर जवाहर लाल नेहरू को अपना रोल मॉडल बताते रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका निभा रहे प्रेस की स्वतंत्रता को उन्होंने कुचलने कुचलने का काम किया है। 
  • पंडित नेहरू ने कई ऐसे कानून को पारित करवाए जिससे देश में प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ी।
  • 23 अक्टूबर 1951 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने “The Press Objectionable Matters Act” पारित करवाया।
  • यह कानून अंग्रेजों द्वारा 1908,1910, 1930 और 1931 में पारित कानूनों के समान प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने वाला था।
  • इस कानून के पारित होने पर देश में जबरदस्त विरोध हुआ, The All India Newspapers Editor’s Conference, The Indian Federation of Working Journalists ( IFWJ) और Language Newspapers Association ने इस कानून का विरोध किया, लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री नेहरू ने कानून पारित करवा दिया।

इंदिरा गांधी ने प्रेस की आजादी का दमन किया

कांग्रेसी कुशासन का सबसे बड़ा उदाहरण इंदिरा गांधी के समय देश में लगाया गया आपातकाल है। क्योंकि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का जो काम इंदिरा गांधी ने किया वह अभूतपूर्व है

  • इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान न केवल लोगों के नागरिक एवं मौलिक अधिकारों का दमन किया, लोकतंत्र की गरिमा पर आघात किया, बल्कि प्रेस की आजादी को कुचल डाला। 
  • आजादी के बाद पहली बार इंदिरा सरकार ने 26 जून 1975 को ‘Central Censorship Order’ और ‘Guidelines for the Press’ जारी किया।
  • 11 फरवरी 1976 को Prevention of Publication of Objectionable Matters Act of 1976 को भी लागू कर दिया
  • इंदिरा गांधी ने 1971 में प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए पहली बार कदम उठाने के लिए सोचा, तब वो सूचना और प्रसारण मंत्रालय का भी जिम्मा संभाल रहीं थीं।
  • इंदिरा गांधी ने ऐसा कानून तैयार करवाया, जिसमें समाचारपत्रों के मालिकों का एकाधिकार खत्म करने के प्रवाधान थे।
  • ऐसे प्रावधान किए गए जिससे सरकार के प्रतिनिधियों को समाचार पत्रों के बोर्ड अधिक शक्ति मिले। हालांकि यह कानून की शक्ल नहीं ले सका।
  • 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी ने प्रेस की आजादी को यह कहते हुए खत्म कर दिया कि वह राष्ट्रीय नीति के विरूद्ध कार्य कर रहा है। इस दौरान वे सारी बंदिशें लगा दी गईं जो अंग्रेजों द्वारा प्रेस के ऊपर लगाए जाते थे।

राजीव गांधी ने प्रेस पर अंकुश के लिए लाया कानून

  • राजीव गांधी, प्रेस की आजादी और मुखरता को गलत मानते थे और अपनी सरकार के मुताबिक ही रखना चाहते थे।
  • राजीव गांधी ने लोकसभा से Defamation Bill 1988 पारित करवाकर प्रेस की आजादी को कुचलना चाहा, लेकिन पत्रकारों ने राजीव गांधी की सरकार को मजबूर कर दिया कि वह यह विधेयक राज्यसभा में पेश न कर सके।

एक और आंकड़े जो हैरत में डाल देते हैं, वो ये हैं कि प्रेस की आजादी की बात करने वाले राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने यूपीए-2 के पांच वर्षों के शासन काल में महज छह बार ही मीडिया से इंटरैक्शन किया उनमें से भी दो ऐसे मौके थे जिनमें महज दो मिनट के लिए ही मीडिया का सामना किया। 

नेहरू-गांधी परिवार प्रेस की आजादी को कितना तवज्जो देते हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि राहुल गांधी ने 2004 से राजनीति में आने के 10 साल बाद पहली बार किसी न्यूज चैनल को इंटरव्यू दिया। इसके साथ ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी इस बात का भी विशेष ख्याल रखते हैं कि उनके करीबी पत्रकारों से ही वे मिलें, ताकि कोई मुश्किल प्रश्न पेश न आए।  

दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, जो हर स्तर पर प्रेस की आजादी के बड़े पैरोकार हैं और बीते 46 महीनों में ही 29 बार विभिन्न मीडिया संस्थानों, पत्रकारों से इंटरैक्शन कर चुके हैं। 

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