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दसॉल्ट के सीईओ ने किया राफेल पर राहुल के झूठ का पर्दाफाश, पढ़िए पूरा इंटरव्यू

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राफेल जैसी देश के लिए बेहद जरूरी रक्षा डील पर कांग्रेस पूरी बेशर्मी के साथ भटकाव की राजनीति करने की कोशिश रही है, लेकिन हाल ही में दसॉल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने इस डील पर एक एक बिंदु पर जवाब देकर इन आरोपों की धज्जियां उड़ा कर रख दी। पढ़िये न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए दसॉल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर का पूरा इंटरव्यू….

सवाल 1 : साल 2016 में राफेल करार किस तरह से पूरा हुआ? इस बात से सभी वाक़िफ़ हैं कि ये सरकारों के बीच का करार था। फिर आप करार के दौरान किस वक़्त दसॉल्ट के साथ इसमें शामिल हुए?

जवाब 1: मर्सिली में आपका स्वागत करते हुए मैं बहुत खु़श हूं। हमलोग इस वक़्त राफेल के सामने हैं जो जल्दी ही भारत जाने वाला है। यहां पर इसकी मारक क्षमता का परीक्षण होने वाला है। इस बेहद ही ख़ास एयरक्राफ्ट को तैयार करने में दसॉल्ट के लोगों को गर्व है। वो इस बात के लिए ही नहीं कि ये सर्वश्रेष्ठ है बल्कि ये फ्रांस की जरूरतों के मुताबिक भी है। पहली बार इसे फ्रांस की सेना के लिए डिजायन किया गया था और ये पूरी तरह से युद्धक विमान है। दसॉल्ट के श्रमिक, तकनीशियन और कर्मचारी सभी अपने देश की सेवा में गर्व महसूस करते हैं। हमें इस का गर्व है कि ये विमान अब भारतीय वायु सेना का हिस्सा बनेगा। पिछले 60 बरसों से हम भारत के साथ काम कर रहे हैं। ये वास्तव में हमारे लिए सम्मान की बात है कि हम भारत की सुरक्षा का हिस्सा बने हैं।

अब मैं आपके सवाल पर लौटता हूं। जैसा कि आप जानती हैं कि हम एक बड़ी प्रतिस्पर्धा में थे। ये 2007 में 126 विमान के एमएमआरसीए कार्यक्रम के साथ शुरू किया गया था। हमें एल-1 के तौर पर नामित किया गया। इसका अर्थ ये है कि हम कई अन्य प्रतिस्पर्धियों के बीच टक्कर में विजेता घोषित किए गए। 2012 में हम एल-1 प्रतियोगी होने के गौरव से आगे बढ़ गए थे। 2012-16 से हम सौदों को आजमाने और उसे अंतिम रूप देने का काम कर रहे हैं। कुछ कारणों से, जिसे भारत सरकार द्वारा समझाया जा सकता है, ये सौदा नहीं हुआ। भारत सरकार ने आवश्यकता को ध्यान में रख कर फ्रांस सरकार से 36 राफेल विमान की आपूर्ति का आग्रह किया। फ्रांस सरकार ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और 2016 में हमें इसकी जानकारी दी।

सवाल 2: आपको बताया गया था कि सौदा नहीं हो रहा है, बावजूद इसके आप भारत के साथ बात करते रहे। आपने बातचीत बंद क्यों नहीं की ?

जवाब 2: हां, हम साल 2012 से भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं। 2016 में हमने आईएएफ, भारत सरकार और एचएएल के साथ चर्चा की थी। हम 126 विमान के सौदे को अंतिम रूप देना चाहते थे। मैंने महसूस किया कि उस वक़्त बातचीत की गति धीमी थी, लेकिन हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे थे, जिस दिशा में भारत सरकार ने हमसे आग्रह किया था। अचानक, प्रधानमंत्री मोदी जब यहां पहुंचे, रक्षा मंत्रालय के माध्यम से भारत और फ्रांस सरकार के बीच इसका करार हुआ। हमें भारत सरकार के निर्णय से अवगत कराया गया और कहा कि हमें 36 राफेल विमान भारत को सौंपना है।

सवाल 3 : 25 मार्च 2015 आपने राष्ट्रपति फ्रैंक्वा ओलांद की मौजूदगी में इस बात की जानकारी दी थी कि निर्माण कार्य शुरू हो गया है और कर्मचारी इस सौदे पर काम करने से बेहद खुश हैं, और दसॉल्ट इन विमानों को भारतीय वायुसेना को जल्द ही उपलब्ध करायेगा। उन 17 दिनों में ऐसा क्या हुआ कि जिसे आप लगभग पूरा होने की घोषणा कर चुके थे, उसे छोड़ अचानक आप दूसरे करार की तरफ बढ़ गए ?

जवाब 3: आपूर्तिकर्ता के तौर पर हम 2012 के करार के मुताबिक इसे हासिल करना चाहते थे। वो करार 126 विमानों के लिए था। हम अभी भी एचएएल और आईएएफ के साथ सौदे पर काम कर रहे थे। जैसा कि हमने कहा कि ये बातचीत धीमी थी। मेरा मानना है कि भारत सरकार के लिए 126 विमानों का ये सौदा बहुत भारी या मुश्किल था। इसीलिए फ्रांस सरकार से 36 विमानों की आपूर्ति के साथ आगे बढ़ने के लिए कहा गया। ये साल 2015 की बात है।

सवाल 4: एक आपूर्तिकर्ता के तौर पर क्या आपको लगता है कि एचएल के पास ऐसी क्षमता नहीं थी कि वो आपके लिए इस डील पर काम कर सके?

जवाब 4: नहीं, बिल्कुल भी नहीं। हमारा एचएएल के साथ काम करने का लंबा अनुभव है। मैं खु़द एचएएच के साथ काम कर चुका हूं और मेरा इस कंपनी के लिए काफी सम्मान है। बातचीत की मुश्किलें क्या थीं ? दो मामले थे-एक जिम्मेदारी की बात थी, क्योंकि विमान सौदे पर मुहर लग चुकी थी।। आपको फ्लाई अवे कंडीशन में 18 विमान मिल गए हैं-जिसका मतलब फ्रांस में इनका निर्माण हुआ। फिर, एचएएल के माध्यम से चरण-दर-चरण लाइसेंस की प्रक्रिया में उलझना क्योंकि एचएएल एक सरकारी प्रमुख उत्पादन एजेंसी थी। उस समय सवाल ये भी था, और हमने इस पर कई बार चर्चा भी की कि फ्रांस में दसॉल्ट में लगने वाले वक्त (काम के घंटे)की तुलना में एचएएल को कितना वक्त ((काम के घंटे)) लेना चाहिए। यह पहला मुद्दा था। दूसरा मुद्दा था- हमे दसॉल्ट, जो कि 126 राफेल के केवल उत्पादन की शुरूआत के लिए जिम्मेदार है, के तौर पर क्या करना चाहिए ? जैसे कि अगर आप एचएएल के द्वारा पूरी तरह से तैयार विमान लेते हैं तो भारतीय वायुसेना के सामने एचएएल को इसकी पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ये 2 अहम मुद्दे थे।

सवाल 5: इसीलिए आप जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते थे ?

जवाब 5 : 126 राफेल के लिए नहीं। केवल 18 राफेल के लिए और फिर 108 राफेल के लिए-जिनमें से कुछ हिस्सों को फ्रांस में बनाया जाना था। श्रमिकों के प्रशिक्षण की जानकारी, उपकरण, प्रकाशन और दस्तावेजीकरण की जानकारी की भी अदला-बदली होना था। मुझे ऐसा लगता है कि आखि़रकार जब आपके पास मौजूद पूरा मानव संसाधन, सरकारी कंपनी एचएएल के पास है तो वायुसेना के लिए इसे तैयार करने और उसकी आपूर्ति की जिम्मेदारी एचएएल की थी ना कि मेरी।

सवाल 6: जैसा कि आपने कहा कि आप 60 वर्षों से भारत को विमान बेच रहे हैं। क्या मिराज के साथ भी ऐसा कुछ हुआ था ? जब मिराज को स्थानांतरित किया गया तो क्या इस तरह की कोई समस्या आई थी ?

जवाब 6: मिराज (तकनीक) को स्थानांतरित नहीं किया गया। जब हमने 80 के दशक की शुरूआत में मिराज 2000 का सौदा किया, हमारे पास लाइसेंस बेचने का विकल्प था। मूल करार केवल 36 या 40 फ्लाई अवे एयरक्राफ्ट का था, लेकिन ये डील उस तरह नहीं हुई । मिराज को फ्लाई अवे कंडीशन में भारत को दिया गया । मिराज का रखरखाव और मेंटेनेंस एचएएल के द्वारा किया गया था। इसके लिए हमने एचएएल के साथ करार किया था।

सवाल 7 : मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राफेल डील में फ्रांस सरकार और यहां की अंदरूनी राजनीति का अहम रोल रहा। भारत में विपक्ष का आरोप है कि इस फैसले पर पहुंचने से पहले भारतीय कैबिनेट की सुरक्षा और अधिग्रहण मामलों की समिति की मंजूरी नहीं ली गई। वैसे ही इस बात के भी संकेत हैं कि डील की प्रक्रियाओं को दरकिनार रखने के बारे में फ्रांस की सरकार भी अनजान थी? इसमें कितनी सच्चाई है ? क्या इसमें किसी तरह से फ्रांस की अंदरूनी राजनीति की भी भूमिका थी ?

जवाब 7 : मैं इस मामले में कुछ नहीं कहना चाहता कि सरकारी स्तर पर क्या हुआ और क्या हो रहा है? भारत सरकार की अपनी प्रक्रियाएं हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि इस मामले में पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया। फ्रांस सरकार की भी अपनी प्रक्रियाएं हैं, चाहे वो भारत से अलग हों लेकिन यहां पर भी मैं निश्चिंत हूं कि फ्रांस सरकार ने भी प्रक्रियाओं का पूरा ख्याल रखा।

सवाल 8 : ये सवाल मैं इसलिए पूछ रही हूं क्योंकि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद ने कहा था कि दसॉल्ट को ऑफसेट पार्टनर चुनने का विकल्प नहीं दिया गया था। भारत सरकार भी कहती है कि (डील में) इस तरह (ऑफसेट पार्टनर चुनने) की कोई बात ही नहीं हुई थी।

जवाब 8 : यह सरासर गलत है। पूर्व राष्ट्रपति ओलांद ने जो कहा था, उस पर वो सफाई दे चुके हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि दोनों भागीदारों ने एक दूसरे से संपर्क किया। यह फ्रांस या फिर भारत सरकार का फैसला नहीं था कि दसॉल्ट ने रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर चुना। इसे यूं समझिये कि जिस समय मैंने 2011 में रिलायंस के साथ बातचीत शुरू की, उस समय न ओलांद राष्ट्रपति थे, और न मोदी प्रधानमंत्री। हमारा समझौता तो 2012 में हो गया था।

सवाल 9 : इस हिसाब से मौजूदा दौर का रिलायंस भी तो अलग था ? उसमें मालिक दूसरे भाई (मुकेश अंबानी) थे। इस डील में केवल आप शुरुआत से हैं। जबकि भारत के प्रधानमंत्री अलग थे, फ्रांस के राष्ट्रपति अलग थे और रिलायंस अलग था।

जवाब 9: इसीलिए मैंने कहा कि हमने रिलांयस ग्रुप के साथ जाने का निर्णय किया। इस ग्रुप के साथ अच्छी बात ये है कि दो भाईयों के साथ इसमें उनकी मां भी है। वो कंपनी के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के बेटे हैं। ये बहुत बड़ा ग्रुप है और अपने परिवार के नक्शेकदम पर चल रहा है। उसके साथ जुड़ने की ये वज़ह भी है।

सवाल 10: इसका मतलब ये कि भारत सरकार की तरफ से आपको अनिल अंबानी ग्रुप के साथ जुड़ने के लिए किसी ने नहीं कहा ?

जवाब 10: नहीं, बिल्कुल भी नहीं।

सवाल 11: क्या आपने अंबानी ग्रुप को सिर्फ इसीलिये नहीं चुना कि वो भी दसॉल्ट की तरह एक परिवार का ग्रुप है ? आपने एक साक्षात्कार में कहा कि आपने इस कंपनी को इसलिए चुना क्योंकि उनकी जमीन हवाई अड्डे के नजदीक है। आपने निर्णय लेने से पहले किन-किन बातों पर गौर किया ?

जवाब 11: हमने दसॉल्ट और रिलायंस ग्रुप के बीच कई यात्राएं कीं। साल 2011 में हम भारतीय ग्रुप के साथ दसॉल्ट विमान के कुछ हिस्सों का उत्पादन करना चाहते थे और हमने फॉल्कन के साथ इसकी शुरूआत की। मैं ये कहना चाहता हूं कि हम 60 वर्षों से भारत सरकार के साथ काम कर रहे हैं लेकिन अब मैं समझता हूं कि हमें भारतीय पार्टनरों के साथ भारत में रहने की जरूरत है। निश्चित तौर पर हम टाटा या दूसरे पारिवारिक ग्रुप के साथ जा सकते थे। 2011 में टाटा भी दूसरी उड़ान कंपनियों के साथ बातचीत कर रही थी। अंत में हमने रिलायंस के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। रिलायंस के पास इंजीनियरिंग के क्षेत्र में बेहतर अनुभव है।

सवाल 12: ऐसा इसलिए क्योंकि रिलायंस को आपके किसी प्रतिस्पर्धी के साथ काम करने का कोई अनुभव नहीं है? टाटा तो अमेरिका के साथ चला गया। क्या ये वज़ह थी ?

जवाब 12: मैं शुरू से बताना चाहता हूं। जब आप आगे बढ़ने और भारत में निर्माण का फैसला करते हैं तो सही लोगों के साथ शुरूआत करने की जरूरत पड़ती है। इसीलिए हम नई कंपनी डीआरएएल के साथ शुरुआत कर रहे हैं। ये प्रारंभिक कंपनी है। डीआरएएल का सीईओ ऐसा व्यक्ति है जिसके पास एयरोनॉटिक्स का अनुभव है। हम श्रमिकों और प्रशिक्षु श्रमिकों की भर्ती कर रहे हैं। इसका सीईओ एक भारतीय इंजीनियर है और दसॉल्ट के शेयरधारकों का प्रतिनिधि होने के नाते मैं उसका अध्यक्ष हूं। बोर्ड में रिलायंस का प्रतिनिधि भी है। लेकिन, कंपनी का कामकाज एक भारतीय सीईओ देख रहा है।

सवाल 13: कांग्रेस पार्टी का कहना है कि दसॉल्ट का सीईओ भारतीय प्रधानमंत्री की आड़ बना हुआ है। आपको झूठा कहा गया है।

जवाब 13: मैंने इसे देखा और मैं थोड़ा दुखी भी हूं। कांग्रेस के साथ काम करने का हमारा लंबा अनुभव है। हमारा भारत के साथ पहला सौदा 1953 में हुआ था। हमने नेहरू और दूसरे प्रधानमंत्री के साथ भी काम किया है। हम भारत के साथ काम कर रहे हैं, किसी पार्टी के लिए नहीं। हम भारतीय वायुसेना और भारत सरकार को फाइटर विमान जैसे सामरिक उत्पादों की आपूर्ति कर रहे है। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
मैं झूठ नहीं बोलता। मैंने पहले ही साफ कर दिया है कि मेरा बयान सत्य है। मैंने झूठ बोल कर प्रतिष्ठा हासिल नहीं की है। सीईओ के तौर पर आप झूठ नहीं बोल सकते हैं।

सवाल 14: क्या यही कारण है कि फ्रांस की सरकार मीडिया पर सवाल नहीं उठा रही है ? फ्रांस की मीडिया पर इसमें कम ही चर्चा हुई है।

जवाब 14: नहीं। राष्ट्रपति ओलांद ने जो कुछ कहा था, केवल उस पर विवाद था। लेकिन राष्ट्रपति ने कहा कि कुछ गलतफहमी हो गई थी और उन्होंने अपने बयान को सही कर दिया। प्रेस हमें बहुत अच्छी तरह से जानता है। हम द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले से फ्रांसीसी रक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए सामरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहे हैं। हमारे पास अच्छे विमान डिजाइन करने के सुदीर्घ और उत्कृष्ट अनुभव के साथ प्रतिष्ठा है। मेरे हिसाब से फ्रांस या भारत जैसे देश हमारे उत्पाद का समर्थन और सराहना करते है, तो ये काफी अहम बात है। हमारी वही टीम और वही लोग हैं। ये बेहतर सौदा है और हम भारतीय के लिए बेहतर सामान तैयार करना चाहते हैं।

सवाल 15: तो आप दसॉल्ट की शानदार प्रतिष्ठा के बारे में बता रहे है। क्या आप मानते हैं कि राफेल जेट के बारे में जो भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं उससे दसॉल्ट की प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ेगा ?

जवाब 15: मुझे ऐसा नहीं लगता है। पहली बात, सौदे में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है और इसलिए कौन क्या कहता है उससे फर्क नहीं पड़ता। सच तो सच है। सच वो है जो मैंने कहा है। अंबानी के रिलायंस ग्रुप को चुनने का फैसला हमने किया। हम दूसरे भागीदार को भी तलाश रहे हैं। रिलायंस के अलावा हमारे पास पहले से ही 30 पार्टनर हैं। हम आईएएफ के आपूर्तिकर्ता होने के तौर पर बेहद खुश हैं। और आप देख रही हैं कि आईएएफ इस सौदे का समर्थन कर रहा है क्योंकि उसे शीर्ष पर होने के लिए लड़ाकू विमानों की जरूरत है।

सौजन्य- ANI

सवाल 16: आपने कहा कि आप 30 पार्टनर को चुन चुके हैं और 70 से ज़्यादा कतार में हैं। इसमें कितने आपके ऑफसेट भागीदार हैं और कितने रिलायंस के ? ये किस तरह की भागीदारी है ? क्या दूसरे इसे दसॉल्ट या फिर डीआरएएल के माध्यम से हासिल करेंगे?

जवाब 16: नहीं। पहली बात ऑफसेट में काम करने का हमारा 7 साल का अनुभव है। शुरू के 3 साल में हमने इस बात का खुलासा नहीं किया था कि हम किसके साथ काम कर रहे हैं। हम पहले ही 30 कंपनियों के साथ करार कर चुके हैं जो 40 प्रतिशत काम करेगी। रिलायंस उस 40 प्रतिशत में से 10 प्रतिशत को पूरा करेगा। बाकी 30 प्रतिशत के लिए दसॉल्ट और दूसरी कंपनियों के साथ सीधा समझौता है।

सवाल 17: आपने कहा कि आप 3 साल का विवरण देने के लिए बाध्य नहीं हैं।

जवाब : यह डीपीपी 2013 है।

सवाल 18: आप इस लंबी बातचीत का हिस्सा रहे हैं। क्या यह सच है कि 2007 में भारतीय रक्षा मंत्रालय ने जिम्मेदारी ली कि ऑफसेट साझीदारों द्वारा जो आपूर्ति की जाएगी उसकी गुणवत्ता की गारंटी की जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन, अब आप कहना चाहते हैं कि ऑफसेट भागीदार से जो कुछ भी आप हासिल करते हैं उसकी गारंटी आप नहीं लेंगे। इस मामले में सरकार भी गारंटी नहीं दे रही है। उदाहरण के तौर पर यदि आप फॉल्कन से ढांचा खरीद रहे है या फिर वही चीज़ महिंद्रा या रिलायंस या फिर किसी और भागीदार से खरीद रहे हैं। अगर वो आपूर्ति नहीं करते हैं तो यह भारत सरकार की जिम्मेदारी नहीं होगी ?

जवाब 18: नहीं, ये मेरी समस्या होगी, क्योंकि सही कीमत, सही वक़्त और उच्च मानक वाले उत्पाद को खरीदार तक पहुंचाना हमारी जरूरत है। पूर्व की चर्चा और 36 राफेल की के बीच का अंतर ये है कि अगर मैं पूरी जिम्मेदारी लेता हूं तो मैं 36 राफेल को आईएएफ को पहुंचा दूंगा। ये मेरी जिम्मेदारी है। डीपीपी के नियमों के मुताबिक मैं अपने ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से तैयार हूं। इस ऑफसेट दायित्व में राफेल पर काम ही नहीं है। ये ऑफसेट की योग्यता से जुड़ा है। उदाहरण के लिए, फाल्कन ऑफसेट के लिए भारत सही है।

सवाल 19: मिस्टर ट्रैपियर, क्या ये आपके लिए मुश्किल नहीं है क्योंकि जिस ऑफसेट भागीदार को आपने चुना है उनके पास कोई अनुभव नहीं है और अनुभव के बिना पर वो आपके लिए फॉल्कन बनाने जा रहा है। भारत सरकार भी इसकी गारंटी नहीं दे रही है। यहां पर घाटे वाली कंपनी है….

जवाब 19: लेकिन, दुनियाभर में ऐसा चलता है। यदि बोइंग या एयरबस जैसी बड़ी कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला या दूसरे ठेकेदार देश में काम करना चाहती है, तो उन्हें आगे बढ़ने के लिए इजाजत चाहिए। जैसा मैंने भारत में किया था। हमारे पास इसकी अनुमति है। लेकिन, इस सौदे के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है। ऑफसेट की वज़ह से हमारे पास भारत में थोड़ा बहुत काम करने की अनुमति है और 3 साल में इसे पूरा किया जाना है। इसलिए हम भारत में निवेश करेंगे और दोनो सरकारों द्वारा हस्ताक्षरित 36 विमान सौदे की प्रतिबद्धता का सम्मान करना मेरी जिम्मेदारी है।

सवाल 20: चलिए अब दाम पर आते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 126 विमानों के लिए (एमएमआरसीए) प्रति विमान 19.5 विलियन यूरो का करार हुआ था। इस तरह से प्रति विमान कीमत हुई 155 मिलियन। मगर 2016 में उसी विमान को 217 मिलियन में खरीदने का भारत सरकार ने करार किया, जो पहले के करार से 40 प्रतिशत ज्यादा है।

जवाब 20: पहली बात 126 विमान के लिए करार हुआ था, उसमें से 18 विमान फ्रांस में बनाए जाने थे। एचएएल के साथ भी प्रोग्रेसिव लाइसेंस था लेकिन बहुत सारी कंपनियां इसे बनाना चाहती थी। यह एक विषय था। फिर बात आई कि भाारत में राफेल को तैयार करने में कितना वक़्त लगेगा, खास कर फ्रांस की तुलना में। उसके बाद लेबर खर्च भी अहम था। जब हम 18 फ्लाई अवे कंडीशन की बात करते हैं तो 36 की कीमत भी वही है। मगर 36, 18 का दोगुना है। जहां तक मेरा संबंध है तो इस हिसाब से कीमत भी दोगुनी होनी चाहिए। मगर, ये सरकार के बीच का करार था और इसमें बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने कीमत 9 प्रतिशत कम कर दी। फ्लाई अवे में राफेल ज्यादा महंगा नहीं है। इसीलिए 36 सौदों में भी 126 सौदों की तरह वो रकम कम हो गई। आप इसे इस तरह से नहीं बांट सकते।

सवाल 21: यदि इसे आप 9 प्रतिशत सस्ता बता रहे हैं तो क्या ये गैर हथियार या हथियार के बीच के ढांचे का फर्क है ?

जवाब 21: हथियारों को लेकर एक अलग तरह का करार है। ये (राफेल डील) हथियारों के बिना है।

स्वाल 22: क्या 2017 के सौदे में हथियार भी शामिल है और पुराना सौदा इससे अलग था?

जवाब 22: दोनों अलग तरह के करार है। पिछली चर्चा में 126 राफेल वाला अलग करार था और एमबीडीए द्वारा हस्ताक्षरित 36 राफेल का करार अलग है।

सवाल 23: जब बात लोडिंग की आती है तो उस विमान और इस विमान में क्या अंतर है ?

जवाब 23: विमान एक जैसा है। फ्लाई अवे विमान में कोई अंतर नहीं है।

सवाल 24: भारत के लिए खास तौर से कौन सा विशिष्ट हथियार है ? मैं समझती हूं कि आप ज्यादा जानकारी नहीं देंगे। क्या वास्तव में कुछ ऐसा है जो बेहद ही गोपनीय है ? ऐसी खबरें हैं कि इसमें मिसाइल, राडार और चेतावनी सिस्टम वगैरह भी हैं ?

जवाब 24: 18 या 36 राफेल पूरी तरह से लैस है। आपके पास राडार है लेकिन मिसाइल नहीं है। मिसाइल एक अलग करार है। आप सेब की तुलना सेब से कर सकते हैं। 18 राफेल (फ्लाई अवे कंडीशन) जो पहले 126 राफेल की डील का हिस्सा था और अब 36 राफेल की डील भी वही है। आप दाम तय करने की तुलना कर सकते हैं।

सवाल 25: रेडियो, अल्टीमीटर, डॉल्पर राडार…

जवाब 25: सबकुछ वहां भी था। लेकिन मैं इसके बारे में नहीं बता सकता। करार के मुताबिक मैं इन जानकारियों का खुलासा नहीं कर सकता। ये भारत और फ्रांस सरकार की जिम्मेदारी है। मैं अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करता हूं और ये मैं हमेशा से करता रहा हूं।

सवाल 26: क्या दसॉल्ट ने भारत को विमान सौंपने से पहले इसमें सारे हथियारों को फिट कर दिया है ? या फिर इसे तीसरी पार्टी को करना है ?

सवाल 26: हथियारों को अलग-अलग करार के तहत भेजा जाएगा। लेकिन बाकी सभी चीजों को विमान के साथ दसॉल्ट के द्वारा भेजा जाएगा।

सवाल 27: क्या आप इन हथियारों को बेचते हैं ?

जवाब 27: एमीबीडीए ऐसा करती है। यह जी से जी (सरकार से सरकार) के साथ है। लेकिन फ्रांस सरकार से एमबीडीए को इसकी इजाजत मिली हुई है।

सवाल 28: वो आपको हथियार देते हैं और आप उसे विमान में लोड करते हैं?

जवाब 28: वे सीधे भारतीय वायुसेना को हथियार भेजते हैं।

सवाल 29: तो क्या आप केवल ढांचा भेजेंगे ?

जवाब 29: नहीं। विमान में सभी चीजें होंगी। राडार, ईडब्ल्यू, नेविगेशन और दूसरे उपकरण। विमान हथियारों को ले कर जाएगा, ये एमबीडीए की जिम्मेदारी है।

सवाल 30: हमने विमान देखे हैं। यह वही विमान है जिसे एमएमसीडीए करार के तहत जाना था ?

जवाब 30: हां

सवाल 31: कोई बदलाव नहीं ?

जवाब 31: नहीं।

सवाल 32: लेकिन 9 प्रतिशत सस्ता ?

जवाब 32: हां

सवाल 33: भारत में आलोचकों का कहना है कि नए सौदे के कारण, तकनीक का हस्तानांतरण नहीं हो पाया है। इससे भारतीय विमानन उद्योग को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक विमानन एक्सपर्ट के तौर पर क्या आप मानते हैं कि जब बाहर से फ्लाई अवे एयरक्राफ्ट की आपूर्ति होती है तो उसका नुकसान घरेलू विमानन उद्योग को होता है?

जवाब 33: ये अलग तरह का करार है।

सवाल 34: क्या ये बेहतर है ?

जवाब 34: अगर आप अपनी सेना के लिए चाहते हैं तो ये बेहतर है। ये वक्त और तात्कालिकता का मामला है। क्योंकि फ्लाई अवे की आपूर्ति आसान है। आपके पास राफेल के निर्माण का हस्तांतरण नहीं है। लेकिन साथ ही, हम ऑफसेट के माध्यम से तकनीक का हस्तांतरण कर रहे हैं। हम प्रशिक्षण का इंतज़ाम कर रहे हैं। इसके बारे में ऑफसेट अनुबंध की कोशिश कर रहे हैं। आप नागपुर जाकर देख सकते हैं वहां पर जो श्रमिक काम कर रहे हैं वो भारतीय हैं और फॉल्कन के कुछ हिस्सों का निर्माण कर रहे है। यह बहुत ही अच्छा है। ये वैश्विक बाजार है और फॉल्कन का निर्माण कैसे करना है, इसे जानना बहुत ही अच्छा है। यदि आप देश की अर्थव्यवस्था को विकसित करना चहते हैं तो आपको सक्षम होने की जरूरत है। भारत बहुत बड़ा देश है और उसे ने केवल घरेलू बाजार. बल्कि वैश्विक बाजार के तौर पर विकसित होने की जरूरत है। पश्चिमी कंपनियों के साथ काम करना अच्छा होता है। उन पर कुछ तकनीक को स्थानांतरित करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। ये आपूर्ति श्रृंखला से ही संभव है।

सवाल 35: मीडिया के अनुसार, आपने कनाडा की बोली को वापस ले लिया, खास कर अमेरिका सेनाओं की आपसी बातचीत और गोपनीय डेटा की वजह से। क्या आप कई देशों के साथ करार करते हैं ? क्या आपने इसका भारत के साथ सौदा किया हैं ? अगर आप पाकिस्तान और चीन के साथ भी इस तरह का करार करते हैं, जो कि भारत के खिलाफ हैं, तो इसमें गोपनीयता का ख्याल कैसे रखेंगे ?

जवाब 35: बहुत ही आसान है। क्योंकि ये करार सरकारों के बीच होता है। अगर ये कारोबारी सौदा है तो हमें इसके लिए फ्रांस की सरकार की मंजूरी चाहिए। भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी है। इसमें कई तरह के प्रावधान हैं। संवदेनशील और रणनीतिक मामलों में विश्वास बनाने की अनुमति दी जा सकती हैं। मुझे लगता है कि ये जी 2 जी (सरकार से सरकार के बीच) समझौता है, जो ऐसे मामलों में पर्याप्त है। जहां तक मेरा संबंध है, यदि आप हमारे ट्रैक रिकॉर्ड पर नजर डालें तो हमने 1953 में भारत सरकार के साथ शुरूआत की थी। मैंने भारत के साथ जो करार किया है वो दूसरे देशों के साथ नहीं किया। यही सच है।

सवाल 36: आपूर्ति का समय क्या है ? ये विमान कब भारत जा रहा है और कब स्क्वॉड्रन तैयार हो जाएंगे ? प्रशिक्षण और जो कलपुर्जे जा रहे हैं उसके बारे में क्या तैयारी है ? ये भी एक विषय है। क्या कलपुर्जे के मामले में दसॉल्ट के साथ करार पूरा हो गया है ?

जवाब 36: इस सौदे में नहीं है, लेकिन ये शुरू हो रहा है। आपके पहले सवाल का जवाब ये है कि करार के मुताबिक अगले साल सितंबर तक ये भारत की वायुसेना के पास पहुंच जाएगा। यह तय वक़्त पर पूरा हो रहा है।

सवाल 37: पहली खेप?

जवाब 37: हां, 2019 में पहली बार।

सवाल 38: ठीक है

जवाब 38: लेकिन उससे पहले निश्चित तौर पर हमने पायलट की ट्रेनिंग शुरू कर दी है। हम जो पायलट, मैकेनिक फ्रांस में हैं, उन्हें तैयार कर रहे हैं। हम जिन पायलट को ट्रेंड करेंगे, वो भारत में दूसरे पायलटों को ट्रैनिंग देंगे। यही बात तकनीशियन और मैकेनिकों पर लागू होगी। उन्हें पहले फ्रांस में ट्रेंड किया जाएगा और फिर बाद में भारत में वो दूसरों को ट्रेंड करेंगे। जहां तक साजोसमान की बात है तो वो फ्रांस में ही तैयार किया जाएंगे। लेकिन ये सब इस बात पर निर्भर करता है कि भविष्य में इस पर क्या निर्णय होता है। अगर ये केवल 36 राफेल के लिए है तो कलपुर्जों का निर्माण थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि ये मात्रा पर्याप्त नहीं है। यदि भविष्य में और अधिक राफेल का निर्माण करना है तो हम इन सुविधाओं को भारत में व्यवस्थित करने की कोशिश करेंगे। हालांकि ये भविष्य की बात है।

सवाल 39: जैसा कि मुझे बताया गया है कि पहला स्क्वॉड्रन तो 2019 आने वाला है। बाकी कब आएगा ?

जवाब 39: ट्रेनिंग के लिए?

सवाल 40: हां प्रशिक्षण के लिए। तो सभी 36 राफेल का निर्माण कब पूरा होगा ?

जवाब 40: ये बड़ा कार्यक्रम है, जो अगले साल शुरू हो जाएगा।

सवाल 41: स्क्वॉड्रन कब तक तैयार हो जाएंगे ?

जवाब 41: मुझे नहीं पता। भारत में राफेल बेस के स्क्वॉड्रन बनाने के लिए आईएएफ की जिम्मेदारी है। दो राफेल बेस विकसित किए जा रहे हैं। आईएएफ को इस सवाल का जवाब देना है। मैं केवल उसका जवाब दे सकता हूं जो कि मेरे पास है मतलब-पायलट और मैकेनिकों का प्रशिक्षण।

सवाल 42: आपके प्रतिस्पर्धियों से आपका विमान (राफेल) कैसे बेहतर है ?

जवाब 42: दुनियाभर में अब तक की प्रतिस्पर्धा में टायफून कभी राफेल से नहीं जीता। सब जानते हैं कि राफेल सबसे अच्छा है। ये मेरा प्रोडक्ट है और निश्चित तौर पर ये सबसे बेहतर है। आप फ्रांस और भारत के पायलट से पूछ लीजिए। विभिन्न जगहों पर भारत में बहुत आंकलन हुआ। उन्होंने अपनी तरह से इसका अंदाजा लिया, जिसमें 2012 में राफेल को चुना गया। मुझे लगता है कि पायलट इसे शानदार विमान कहेंगे ।

सवाल 42: मैं कीमत पर वापस आ रही हूं। पहले के साक्षात्कार में आपने कहा था कि सभी ऐड-ऑन वाले विमान की कीमत सस्ती रही है। अभी भी आपने 9 प्रतिशत सस्ता कहा है। भारत के वित मंत्री भी यही कर रहे हैं कि यह सस्ता है। लेकिन आप यह सुझाव देते हैं कि पहले एमएमआरसीए सौदे भारत के लिए बेहतर है। आपने स्वयं कहा था कि आपके पास एसएएल के साथ अच्छा रिश्ता रहा है। अगर यह भारत के लिए बेहतर सौदा था तो यह सौदा लंबे समय तक देश या दसॉल्ट के लिए अच्छा कैसे होगा?

जवाब 42: एक बेहतर सौदा का मतलब केवल आखिरी कीमत नहीं होता। ऐसा भी होता है कि उत्पादन में 3-5 या 10 वर्ष लग सकते हैं। यह एक पैरामीटर है। करार के लिए ये भी एक पैरामीटर है, जिसे ध्यान में रखना है।शुरुआत में 126 विमानों के लिए बातचीत की गई। इसमें काफी समय लग गया। 2007 से 2012 में राफेल के साथ आगे बढ़ने का फैसला हुआ लेकिन 2015 तक कोई करार नहीं हो पाया। इसी वजह से हमें बताया गया कि फौरी सामरिक जरूरतों के हिसाब से भारत सरकार ने फ्रांसीसी सरकार से जल्दी करने के लिए कहा। भारत को सुरक्षा कारणों से बहुत ही कम समय में लड़ाकू जेट की जरूरत है। यही कारण है कि वे 36 राफेल की डील की तरफ चले गए।

सवाल 44: आप भारत के साथ 20 वर्षों से इस करार पर बात कर रहे हैं। भारत में लग रहे रिश्वत, भ्रष्टाचार और झूठ बोलने के आरोप से कभी आपको इस डील पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस हुई ?

जवाब 44: जैसा कि मैंने कहा कि मैं 1990 से भारत के साथ काम कर रहा हूं। मेरी कंपनी लंबे समय से भारत के साथ पहले से काम कर रही है। मुझे पता है कि कुछ विवाद हैं और मैं ये भी जानता हूं कि ये अंदरूनी राजनीति है। चुनाव के दौरान ऐसा होता है। मेरे लिए तो सच्चाई महत्वपूर्ण । और सच्चाई ये है कि ये सौदा साफ सुथरा है। भारत की वायुसेना इस सौदे से खुश है। हमारा कर्तव्य है कि इसे पूरा करें। हमारा मानना है कि 1953 में हमने जो सहयोग शुरू किया था वो जारी है और आगे भी जारी रहेगा। कंपनी के लिए, नौकरियां पैदा करने के लिए मैं भारत में निवेश करना जारी रखूंगा। इस देश के साथ मेरा संबंध काफी महत्वपूर्ण है। मुझे आशा कि हम आगे भी भारत को इसकी आपूर्ति करते रहेंगे। भारत में विमान का उत्पादन करेंगे-फॉल्कन हो या राफेल, यही हमारी प्रतिबद्धता है।

सवाल 45: कहा जा रहा है कि रिलायंस से सीधे 20 हजार करोड़ रुपये मिले हैं या फिर वो इस कंपनी में निवेश हुए हैं? संयुक्त उद्यम के रूप में आपने किस तरह के निवेश किए हैं ? आप जो उत्पादन करने जा रहे हैं उसके लिए आप किस तरह के निवेश कर रहे हैं ?

जवाब 45: जब हमने पिछले साल संयुक्त उद्यम बनाया था तो वो 2012 में हमारे समझौते का हिस्सा था। लेकिन हमने अनुबंध पर हस्ताक्षर होने का इंतजार किया। हमें इस कंपनी में लगभग 800 करोड़ रुपये 50:50 की भागीदारी में निवेश करना है। संयुक्त उद्यम में दसॉल्ट की भागीदारी 49 प्रतिशत और रिलायंस की 51 प्रतिशत है। काम शुरू करने और श्रमिकों और कर्मचारियों का भुगतान करने के लिए हमने 40 करोड़ लगाए हैं, इसे 800 करोड़ तक बढ़ाया जाएगा। आने वाले 5 वर्षों में दसॉल्ट द्वारा 400 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।

सवाल 46: आपने काफी धन निवेश किया है और बाकी भी निवेश करने का वायदा किया है लेकिन अमूमन विमानन कंपनी ऐसा नहीं करती।

जवाब 46: लेकिन हम यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि हम रिलायंस में निवेश नहीं कर रहे है। पैसा ज्वाइंट वेंचर में जा रहा है। मैंने लोगों को ट्रेंड करने के तरीके का पता लगाया। मेरे पास दसॉल्ट के इंजीनियर और श्रमिक हैं जो इस सौदे के औद्योगिक हिस्से की अगुवाई कर रहे हैं। साथ ही, मेरे पास रिलायंस जैसी भारतीय कपंनी है जो इस वेंचर में पैसा लगा रही है। वे अपने देश को विकसित करना चाहते है। कंपनी को इससे ये भी पता चल जाएगा कि विमान कैसे बनाए जाएं।

स्वाल 47: लेकिन ये एक प्राइवेट कंपनी है और उसका मकसद लाभ कमाना है, देश का विकास नहीं।

जवाब 47: आप कह सकती हैं लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। यही आपने अमेरिका के बारे में कहा होता तो अमेरिका आज जहां है, वहां नहीं होता। यदि आप लॉकहीड (मार्टिन) लेते हैं, भले ही ये निजी कपंनी है लेकिन मुझे यकीन है कि हैंगर के बाहर अमेरिका का झंडा है। लिहाज़ा, ये अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। अगर किसी देश का उद्योग अच्छी तरह से चल रहा है, कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर रही है तो इसका मतलब ये है कि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है।

सवाल 48: मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि तुलना एचएएल के साथ है। दसॉल्ट ने एचएएल के साथ भागीदारी क्यों नहीं की ? विपक्ष का आरोप है कि भारतीय प्रधानमंत्री बात तो ‘मेक इन इंडिया’ की करते हैं लेकिन जब बात करार की होती है तो सरकारी कंपनी एचएएल से ऑफसेट भागीदारी के बजाए प्रधानमंत्री के दोस्त की कंपनी से की जाती है। ऐसा आरोप है कि दसॉल्ट पर एचएएल को छोड़ने का दबाव था ?

जवाब 48: बिल्कुल नहीं। अगर हमने 126 राफेल सौदे पर हस्ताक्षर किए तो हम एचएएल और रिलायंस के साथ काम करेंगे क्योंकि उस समय हम पहले ही रिलायंस के साथ साझेदारी कर रहे थे। बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि 126 राफेल की डील नहीं हुई। भारत सरकार को फ्रांस से तत्काल 36 विमान चाहिए थे और इसीलिए इस पर नए सिरे से काम करना पड़ा। मैंने रिलांयस के साथ इसे जारी रखने का फैसला किया। एचएएल ने खुद कहा था कि वो ऑफसेट का हिस्सा बनने में रूचि नहीं रखता। तो मेरे लिए ये फैसला लेना और आसान हो गया। एक छोटी निजी कंपनी के लिए भी ये करार अच्छा है। छोटी कंपनी का मतलब आपको जानकारी बढ़ानी होगी हमारे पास एक डिजिटल कंपनी होगी। नागपुर एक डिजिटल शहर और अच्छी जगह है। कंपनी के विकास के लिए बहुत सी जमीन उपलब्ध है। इसलिए नई कंपनी के लिए ये हर लिहाज से अच्छा है।

सवाल 49: राहुल गांधी का कहना है कि एरिक ट्रैपियर और पीएम नरेन्द्र मोदी दोनों ने अपने-अपने देश का कानून तोड़ा हैं। इससे आपको परेशानी होगी ?

जवाब 49:क्या आपको लगता है कि ये सही है ? अगर मैं अपने देश का कानून तोड़ता हूं, तो मुझे समस्या का सामना करना पड़ेगा। असल में ये कोई मामला ही नहीं है। मैं अपने देश के कानून के सामने पाक साफ हूं। मैं फ्रांसीसी हूं, यहीं रहता हूं। मेरी कंपनी 100 साल से ज़्यादा पुरानी है। जहां तक दसॉल्ट का सवाल है तो ये भी पाक साफ है। सब लंबे समय से दसॉल्ट को जानते है। अगर हम कुछ गलत करते तो लोगों का पता होता। लेकिन मुझे देश के अधिकारियों को इस सवाल का जवाब देना है। मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता हूं। भारत सरकार के अपने नियम है। अगर कोई अधिकारी मुझसे सवाल करता है तो मैं बहुत ही पारदर्शी तरीके से उसका जवाब दूंगा।

सवाल 50:आप राफेल को कितने वर्षों से देख रहे हैं? यह जेट कितना कारगर साबित होगा ?

जवाब 50: साल 2030 तक मैं फ्रांस की सेना को इसकी आपूर्ति करता रहूंगा। फिर ये 30 वर्षों तक काम करेगा राफेल 2060 तक फ्रांसीसी सेना का हिस्सा बना रहेगा। अब हमें भारत सहित दूसरे कुछ देशों में इसे बेचने के अच्छे नतीजे हासिल हुए हैं। हम ये जानते हैं कि भारत इसका लंबे समय तक इस्तेमाल करेगा। भारतीय वायुसेना की जरूरतों के मुताबिक हम उसे राफेल आपूर्ति करना जारी रखेंगे। देखिए, जगुआर के साथ क्या हो रहा है। हम लंबे समय से उसका समर्थन कर रहे हैं। जगुआर केवल ब्रिटिश विमान नहीं है, बल्कि फ्रेंको ब्रिटिश विमान है। मैं एचएएल और आईएएफ के माध्यम से मिराज के साथ ही जगुआर का भी काम करता हूं। मिराज पर लंबे समय तक काम करना जारी रखेंगे। इसलिए ये वास्तव में भारत की गारंटी है। क्योंकि दसॉल्ट लंबे समय से एक उत्कृष्ट कंपनी है और सौ सालों तक ये जारी रहेगी।

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