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मुसलमानों को रिझाने के लिए चीफ जस्टिस को निशाना बना रही कांग्रेस !

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वोट बैंक की राजनीति और सत्ता के स्वार्थ में मनोनुकूल कार्य नहीं होने पर कांग्रेस ने हमेशा ही संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाया है। चुनाव आयोग, सीएजी, सेना, नीति आयोग, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया समेत कई संस्थाओं को कांग्रेस ने कई बार कठघरे में खड़ा किया है। एक बार फिर उनके निशाने पर देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा हैं।

दरअसल अपने सख्त निर्णयों के लिए प्रसिद्ध मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को कांग्रेस पार्टी काफी दिनों से उनके पद से हटाने में लगी हुई है। इसी कड़ी में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों ने मिलकर चार न्यायाधीशों से सुनियोजित ड्रामा भी करवाया था ताकि दीपक मिश्रा पर दबाव बनाया जा सके। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कांग्रेस ऐसा कर क्यों रही है?

मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर
कांग्रेस की नजर मुसलमान वोट बैंक पर है। इसलिए ही कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल चाहते थे कि राम मंदिर-बाबरी ढांचे मुकदमे का कोई भी निर्णय 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ही आए। इसमें कांग्रेस अपना राजनीतिक लाभ देखती है, लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने उनकी इस अपील को ठुकरा दिया था।  गौरतलब है कि कांग्रेस और लेफ्ट अयोध्या में राम मंदिर की जगह किसी भी कीमत पर बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते हैं। इसी कड़ी में वो अयोध्या मसले को लटकाए रखना चाहते हैं।

कांग्रेस ने की थी प्रेस कांफ्रेंस की साजिश
12 जनवरी, 2018 का वह वाकया देश के इतिहास के लिए दागदार बन गया है जब चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस कर न्यायालय के अंदरूनी झगड़े को सार्वजनिक करने का काम किया। न्यायालय की गरिमा गिराने वाली इस घटना के पीछे भी कांग्रेस की ही साजिश बताई जा रही है। दरअसल कांग्रेस और लेफ्ट ने मिलकर ये चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के विरूद्ध साजिश रची और कोर्ट की गरिमा को गिराने का काम किया। दरअसल कांग्रेस की इच्छा थी कि राम मंदिर-बाबरी ढांचा केस में प्रेस कांफ्रेंस करने वाले ये चारों जज भी शामिल हों।

मुताह, हलाला और बहुविवाह पर सुनवाई
26 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निकाह हलाला और निश्चित अवधि के लिए किए गए निकाह यानि मुताह और मिस्यार को लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनवाई करेगी। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले की बड़ी बेंच में सुनवाई करने की सिफारिश की। यानि अब पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले को सुनेगी। जाहिर है कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए ही CJI दीपक मिश्रा के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाया।

याकूब मेमन की फांसी पर नहीं मानी बात
दरअसल मुख्य न्यायाधीश आतंकियों पर भी सख्त रहे हैं और वे इस मामले में किसी की बात नहीं मानते। 1993 के मुंबई ब्लास्ट के आरोपी याकूब मेमन की फांसी रोकने के लिए जब वकील प्रशांत भूषण ने जस्टिस दीपक मिश्रा के घर के बाहर आधी रात को पहुंच गए तो 30 जुलाई 2015 की रात को मामले की सुनवाई हुई, लेकिन जस्टिस मिश्रा समेत तीन जजों ने याकूब मेमन की फांसी रोकने की अपील याचिका को ठुकराते हुए फांसी की सजा बरकरार रखी।

1984 दंगों पर फिर सुनवाई के खफा है कांग्रेस
कांग्रेस चीफ जस्टिस से इस लिए भी खफा है कि उन्होंने 1984 के दंगों की फिर से सुनवाई करने का आदेश दिया है। 10 जनवरी, 2018 को अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि एसआईटी द्वारा बंद किये गये 186 मामलों की जांच फिर से होगी। जाहिर है ये निर्णय कांग्रेस के विरूद्ध जाते हैं और उनकी वोट बैंक की राजनीति को प्रभावित करते हैं।

हालांकि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ये जानती है कि वह किसी भी महाभियोग के प्रस्ताव को पास नहीं करवा पाएगी, लेकिन ऊपर दिए गए सभी मामले देखें तो कांग्रेस की राजनीति समझ में आ जाएगी।

दरअसल कांग्रेस चाहती है कि ऐसा करके वह अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने में कामयाब हो जाएगी। हालांकि इसके साथ ही गौर किया जाए तो कांग्रेस परोक्ष रूप से चीफ जस्टिस को धमकी दे रही है कि हमारी सुनो वरना हमारी सरकार आई तो आपकी मुसीबत होगी।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में न्यापालिका स्वतंत्रता के साथ कार्य कर रही है, जबकि कांग्रेस के कार्यकाल में ऐसा नहीं हुआ करता था। कई ऐसे उदाहरण हैं जब कांग्रेस ने न्यायपालिका पर हमले किए हैं। आइये इनपर एक दृष्टि डालते हैं-

राजीव धवन ने वकालत छोड़ने का एलान किया
11 दिसंबर, 2017 को कांग्रेस के नेता और वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने दिल्ली सरकार और केंद्र के मामले में जब ऊंची आवाज में बहस की तो जस्टिस दीपक मिश्रा ने फटकार लगाई। तब राजीव धवन ने जस्टिस दीपक मिश्रा को पत्र लिखकर वकालत नहीं करने की घोषणा की। ऐसा उन्होंने जस्टिस दीपक मिश्रा को कठघरे में खड़ा करने के लिए किया था। हालांकि 28 दिसंबर को उन्होंने फिर से बाबरी ढांचे के वकील के तौर पर एक बार फिर वकालत करने का एलान किया। 

वी रामास्वामी के खिलाफ लाया महाभियोग
11 मई, 1993 को लोकसभा में जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव इसलिए गिर गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहते हुए भी मतदान में भाग ही नहीं लिया। दरअसल कांग्रेस को लग गया था कि उसका स्टैंड गलत है और दक्षिण भारत में उनके वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। 

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से ही न्यायपालिका कांग्रेस के निशाने पर रही है। 

जवाहर लाल नेहरू 

  • 1951 में मुख्य न्यायाधीश हरीलाल कानिया के पद पर रहते हुए मृत्यु के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायधीश पंतजलि शास्त्री को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाना चहते थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने विरोध किया तो उन्हें पंतजलि शास्त्री को ही मुख्य न्यायाधीश बनाना पड़ा।
  • मुख्य न्यायाधीश पंतजलि शास्त्री के रिटायरमेंट के बाद न्यायाधीश मेहर चंद महाजन सर्वोच्च न्यायलय में वरिष्ठ न्यायाधीश थे। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि न्यायाधीश बिजन कुमार मुखर्जी चीफ जस्टिस बनें, लेकिन दबाव के बावजूद न्यायाधीश मुखर्जी ने जवाहर लाल नेहरू की पेशकश ठुकरा दी।
  • 10 सितंबर 1949 को संविधान सभा में न्यायपालिका पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू ने न्यायपालिका के बारे में अपनी सोच को बताते हुए कहा था कि देश की संसद को ही सारे कानून बनाने के अधिकार है और सर्वोच्च न्यायलय को संसद के मत के अनुसार चलना होगा।

इंदिरा गांधी

  • पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी मनपसंद के न्यायाधीश एएन रे को सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश बनाया। एएन रे उन 13 न्यायाधीशों की संविधानपीठ के सदस्य थे, जिसने केशवानंद भारती मामले में 24 अप्रैल 1973 को संसद को संविधान संशोधन करने की शक्ति वापस की थी। इस मामले में निर्णय आने के ठीक एक दिन बाद एएन रे को तीन वरिष्ठ न्यायधीशों को नजरदांज करते हुए मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
  • इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान 29 जनवरी 1977 को न्यायाधीश एम.एच.बेग को वरिष्ठ न्यायाधीश एच आर खन्ना को नजरदांज करके मुख्य न्यायाधीश बनाया। प्रधामंत्री इंदिरा गांधी के इस कदम के बाद न्यायाधीश खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। दरअसल एच आर खन्ना ने जबलपुर एडीएम के मामले में 28 अप्रैल 1976 को यह फैसला दिया था कि आपातकाल के दौरान भी नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते हैं।
  • मुख्य न्यायाधीश एएन रे, एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड़ और पी एन भगवती ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं। सर्वोच्च न्यायलय के इस निर्णय के बल पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान जबरदस्त मनमानी की ।

राजीव गांधी

  • अप्रैल 1985 में सर्वोच्च न्यायलय ने शाहबानो मामले में निर्णय दिया कि तलाक के बाद मुस्लिम महिला को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता मिलना महिला का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को मुस्लिम वोट बैंक के दबाव में आकर  राजीव गांधी ने 1986 में कानून बनाकर पलट दिया गया।
  • राजीव गांधी की सरकार के दौरान एडीएम जबलपुर मामले में इंदिरा गांधी सरकार के हक में फैसला देने वाले तीनों न्यायाधीश एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड और पी एन भगवती ही मुख्य न्यायाधीश बने।
  • 6 अक्टूबर 1993 में Second Judges मामले में आए फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों के नियुक्ति और स्थानांतरण की सभी शक्तियां एक कॉलेजियम के हाथों में दे दी।

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