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कांग्रेस की राजनीति का फॉर्मूला : सत्ता के लिए कुछ भी करेगा

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देश जिस तेजी से कांग्रेस मुक्त होने की ओर बढ़ रहा है, कांग्रेस की तिकड़मों की रफ्तार उसी तेजी से बढ़ती जा रही है। अस्तित्व बचाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस अब बीजेपी के सहयोगियों के सहारे भी अपनी जिंदगी के लिए ऑक्सीजन ढूंढने में लगी है। अब वो केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार में शामिल शिवसेना पर भी डोरे डाल रही है। इसी की एक बानगी तब दिखी जब कांग्रेस ने मालेगांव महानगरपालिका में शिवसेना के साथ सत्ता को लेकर एक समझौता कर लिया। मालेगांव महानगपालिका पर अपना नियंत्रण बनाये रखने के लिए कांग्रेस ने शिवसेना के साथ वहां गठजोड़ किया है।

मालेगांव में सत्ता के लिए कांग्रेसी तिकड़म
खबरों की मानें तो जो समझौता हुआ है उसमें कांग्रेस ने अपने लिए मेयर पोस्ट रखकर शिवसेना को डिप्टी मेयर का पद देने का प्रस्ताव रखा है। गुरुवार को दोनों पार्टियों ने साथ-साथ नामांकन भरा। कांग्रेस की ओर से शेख रशीद ने मेयर के लिए तो बीजेपी की ओर से सखाराम घोडके ने डिप्टी मेयर के लिए नामांकन दखिल किया। 84 सदस्यों की महानगरपालिका में दोनों पदों के लिए 14 जून को चुनाव होंगे। पिछले महीने के आखिर में हुए मालेगांव महानगरपालिका चुनाव में कांग्रेस को 28, एनसीपी को 20, जनता दल को 6,  शिवसेना को 13, बीजेपी को 9, AIMIM को 7 और निर्दलीय को एक सीट मिली थी।

कांग्रेस की राजनीतिक बदहाली का उदाहरण
शिवसेना की ओर से कहा गया है कि मालेगांव में स्थानीय स्तर पर गठजोड़ उसे जरूरी लगा लेकिन ये गठजोड़ कांग्रेस की सियासी बदहाली की एक और तस्वीर दे गया है। सत्ता की अति महत्वाकांक्षा में कांग्रेस किस तरह बद्हवास होती जा रही है इसका नमूना है शिवसेना की ओर उसके हाथ का बढ़ना। ये पहला मौका होगा जब कांग्रेस ने अपनी धुर विरोधी रही पार्टी शिवसेना से तालमेल किया है। सवाल ये उठ रहा है कि क्या लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनावों में लगातार मिल रही शिकस्त के गम को कांग्रेस कुछ स्थानीय निकायों में येनकेन प्रकारेण सत्ता में आकर भुलाना चाह रही है?

हाशिये पर आने से कांग्रेस बद्हवास
2014 के लोकसभा चुनावों में 44 सीटों पर सिमटने के बाद से हर तरफ सत्ता से कांग्रेस का पतन हो रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की साइकिल को हाथ लगाया, तो साइकिल ही पंचर हो गई। उत्तराखंड की सत्ता से भी जनता ने उसे बुरी तरह बेदखल कर दिया। उभरते संकेतों से ये भी साफ हो रहा है कि साल भर में होने वाले हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा के चुनावों में भी जनता उसे सत्ता से बाहर करने का मूड बना चुकी है। अपने सियासी भविष्य को खतरे में पाकर नर्वस हो चुकी कांग्रेस को अब जहां भी लग रहा है अपना हाथ मार रही है, शायद इस सोच से कि क्या पता कुछ हाथ  आ जाए!

बालासाहेब के रहते कभी नहीं होता ऐसा समझौता
शिवसेना की राजनीति की बुनियाद कांग्रेस विरोध की रही है। 1966 में अपने गठन से लेकर उसने लगातार कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया। महाराष्ट्र में शिवसेना की राजनीति का ग्राफ तब तेजी में ऊपर चढ़ा, जब करीब तीन दशक पहले बीजेपी के साथ उसका गठबंधन हुआ। महाराष्ट्र में 1995 में राज्य में पहली बार दोनों की गठबंधन सरकार बनी। बीजेपी और शिवसेना स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के करीब रहीं, लेकिन बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना कुछ मुद्दों पर अपनी अलग राय भी जताती रही है। राजनीति के कई जानकार तो ये भी मानते हैं कि बालासाहेब ठाकरे होते तो मालेगांव महानगरपालिका में सत्ता में सहयोग के लिए कांग्रेस की ओर से बढ़ाये गए हाथ को सीधा झटक दिये होते।   

कभी इसी कांग्रेस को था गठबंधन से परहेज!
बीजेपी आज देश के 17 राज्यों की सत्ता में है। तीन साल पहले ये संख्या सिर्फ सात थी। यानी केंद्र में मोदी सरकार के कामकाज के बाद राज्यों में भी बीजेपी के लिए भरपूर जनसमर्थन है। पिछले कई विधानसभा चुनावों के नतीजों से ये साबित हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशवासियों को अभूतपूर्व भरोसा है। ऐसे में कांग्रेस को चंद राज्यों की अपनी सत्ता के भी हाथ से निकल जाने का डर समाया हुआ है और वो सियासत की अपनी आखिरी चालें चलने में लगी है। कभी गठबंधन की राजनीति से परहेज करने की नीति बनाने वाली कांग्रेस को सत्ता के लिए आज शिवसेना से भी हाथ मिलाने से गुरेज नहीं।  

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