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ओछी सियासत में न्यायपालिका की साख पर बट्टा लगा रही कांग्रेस

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देश पर सबसे अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी हमेशा खुद को सर्वोपरि समझती है। वह जब सत्ता में रहती है तो मनमानी करती है और जब विपक्ष में होती है तो साम, दाम, दंड, भेद के जरिये सत्ता हासिल करने की जुगत में लगी रहती है। कांग्रेस पार्टी अपने फायदे के लिए संवैधानिक संस्थाओं को नीचा दिखाने से भी नहीं चूकती है। इन दिनों कांग्रेस पार्टी देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों के सबसे बड़े न्याय के मंदिर सुप्रीम कोर्ट को नीचा दिखाने में लगी है। पिछले छह महीने से कांग्रेस पार्टी ने देश की न्यायपालिका को निशाने पर ले रखा है और उसके हर निर्णय, हर कदम पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इंदु मलहोत्रा के जज बनने पर कांग्रेस के बेतुके सवाल
वरिष्ठ महिला वकील इंदु मल्होत्रा ने 23 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। ये अवसर ऐतिहासिक इसलिए बना कि देश में पहली किसी महिला वकील को सीधे सुप्रीम कोर्ट की जज के रूप में नियुक्त किया गया। पिछले तीन दशकों से वकालत कर रहीं इंदु मल्होत्रा मध्यस्थता कानून में विशेषज्ञ हैं। वे विभिन्न घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मामलों में मध्यस्थता करती दिखाई भी दी हैं। लेकिन कांग्रेस की करीबी वकील इंदिरा जय सिंह ने इस पर भी सवाल उठा दिए और जस्टिस जोसेफ की नियुक्ति से इस मामले को जोड़ दिया। हालांकि चीफ जस्टिस ने उनके विरोध को अनैतिक और बेतुका कहकर खारिज कर दिया।

जस्टिस केएम जोसेफ की नियुक्ति पर बेवजह बवाल
उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिट बनाने को लेकर कांग्रेस पार्टी ने मुहिम छेड़ दी है। दरअसल केंद्र सरकार ने इससे संबंधित शीर्ष अदालत की कोलेजियम की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया है। केंद्र सरकार को यह फैसला लेने का हक है, लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले से कांग्रेस पार्टी बौखला गई है। कांग्रेस आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार पक्षपात कर रही है। हालांकि केंद्र ने साफ कर दिया है सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं, जिन्हें केरल हाई कोर्ट से पदोन्नत किया गया है। ऐसे में केरल हाई कोर्ट से एक और पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की सरंचना के हिसाब से ठीक नहीं होगी।

सीजेआई को राजनीति का मोहरा बनाने की कोशिश
जस्टिस लोया मामले में मनमुताबिक फैसला नहीं आने के कारण कांग्रेस पार्टी ने देश के चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दे दिया था। हालांकि उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस गैर वैधानिक प्रस्ताव को खारिज कर दिया, लेकिन कांग्रेस की मंशा जरूर साफ हो गई। दरअसल कांग्रेस पार्टी चीफ जस्टिस पर दबाव बनाना चाहती है, ताकि राजनीतिक रूप से कांग्रेस पार्टी को फायदा मिल सके। हालांकि इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी दो फाड़ नजर आई जिससे पार्टी की मंशा जगजाहिर हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वीरप्पा मोइली, पी चिदंबरम और अश्वनी कुमार जैसे वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस के फैसले को अनुचित कहा। वहीं टीएमसी, आरजेडी और डीएमके ने भी साथ नहीं दिया।

चार जजों के प्रेस कांफ्रेंस के लिए कांग्रेस जिम्मेदार
जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों चेलमेश्वर, मदन लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ ने मीडिया के सामने मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली पर प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार ने इसे कोर्ट का अंदरूनी मामला बताया, लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक पार्टियों के बीच की लड़ाई बनाने की कोशिश की। सर्वमान्य तथ्य है कि न्यायपालिका को कोई निर्देशित नहीं कर सकता इसलिए वह स्व-नियामक की भूमिका निभाती है। लेकिन चारों जजों के प्रेस कांफ्रेंस के आयोजक अगर 10 जनपथ से ताल्लुक रखने वाले पत्रकार शेखर गुप्ता थे, तो क्या ऐसा नहीं लगता कि इसके पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस की मिलीभगत है?

राम मंदिर पर सुनवाई रोकने की कांग्रेस ने रची साजिश
राम मंदिर पर रोज सुनवाई के आदेश पर भी कांग्रेस ने कोर्ट को ‘पार्टी’ बनाने की साजिश की। कांग्रेस पार्टी के नेता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में यह दलील दी कि इसकी सुनवाई मई 2019 के बाद हो। जाहिर है ऐसा कहकर कांग्रेस ने कोर्ट की मंशा को ‘कठघरे’ में खड़ा करने की कोशिश की। दरअसल शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट को ‘नीचा’ दिखा चुकी कांग्रेस अपनी राजनीति चमकाने के लिए न्यायपालिका को निशाना बनाती रही है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर की सुनवाई पर रोक लगाने की अपील की गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस की इस अनुचित मांग को खारिज कर दिया और साफ कर दिया कि कोर्ट अपनी स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगी।

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