Home समाचार दलित बंद: साजिश बड़ी गहरी है!

दलित बंद: साजिश बड़ी गहरी है!

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सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को आदेश दिया कि एससी/एसटी एक्ट में बिना जांच के गिरफ्तारी नहीं होगी। 03 अप्रैल को केंद्र सरकार के रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि वह एक्ट के खिलाफ नहीं है, लेकिन वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी निर्दोष को सजा ना हो। जाहिर है निर्णय में कहीं भी एससी/एसटी एक्ट से छेड़छाड़ जैसी कोई बात नहीं है।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट संविधान के ‘मूल भाव’  – ‘किसी दोषी को सजा नहीं मिले’ पर किसी भी तरह का आक्षेप नहीं आने देना चाहता। दूसरी ओर यही बात अगर आंदोलनकारियों से भी यह पूछा जाए कि किसी निर्दोष को सजा मिलनी चाहिए? तो वह भी ‘कहेगा- ‘नहीं’।

कानून को जाने बिना क्यों हुआ बवाल?
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को सुनियोजित तरीके से केंद्र सरकार का फैसला बताते हुए दलितों के विरूद्ध साजिश करार दे दिया गया। राजनीतिक दलों ने अपनी रोटियां सेंकी तो मीडिया के एक गिरोह ने सच को छिपाया। परिणामस्वरूप 12 लोग मारे गए और अरबों की संपत्ति खाक हो गई।

राहुल गांधी ने क्यों किया गैर जिम्मेदाराना ट्वीट?
दरअसल दलित सड़कों पर इसलिए थे कि उन्हें बताया गया कि सरकार ने एससी/एसटी एक्ट ही खत्म कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भारत सरकार का आदेश ठहराने की कोशिश की, जिससे हिंसा भड़की। राहुल गांधी के इस ट्वीट को देखिये-

रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि उसके आदेश को अधिकतर राजनीतिक दलों और दलित कार्यकर्ताओं ने गलत तरीके से परिभाषित करते हुए एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने वाला बताया। जाहिर है यह जान बूझकर किया गया लगता है।

दलित आंदोलन को किसने दी हवा?
दलित आन्दोलन के नाम पर हिंसाग्रस्त राज्यों की सूची देखेंगे तो आपको सब समझ में आ जाएगा। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड… इन सभी राज्यों में कॉमन ये है कि ये बीजेपी-एनडीए शासित राज्य हैं। वहीं सबसे अधिक 32 प्रतिशत दलित वाले राज्य पंजाब में हिंसा नहीं हुई, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी कहीं कुछ नहीं हुआ। जाहिर है बीजेपी-एनडीए शासित राज्यों में हुई हिंसा में किसका ‘हाथ’ है, किसकी साजिश है, समझ में आ गया होगा।

हिंसा के लिए किसने भड़काई?
दलितों की आड़ में हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया गया। एक ऐसा शख्स भी दिखा जो की पद्मावत फिल्म के समय बीजेपी के राज्यों में राजपूत बनकर आन्दोलन कर रहा था। भगवा कपडा तिलक लगाए हुए था, परन्तु दलित आंदोलन में वह दलित बनकर ब्लू रंग का कपडा बांधे हिंसा कर रहा था। आप खुद सोच सकते हैं कि यह शख्स दलित है या गैर दलित?

मुसलमानों की एंट्री के क्या हैं मायने?
आन्दोलन दलितों के नाम पर हुआ, लेकिन मुसलमानों ने जमकर हिंसा की। मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंसा की अधिक वारदातें हुईं। जाहिर है दलितों का नाम लेकर मुसलमानों का आंदोलन का हिस्सा बनना बड़ी साजिश का हिस्सा है। कैंब्रिज एनालिटिका के जरिये कांग्रेस ने जो डेटा इकट्ठा किए हैं शायद उसका इस्तेमाल दलितों और गैर दलितों में विभेद पैदा करने के लिए किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल क्यों?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को यूं समझा जा सकता है कि-दलितों के नाम पर हंगामा गैर दलितों ने किया, लेकिन जिस इलाके में आगजनी हुई वहां के दलितों को इस आगजनी के लिए गिरफ्तार कर लिया जाए, वह भी बिना सबूत के। क्या आप नही चाहेंगे कि गिरफ्तारी तब हो जब कोई तो सबूत हो। बस इस आदेश के तहत भी ऐसा ही है, लेकिन अफसोस कि इस बात को बताया ही नहीं गया। 

न्यायालय को निशाना क्यों बनाया गया? 
न्यायालय के निर्णय पर सवाल उठाकर ‘सड़कछाप गुंडों’ ने दलितों का पक्ष कमजोर कर दिया है, क्योंकि ये तांडव किसी शोषण के खिलाफ नहीं अदालत के खिलाफ किया गया है। इसी न्यायालय ने दलितों को आज भी आरक्षण और कानून का संरक्षण दे रखा है। इसी अदालत ने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अपनी मुहर लगाई थी। जाहिर है दलितों को इस साजिश को पहचानना होगा।

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