Home विचार आपातकालः कैसे बरपाया था इंदिरा ने कहर?

आपातकालः कैसे बरपाया था इंदिरा ने कहर?

402
SHARE

सोचिए!… किसी रात सरकार आप से कहती है कि, फेसबुक, ट्विटर, रेडियो, अखबार और टेलिविजन पर किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति से पहले सरकारी अधिकारी की अनुमति लेना आवश्यक है…

आपको गुस्सा आता है..सरकार को..प्रधानमंत्री को..उल्टा-सीधा कहते हुए आप अपने फेसबुक और ट्विटर पर कुछ लिखकर..पोस्ट करते हैं..लेकिन देखते हैं कि पोस्ट नहीं हो रहा…

अचानक उठकर टीवी ऑन करते हैं…टीवी में भी सारे न्यूज चैनल पर विज्ञापन चल रहा है…सरकारी विज्ञापन…

परेशान होकर दोस्तों को फोन लगाते हैं…बातचीत होती है…पता चलता है…अब आप अपने मन से कुछ भी कह, लिख और बोल नहीं सकते हैं…देश में आपातकाल लगा दिया गया है…

आपातकाल की घोषणा
…ठीक ऐसा ही, 1975 में 25 और 26 जून की मध्यरात्रि को इस देश में हुआ था।

उस समय महज कुछ गिने-चुने लोगों के पास टीवी सेट हुआ करता था।  व्हाट्सअप, ट्विटर, फेसबुक और वेबसाइट का तो जमाना ही नहीं था। हां, लोगों के पास अखबार, पत्र-पत्रिकाएं, रेडियो, गोष्ठी, और सभाएं थीं जिनसे समाज और सरकार के बारे में जानकारियों का आदान-प्रदान किया जाता था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर इन सब पर रोक लगा दी और एक ही झटके में आजादी को छीन लिया।

आपातकाल में सबसे पहले लोगों की जुबान बंद कर दी गई ताकि विरोध के सुर ना उभरें। यहां से अगले 21 महीनों तक देश इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी की निरंकुश मनमानियों को सहता रहा।

लोकतंत्र से खिलवाड़ का कदम
मन में प्रश्न आता है कि वह प्रधानमंत्री जिसने 1971 में अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की धमकी को दरकिनार करते हुए, पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर दिया और एक नये देश, बांग्लादेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उस प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?

आपातकाल की घोषणा, एक ऐसे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पड़ाव था जो पिछले कई सालों से देश में घटित हो रहा था। लेकिन इसकी तात्कालिक वजह बना इलाहाबाद हाईकोर्ट का 12 जून, 1975 का वो आदेश जिसके तहत रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी का निर्वाचन निरस्त हो गया था। इंदिरा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजनारायण की याचिका पर  हाईकोर्ट ने पाया था इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी को प्रभावित कर जन प्रतिनिधित्व कानून का उल्लघंन किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर आंशिक स्थगन आदेश दिया, लेकिन सर्वोच्च अदालत के आदेश के साथ ही विपक्षी नेताओं ने इंदिरा पर हमले को और तेज कर दिया जिसके बाद इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र की साख से खिलवाड़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

विपक्ष की हुंकार से घबरा गई थीं इंदिरा
25 जून की रात को देश में आपातकाल लगाया गया, उसी दिन सुबह दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की विशाल जनसभा हुई थी। लाखों के जनसैलाब को संबोधित करने के लिए विपक्ष के मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजनारायण और हेमवती नंदन बहुगुणा सरीखे नेता जेपी के नेतृत्व में मंच पर उपस्थित थे। मंच से इन सभी नेताओं ने इंदिरा गांधी के भ्रष्ट और निरकुंश शासन को उखाड़ फेंकने और एक नई व्यवस्था को स्थापित करने की हुंकार भरी । ‘संपूर्ण क्रांति’ के प्रणेता जयप्रकाश नारायण ने इसी विशाल जनसभा में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ललकारा और सेना व पुलिस से  आह्वान किया। यहां मंच से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर लाइनें नारे के रूप में गूंजी- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’। विपक्ष के तमाम नेताओं की एक मंच से हुंकार और सिंहासन खाली करने की सीधी चुनौती ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता की नींव को हिलाकर रख दिया। देश का माहौल और विपक्ष के नेताओं का आक्रामक रुख इंदिरा गांधी के लिए मुसीबत बनता जा रहा था। इस तनावकारी स्थिति से निपटने के लिए वह संवैधानिक रास्ता तलाश करने लगीं…इसी तलाश में उनके दिमाग में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिदार्थ शंकर रे का नाम आया, जो संविधान के अच्छे जानकार थे और परिस्थितियों को आसानी से समझ सकते थे। इंदिरा गांधी ने अपने विशेष सहायक आरके धवन को, सिदार्थ शंकर रे को तुरंत बुलाने के लिए कहा। 25 जून 1975 की सुबह, सिद्धार्थ शंकर रे दिल्ली के बंग भवन में अपने कमरे में आराम कर रहे थे, उसी समय फ़ोन की घंटी बजी और और आरके धवन ने रे को तुरंत प्रधानमंत्री के निवास स्थान 1, सफदरजंग पहुंचने के लिए कहा।

सिद्धार्थ शंकर रे को बनाया आपातकाल का सूत्रधार
इंदिरा गांधी अपने स्टडी रूम में बड़ी मेज के सामने बैठी थीं जहां खुफिया रिपोर्टों का ढेर लगा था, इसी समय सिद्धार्थ शंकर रे वहां पहुंचे। अगले दो घंटों तक इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर के बीच देश की स्थिति के बारे में बातचीत हुई। रे से इंदिरा बताती हैं कि कैसे पूरे देश में अव्यवस्था फैल रही है, गुजरात और बिहार विधानसभाओं को भंग करना पड़ा है और विपक्ष उनकी सरकार पर हावी हो चुका है। इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने एक कड़े फैसले लेने की जरूरत पर जोर दिया। अपनी बातचीत के दौरान इंदिरा गांधी ने यह भी कहा कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की ‘हेट लिस्ट’ में सबसे ऊपर हैं, इसलिए आशंका है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी-सीआईए सरकार को हटाने की मुहिम में जुटी है, कुछ उसी तरह से जैसे कि सीआईए ने चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेंदे का तख्ता पलटा। इस तमाम चर्चा के साथ इंदिरा गांधी ने सिद्धार्थ शंकर रे से देश में आपातकाल लगाने के लिए संवैधानिक स्थिति को समझना चाहा। इंदिरा गांधी ने देश की परिस्थिति पर बातचीत करने के लिए अपने किसी अन्य कैबिनेट मंत्री को नहीं बुलाया था, यहां तक कि कानून मंत्री एचआर गोखले को भी क्या चल रहा है इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी से कहा: “मुझे संवैधानिक स्थिति समझने का समय दीजिए”… इंदिरा गांधी समय देने के लिए राजी हो गईं और कहा: “जल्द से जल्द वापस आइए”

सिद्धार्थ शंकर रे आपातकाल पर संवैधानिक स्थिति को समझकर दोबारा दोपहर बाद लगभग साढ़े तीन बजे इंदिरा गांधी के निवासस्थान 1, सफदरजंग रोड पहुंचे। यहां उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि आंतरिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल लगाया जा सकता है। अपनी इसी सलाह के चलते सिद्धार्थ शंकर रे आपातकाल के सूत्रधार भी माने जाते रहे।  

बस फिर क्या था, इंदिरा गांधी देश पर आपातकाल थोपने का फैसला ले चुकी थीं। 25 जून 1975 की रात 11 बजकर 45 मिनट पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने, देश पर आपातकाल की घोषणा करने वाले सरकारी पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और आपातकाल लागू हो गया।

 रातोंरात तेज हुआ गिरफ्तारियों का दौर
देश भर में रात में ही गिरफ्तारियों का दौर तेज हो गया। रात में ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन नेताओं और व्यक्तियों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ्तार करना था। लिस्ट के नामों पर बार-बार संजय गांधी इंदिरा के कमरे में जाकर सलाह-मशविरा करते थे। रात डेढ़ बजे दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशन से जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पहुंची। फाउंडेशन के सचिव राधाकृष्ण ने पुलिस ऑफिसर से कहा कि क्या आप चार बजे तक इंतजार कर सकते हैं, वह बहुत देर से सोए हैं और उन्हें थोड़ा आराम की जरूरत है साथ ही उन्हें पटना जाने के लिए सुबह की फ्लाइट पकड़नी है। चार बजे राधाकृष्ण ने जेपी को जगाया और जिला मजिस्ट्रेट सुशील कुमार का हस्ताक्षर किया हुआ वॉरंट पढ़कर सुनाया। जेपी तैयार होकर पुलिस की गाड़ी में बैठ ही रहे थे कि तभी टैक्सी से चंद्रशेखर वहां पहुंचे और जेपी के साथ-साथ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन गए। राधाकृष्ण ने रास्ते में जेपी से पूछा कि आप लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगे तो उन्होंने जवाब दिया “विनाश काले विपरीत बुद्धि”।

प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप
इस तरह से 26 जून की सुबह तक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया गया। इंदिरा गांधी ने सिर्फ तीन लोगों की गिरफ्तारी की अनुमति नहीं दी थी। वो थे तमिलनाडु के नेता कामराज, बिहार के समाजवादी नेता और जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एक और समाजवादी नेता एसएम जोशी। रामलीला मैदान में सुबह हुई रैली की खबर देश के लोगों तक न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित सभी बड़े अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। अगले दिन सिर्फ हिंदुस्तान टाइम्स और स्टेट्समैन ही छप पाए, क्योंकि उनके प्रिंटिंग प्रेस बहादुर शाह जफर मार्ग पर नहीं थे।

सुबह-सुबह हुई थी कैबिनेट मीटिंग
इंदिरा उस रात बहुत कम सो पाईं, लेकिन जब वो सुबह कैबिनेट की बैठक में आईं तो बिल्कुल भी थकी-हारी नहीं लग रहीं थीं। बैठक के वक्त नौ मंत्री दिल्ली से बाहर थे जबकि आठ कैबिनेट मंत्रियों और पांच राज्य मंत्रियों ने इसमें हिस्सा लिया । जैसे ही ये लोग बैठक में आए, उन्हें आपातकाल की उद्घोषणा और गिरफ्तार किये गए नेताओं की लिस्ट दी गई।

इंदिरा ने देश से झूठ बोला
26 जून की सुबह आठ बजे आकाशवाणी पर समाचारों की जगह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है। लेकिन, सच्चाई ठीक इससे उलट थी, यहां से देश ने 21 मार्च 1977 तक यानी करीब 21 महीने सत्ता की ओर से खौफनाक पुलिसिया दमन का दौर देखा। आपातकाल ने इंदिरा गांधी को असीमित शक्तियां दे दी थीं- जब तक चाहें वह सत्ता में रह सकती थीं, लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी, मीडिया और अखबार को सेंसर कर सकती थीं, किसी भी प्रकार के कानून को पारित करवा सकती थीं और जिसे चाहें उसे मीसा-डीआईआर के तहत गिरफ्तार करवा सकती थीं।

कैद में दी गईं कठोर यातनाएं
मीसा और डीआईआर में एक लाख ग्यारह हजार लोगों को जेल में ठूंस दिया गया, क्योंकि ये सभी इंदिरा गांधी और आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इस दौरान, जेल में दिल को दहला देने वाली यातानाएं दी गईं। जयप्रकाश नारायण को ऐसी यातना दी गई कि उनकी किडनी कैद के दौरान खराब हो गई। देश के सभी बड़े विपक्षी नेता सलाखों के पीछे थे, इनके साथ छात्र आंदोलन के युवा नेता भी कैद कर लिये गए थे। कैद के दौरान युवा नेताओं को  देश के बड़े नेताओं से राजनीति का पाठ सीखने का मौका मिला, इस तरह से जेलें पाठशाला भी बन गईं।

फोटो- इंडिया टुडे

संजय गांधी का आतंक
एक तरफ आपातकाल का आतंक था तो दूसरी तरफ इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी अपने करीबी बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल और ओम मेहता के साथ मिलकर देश में मनमाना शासन चला रहे थे। संजय गांधी ने विद्याचरण शुक्ल को सूचना और प्रसारण मंत्रालय का काम सौंप रखा था, जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी थी। जो भी पत्रकार इससे इनकार करता उसके लिए जेल के दरवाजे खुल जाते थे।

जबरन नसबंदी को लेकर पसरी थी दहशत
इस आतंक के साये में क्या मीडिया, क्या जनता सभी पुलिस की ज्यादतियों से डर हुए थे, यहां तक कि न्यायपालिका भी सहम चुकी थी, देश में सारे मानवाधिकार खत्म हो चुके थे। जुल्म की इंतहा हो रही थी। इन सबके बीच संजय गांधी का पांच सूत्रीय कार्यक्रम भी चल रहा था। इस कार्यक्रम में प्रमुख था-वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा का खात्मा , पेड़ लगाना, परिवार नियोजन  और जाति प्रथा उन्मूलन। लेकिन बाकी तो कहने के लिए थे, इस कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। परिवार नियोजन के लिए अस्पतालों में जबरदस्ती लोगों को पकड़कर, नसबंदी कर दी जाती थी। इस दौरान ऐसी भी घटनाएं हुई जब पुलिसवाले गांव को घेर लेते थे और पुरुषों की जबरदस्ती नसबंदी कर दी जाती थी, आपातकाल के 21  महीनों के दौरान देश भर में 83 लाख पुरुषों की नसबंदी की गई जिससे जनता में जबरदस्त गुस्सा था।

कलाकारों पर भी खूब हुई थी ज्यादती
देश को जल्द से जल्द बदल देने की संजय गांधी की सनक का ही नतीजा था कि सुंदरीकरण के नाम पर दिल्ली के तुर्कमान गेट पर स्थित झुग्गियों को एक ही दिन में बुलडोजर से साफ करवा दिया गया। विरोध प्रदर्शन और रैलियों पर पाबंदी लगा दी गई थी, यहां तक कि लेखक-कवि और फिल्म कलाकारों तक को सरकार ने अपने निशाने पर लिया था। यह कहा जाता था कि मीडिया, कवियों और कलाकारों से सरकार की प्रशंसा करवाने के लिए विद्याचरण शुक्ल को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया था। विद्याचरण शुक्ल ने फिल्मकारों को सरकार की प्रशंसा में गीत लिखने और गाने के लिए मजबूर किया। अधिकतर कलाकार सरकार के आगे झुक गए, लेकिन गायक किशोर कुमार ने सरकार का आदेश नहीं माना। किशोर कुमार के इस विरोध पर उन्हें सबक सिखाने के लिए उनके गाने रेडियो पर बजने बंद हो गए, किशोर कुमार के घर पर आयकर विभाग ने छापे डाले। इसी दौरान, ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म रिलीज होने वाली थी,  अमृत नाहटा की इस फिल्म को सरकार विरोधी मान कर उसके सारे प्रिंट जला दिये गए। आपातकाल के ही दौर में मशहूर फिल्मकार, गायक और लेखक गुलजार को भी सरकार की अभिव्यक्ति पर लगाई गई पाबंदी को झेलना पड़ा, उनकी फिल्म ‘आंधी’ को भी बैन कर दिया गया। इंदिरा आपातकाल के शॉक ट्रीटमेंट से विपक्ष का मुंह बंद करना चाहती थीं जो उन्होंने कर दिया। संजय गांधी गैंग से लेकर पुलिस और नौकरशाह सभी मनमाने तरीके से काम कर रहे थे, न्यायपालिका का भी अंकुश खत्म हो चुका था, इस तरह से देश में श्मशान जैसी शांति स्थापित करने में इंदिरा सफल हो चुकी थीं। राजनीतिक गतिविधियां बिल्कुल बंद थीं। कोई जुलूस-प्रदर्शन नहीं कर सकता था। जनता की परेशानियों को समझने और दूर करने के लिए कोई जगह नहीं थी, देश में सिर्फ और सिर्फ तानाशाही चल रही थी।

जनता ने ठुकरा दिया इंदिरा को
इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बारे में कहा था कि आपातकाल लगने पर विरोध में कुत्ते भी नहीं भौंके थे, लेकिन वक्त बीतने के साथ उन्हें लोगों के गुस्से का एहसास हो चुका था। जिस तरह से इंदिरा गांधी ने अचानक देश में आपातकाल की घोषणा की थी ठीक उसी तरह 18 जनवरी 1977 को मार्च में लोकसभा चुनाव कराने की भी घोषणा कर दी। 16-20 मार्च के बीच देश में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की ऐतिहासिक हार हुई, इंदिरा और संजय गांधी दोनों ही चुनाव हार गए। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा दिया गया और 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी। आपातकाल का काला दौर गुजर गया लेकिन हमारे लिए सीख का एक खजाना छोड़ गया, यह याद दिलाने के लिए कि आजादी और लोकतंत्र के बिना हमारे जीवन में कोई प्रसन्नता और खुशी नहीं आ सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशवासी आज इसी खुशी का अनुभव कर रहे हैं।

LEAVE A REPLY