Home चटपटी महिषासुर का महिमामंडन करने वाले सूर्पनखा पर हायतौबा क्यों मचा रहे हैं?

महिषासुर का महिमामंडन करने वाले सूर्पनखा पर हायतौबा क्यों मचा रहे हैं?

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संसद में ‘सूर्पनखा’ पर संग्राम मचा है और कांग्रेस इसे नारी जाति का अपमान बता रही है। पार्टी इसे राजनीतिक रंग देने में जुट गई है, लेकिन सवाल ये है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जब ऐसी कोई बात ही नहीं की तो इसपर इतनी उत्तेजना क्यों? हास-परिहास और व्यंग्य के जरिये राजनीतिक चुटकियां लेने की तो परम्परा रही है… फिर इतना हंगामा क्यों? बड़ी बात यह है सूर्पनखा के नाम पर हंगामा कर रही ये वही जमात है जो महिषासुर का महिमामंडन करती रही है… लेकिन सूर्पनखा का नाम लिए बगैर महज इशारे भर को ही नारी अपमान से जोड़ रही है। आखिर महिषासुर और सूर्पनखा में अंतर क्यों? सूर्पनखा में क्या दोष है? क्या कांग्रेस उसे नारी वर्ग में स्थान नहीं देती? अगर नहीं तो वास्तव में यह नारी जाति का अपमान होना चाहिए? अगर हां तो कांग्रेस को एतराज किस बात पर है?

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रेणुका चौधरी ने किया था प्रधानमंत्री का अपमान!
बुधवार (07 फरवरी) को राज्य सभा में हुए इस वाकये का गवाह पूरा सदन है। क्या ये सच नहीं है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना पक्ष रख रहे थे तभी बीच में कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी हंस पड़ीं थीं? अट्टहास करती उनकी हंसी पर पूरा सदन सकपका गया था। बार-बार की उनकी हंसी से प्रधानमंत्री अपनी बात पूरी नहीं कर पा रहे थे। क्या ये सच नहीं है कि पूरे सदन के लोग इसे अस्वाभाविक हंसी मान रहे थे? सच तो यह भी है कि इस हंसी पर प्रधानमंत्री ने नहीं बल्कि सभापति वेंकैया नायडू ने नाराजगी जताई थी।

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महिलाओं के मान की आड़ में छिपने की कोशिश क्यों?
कांग्रेस और रेणुका चौधरी अब इसे राजनीतिक रंग देने में लगी हैं और इसे विशेषाधिकार हनन के साथ निजी टिप्पणी मानती हैं। कांग्रेस इसे महिला का अपमान कह रही है, लेकिन क्या ये सच नहीं है कि प्रधानमंत्री ने इस मामले में रेणुका चौधरी का बचाव किया। सभापति की डांट सुनने से बचाया? प्रधानमंत्री ने तो सभापति को उल्टे रेणुका चौधरी को डांटने से मना किया और कहा कि लंबे अर्से बाद ऐसी हंसी सुनाई दी है। बतौर पीएम रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने को मिली है। जाहिर है प्रधानमंत्री ने हास-परिहास के अंदाज में सदन का माहौल हल्का करने की कोशिश की थी, लेकिन कांग्रेसी नेताओं की सोच को समझिए कि किस हद तक दिवालिया हो गई है। उन्हें यह भी समझ नहीं कि किस पर सियासत करनी चाहिए और किस पर नहीं? उन्हें तो मतलब बस मोदी विरोध से है चाहे कारण कुछ भी हो।

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पीएम मोदी के अपमान पर चुप क्यों है कांग्रेस?
दरअसल जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा है कांग्रेस को समझना और भी मुश्किल होता जा रहा है। अलबत्ता अब तक यही बात समझ नहीं आ रही कि रेणुका चौधरी आखिर किस बात पर हंसीं? जिस वक्त उन्होंने अट्टहास किया था प्रधानमंत्री मोदी उस वक्त कह रहे थे कि आधार का बीज अटल जी ने रखा था। जाहिर है इसमें हंसी की कोई बात नहीं थी। अगर थी भी तो इसका प्रतिकार प्रधानमंत्री के वक्तव्य के बाद भी किया जा सकता था। जब पीएम बोल रहे हों तो फिर हर बात का विरोध क्यों? फिर हर बात का विरोध करना क्या यही राजनीति है? विडंबना देखिये कि अब संसद में इस हंसी पर राजनीति जारी है। क्या कोई दूसरा काम नहीं?

राजनीति में व्यंग्य का कोई जगह तो रहने दो?
दरअसल कांग्रेस को या तो मुद्दा नहीं मिल रहा है या फिर वह इस मर्यादित सदन में रहने लायक नहीं है। आखिर क्या वजह है कि रेणुका चौधरी के अट्टहास के मुद्दे पर हंगामा हो और सदन का समय बर्बाद किया जाए। ऐसे भी कांग्रेस लोकतंत्र के मंदिर में बहुतेरे प्रतिमान तोड़े हैं, उसे तार-तार किए हैं। बहरहाल अब तो यही कहा जा सकता है कि क्या कांग्रेस इतनी दिवालिया हो गई है कि हास-परिहास की बातों को मुद्दा बनाएगी? अब टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने इस मामले को महिषासुर बनाम सूर्पनखा बनाने की राजनीतिक चाल चल दी है। तो क्या वामपंथी दल अब महिषासुर को लेकर नया मुद्दा बनाने वाले हैं।रेणुका और प्रधानमंत्री और हंगामा के लिए इमेज परिणाम

मनमोहन के रेनकोट पर भी मचा था हल्ला
फरवरी 2017 में भी यही कुछ हुआ था जब प्रधानमंत्री मोदी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सिंह सरकार को घेरा था। उन्होंने कहा था कि उनकी नाक के नीचे भ्रष्टाचार होता रहा और वे रेनकोट पहनकर खुद को पाक-साफ बताते रहे। जाहिर है यह एक लोकोक्ति थी, लेकिन कांग्रेस ने इसे भी मुद्दा बना लिया और इस पर हंगामा किया। कई दिनों तक सदन की कार्यवाही बाधित रही और जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे को कांग्रेस ने बर्बाद किया। दरअसल कांग्रेस ऐसे ही नकारात्मक मुद्दे को लेकर राजनीति करती रही है जिसके परिणामस्वरूप पार्टी की विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है।

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