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…तो क्या हर हिंदू को आतंकवादी मानती है कांग्रेस?

हिंदू विरोध कांग्रेस का बुनियादी सिद्धांत कैसे बन गया है? एक रिपोर्ट

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17 दिसंबर, 2010… विकीलीक्स ने राहुल गांधी की अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से 20 जुलाई, 2009 को हुई बातचीत का एक ब्योरा दिया। राहुल गांधी की जो बात सार्वजनिक हुई उसने देश के 100 करोड़ हिंदुओं के बारे में राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस पार्टी की सोच को सबके सामने ला दिया। राहुल ने अमेरिकी राजदूत से कहा था, ”भारत विरोधी मुस्लिम आतंकवादियों और वामपंथी आतंकवादियों से बड़ा खतरा देश के हिन्दू हैं।” जाहिर तौर पर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी हिंदुओं को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूकती। अमेरिकी राजदूत के सामने दिया गया उनका ये बयान कांग्रेस की बुनियादी सोच को ही दर्शाता है। ये कहा जा सकता है कि कांग्रेस हमेशा ही देश की 20 करोड़ की आबादी को खुश करने के लिए 100 करोड़ हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ करती रही है।

हिंदुओं पर ड्रोन हमले करवाना चाहती थी कांग्रेस
राहुल गांधी और टिमोथी रोमर की बातचीत के मायने निकालें तो ये साफ है कि राहुल गांधी अमेरिका से हिंदुओं के खिलाफ मदद मांग रहे थे। वे हिंदुओं को एक आतंकी समुदाय की तरह दुनिया की नजरों में स्थापित करना चाह रहे थे। मतलब यह कि जिस तरह से पाकिस्तान में आतंकियों के खिलाफ अमेरिका ड्रोन हमले करवाता है, उसी तरह भारत में भी हिंदुओं पर ड्रोन हमले करवाना चाहती थी।

मोहन भागवत को आतंकवादी साबित करना चाहती थी कांग्रेस
संघ प्रमुख मोहन भागवत को लेकर हुई एक बहुत बड़ी साजिश से भी पर्दा हट गया है। एक न्यूज चैनल ने खुलासा किया है कि कांग्रेस भागवत को ‘हिंदू आतंकवाद’ के जाल में फंसाना चाहती थी। दरअसल यूपीए सरकार ने अजमेर और मालेगांव ब्लास्ट के बाद हिंदू आतंकवाद थ्योरी पेश की थी। इस दौरान कांग्रेस ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी पर दबाव बनाया ताकि मोहन भागवत को एक रणनीति के तहत फंसाया जा सके। कहा जा रहा है कि तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी इस रणनीति में शामिल थे और भागवत को पूछताछ के लिए हिरासत में लेना चाहते थे।

मोहन भागवत को हिरासत में लेने की कांग्रेस की थी तैयारी
दरअसल समझौता ब्लास्ट के आरोपी स्वामी असीमानंद के इंटरव्यू के आधार पर भागवत को आतंकी हमलों का मुख्य प्रेरक बताया गया था। इसी के आधार पर कांग्रेस ने जांच एजेंसियों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। कांग्रेस नेतृत्व में यूपीए की सरकार चाहती थी कि भागवत से जुड़ी टेप की फॉरेंसिक जांच हो। लेकिन जांच एंजेसी के प्रमुख शरद यादव ने साथ नहीं दिया, जिसके बाद एनआइए ने इस मामले से किनारा कर फाइल बंद कर दी। दरअसल राष्ट्रवाद संघ की सबसे बड़ी ताकत रही है, और आतंकवाद से जुड़ाव का यह आरोप संघ की इसी विशेषता पर हमला करने की कुत्सित कोशिश है।

मुंबई हमले का दोष हिंदुओं के मत्थे मढ़ना चाहती थी कांग्रेस
26/11 मुंम्बई हमले के बाद भी कांग्रेस ने मुस्लिम आतंकियों के कुकृत्य को छिपाने और हिंदुओं को फंसाने का षडयंत्र किया था। कहा जा रहा है कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस बात का खाका तैयार कर लिया था कि इस साजिश में कैसे हिंदुओं को फंसाया जाय। मुंबई हमले के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इसके पीछे हिंदू संगठनों की साजिश का दावा किया था। दिग्विजय के इस बयान का पाकिस्तान ने खूब इस्तेमाल किया और आज भी जब इस हमले का जिक्र होता है तो पाकिस्तानी सरकार दिग्विजय के हवाले से यही साबित करती है कि हमले के पीछे आरएएस का हाथ है। अगर अजमल कसाब को जिन्दा न पकड़ा गया होता, तो आज तक सैंकड़ों हिन्दू जेलों में बन्द किए जा चुके होते।

कांग्रेस की हिंदू आतंकवाद की थ्योरी ने ले लिये असीमानंद के 10 साल
हाल में ही खुलासा हुआ है कि 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रैस में ब्लास्ट में पाकिस्तानी मुसलमानों को किस तरह बचाया गया और हिंदू को फंसाया गया। दरअसल समझौता ब्लास्ट केस के बहाने ‘हिन्दू आतंकवाद’ नाम का शब्द गढ़ा गया। हालांकि इस केस में पाकिस्तानी आतंकवादी पकड़ा गया था, उसने अपना गुनाह भी कबूल किया था, लेकिन महज 14 दिनों में उसे चुपचाप छोड़ दिया। इसके बाद इस केस में स्वामी असीमानंद को फंसाया गया ताकि भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद को अमली जामा पहनाया जा सके। बड़ा सवाल ये है कि पाकिस्तानी आतंकवादी को छोड़ने का आदेश देने वाला कौन था? किसने पाकिस्तानी आतंकवादी को छोड़ने के लिए कहा? वो कौन है जिसके दिमाग में भगवा आतंकवाद का खतरनाक आइडिया आया?

कांग्रेस ने ‘हिंदू आतंकवाद’ के नाम पर प्रज्ञा सिंह ठाकुर को फंसाया
29 सितंबर, 2008 को मालेगांव में हुए धमाके में 7 लोगों की मौत हुई थी और 101 लोग घायल हो गए थे। महाराष्ट्र एटीएस ने अपनी जांच में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित 11 लोगों को गिरफ्तार किया था। राज्य एटीएस ने इस मामले में 12 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। बाद में जांच एनआईए को दे दी गई। अब सबूत सामने आ रहे हैं कि कांग्रेस ने साध्वी प्रज्ञा को फंसाया और उन्हीं के माथे देश-दुनिया में हिन्दू आंतकवाद का नई परिभाषा गढ़ दी थी।

कांग्रेस ने भगवान राम की तुलना तीन तलाक और हलाला से की
16 मई, 2016 को तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी। बहस सामान्य थी कि ट्रिपल तलाक और हलाला मुस्लिम महिलाओं के लिए कितना अमानवीय है। लेकिन सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता और AIMPLB के वकील कपिल सिब्बल ने तीन तलाक और हलाला की तुलना राम के अयोध्या में जन्म से कर डाली। कपिल सिब्बल ने दलील दी है जिस तरह से राम हिंदुओं के लिए आस्था का सवाल हैं उसी तरह तीन तलाक मुसलमानों की आस्था का मसला है। साफ है कि भगवान राम की तुलना, तीन तलाक और हलाला जैसी घटिया परंपराओं से करना कांग्रेस और उसके नेतृत्व की हिंदुओं की प्रति उनकी सोच को ही दर्शाता है।

इंद्रेश कुमार और असीमानंद को कांग्रेस ने साजिश के तहत फंसाया
11 अक्टूबर 2007 अजमेर में हुए बम धमाके में तीन लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 17 से अधिक लोग घायल हो गए थे। 2011 में इस केस को एनआईए को सौंप दिया गया था। उसके बाद एनआईए ने आरोप पत्र दाखिल किया था, जिसमें असीमानंद को मास्टरमाइंड बताया गया था और आरएसएस के इंद्रेश कुमार सहित आठ लोगों को आरोपी बनाया था। लेकिन 08 मार्च, 2017 को एनआईए के स्पेशल कोर्ट ने अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में RSS नेता इंद्रेश कुमार और स्वामी असीमानंद को भी बरी कर दिया। जाहिर तौर पर ‘हिंदू आतंकवाद’ के नाम पर ये कांग्रेस की साजिश का ही हिस्सा है।

वंदेमातरम का भी विरोध करती रही है कांग्रेस
आजादी के बाद यह तय था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया और कहा कि वंदे मातरम से मुसलमानों के दिल को ठेस पहुंचेगी। जबकि इससे पहले तक तमाम मुस्लिम नेता वंदे मातरम गाते थे। नेहरू ने ये रुख लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों को शह दे दी। जिसका नतीजा देश आज भी भुगत रहा है। आज तो स्थिति यह है कि वंदेमातरम को जगह-जगह अपमानित करने की कोशिश होती है। जहां भी इसका गायन होता है कट्टरपंथी मुसलमान बड़ी शान से बायकॉट करते हैं।

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और बीएचयू में हिंदू शब्द पर कांग्रेस को एतराज
हिंदुओं के सबसे अहम मंदिरों में से एक सोमनाथ मंदिर को दोबारा बनाने का जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि सरकारी खजाने का पैसा मंदिरों पर खर्च नहीं होना चाहिए। ऐसे ही नेहरू को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदू शब्द पर आपत्ति थी। वे चाहते थे कि इसे हटा दिया जाए। इसके लिए उन्होंने महामना मदनमोहन मालवीय पर दबाव भी बनाया था। जबकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से दोनों को ही कोई एतराज नहीं था।

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