Home विपक्ष विशेष कश्मीर से मन नहीं भरा, जो अब कर्नाटक को बांटने में लगी...

कश्मीर से मन नहीं भरा, जो अब कर्नाटक को बांटने में लगी है कांग्रेस !

326
SHARE

कर्नाटक सरकार अपने राज्य के लिये भी एक झंडा चाहती है। इस समय देश में सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही ऐसा प्रदेश है जहां राष्ट्रध्वज के अलावा प्रांत के अपने एक झंडे का प्रावधान है। प्रश्न ये उठ रहा है कि कर्नाटक सरकार को इसकी आवश्यकता क्यों पड़ गई? संविधान के अनुच्छेद 370 के माध्यम से जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ है। इसका परिणाम आज पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। फिर कर्नाटक सरकार में ऐसी सोच पैदा होने के पीछे क्या कारण है? क्या ऐसी मांग देश की संप्रभुता और एकता एवं अखंडता के लिए खतरनाक नहीं है?

कांग्रेस सरकार का प्रस्ताव क्या है?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य के अलग झंडे के लिए नौ सदस्यों वाली एक कमेटी भी गठित कर दी है। ये कमेटी झंडे की डिजाइन और उसे कानूनी मान्यता को लेकर एक रिपोर्ट भी देगी। जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के 6 जून के आदेश में कन्नड़ और संस्कृति विभाग के सचिव को इस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। अगर राज्य सरकार अपनी इस चाल में सफल रही तो कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर की तरह दूसरा राज्य होगा, जिसके पास अपना झंडा भी होगा।

बीजेपी सरकार ने विरोध किया था
जानकारी के अनुसार जब 2012 में राज्य में बीजेपी की सरकार थी, तब भी ऐसी ही मांग उठी थी। लेकिन उस वक्त की सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट में कहा था कि वह कर्नाटक के लिए लाल और पीले रंग के झंडे को अपनाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि अलग झंडा देश की एकता और अखंडता के विरुद्ध होगा। उस वक्त के कन्नड़ और संस्कृति मंत्री गोविंद एम कारजोल ने विधानसभा में कहा था, ” झंडा कोड राज्यों के लिए झंडे की अनुमति नहीं देता है। हमारा राष्ट्रीय ध्वज भारत की एकता और अखंडता और संप्रुभता का प्रतीक है। अगर राज्यों के अपने अलग झंडे होंगे तो यह राष्ट्रीय ध्वज के महत्व को कम करेगा। इससे प्रांतवाद की भावना भी भड़क सकती है।”

कश्मीर समस्या कांग्रेस की देन है 
जम्मू-कश्मीर में आज जो भी हालात हैं उसकी एक बड़ी वजह उसे मिले विशेष दर्जे की वजह से है। राज्य के लिए संविधान में एक विशेष अनुच्छेद 370 है, एक अलग संविधान है और एक अलग झंडा भी है। कहीं न कहीं इन्हीं वजहों से वहां अलगाववाद की भावना पनपती है, जो ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस और पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की देन है। उन्होंने अपनी मनमानी करके कश्मीर की ऐसी स्थिति बना दी, जिसे सुधारने में आज बहुत मुश्किल हो रही है। उन्होंने हमेशा से देशभक्तों को किनारे करके उन कश्मीरियों का साथ लिया, जिनके खून में अलगाववाद का उबाल था।

कांग्रेस की सोच राष्ट्रविरोधी है?
कांग्रेस की मानसिकता ऐसी रही है, जिसके चलते उसकी सोच को लेकर आशंकाएं पैदा होती हैं। उसकी सरकारों ने हमेशा से कश्मीर में हुर्रियत और अलगावादियों को पालने-पोसने का काम किया है। कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करना होता है, तो उसके नेता पाकिस्तानी शासकों के तलबे चाटने के लिए पहुंच जाते हैं। जब देशविरोधी ताकतें ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगाते हैं तो पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। बात आतंकियों की उठती है, तो उनके एनकाउंटर पर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तक मातम मनाने लगती हैं।

दूसरे राज्यों से मांग उठी तो क्या होगा?
कर्नाटक को अगर अपना झंडा मिल गया तो दूसरे राज्यों से भी ऐसी ही मांगें उठ सकती हैं। क्या ये भारत जैसे विशाल देश के लिए उचित है। क्या ऐसे अनर्गल मांगों से देश की अखंडता के खंडित होने की आशंका पैदा नहीं होगी? जब कुछ स्वार्थी तत्वों की वजह से भाषा और पानी जैसा मुद्दा भी काफी गंभीर हो जाता है तो ऐसे में राष्ट्रवादी भावनाओं को बांटने की क्या आवश्यकता पड़ गई है?

सत्ता के लिए बांटने की राजनीति कर रही है कांग्रेस ?
तिरंगा हमारी एकता और अखंडता का प्रतीक है। तिरंगे ने पूरे भारत वर्ष को जोड़ रखा है। लेकिन कांग्रेस देश की इस आन-बान और शान पर भी बट्टा लगाने पर तुल गई है, क्योंकि उसे तो 2018 में होने वाला राज्य विधानसभा चुनाव नजर आ रहा है। शायद पार्टी को लगता है कि अपने काम के दम पर तो वो सत्ता में वापसी करने से रही, इसीलिए इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को सुलगाने में लग गई है।

कर्नाटक में हालात ठीक नहीं हैं !
दरअसल कर्नाटक के अंदरूनी हालात ठीक नहीं है। वहां की सरकार तरह-तरह के आरोपों में घिरी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राज्य में अबतक 24 बड़ी राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं, लेकिन राज्य सरकार कुछ नहीं कर रही है। इसको लेकर राज्य की विपक्षी पार्टियां संसद परिसर में प्रदर्शन तक करने लगी हैं।

बीते 70 वर्षों के इतिहास पर गौर करें तो ऐसे कुत्सित कृत्यों की जड़ में कोई है तो वो कांग्रेस ही है। दरअसल अंग्रेज तो चले गए लेकिन उनकी सरपरस्ती में पले-बढ़े कांग्रेसी नेताओं ने उनकी नीतियां जरूर अपना लीं। सालों साल तक सत्ता पर काबिज रहने की कवायद में वंशवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद की आग में देश को जलाने की साजिश पर कांग्रेस पार्टी अमल करती रही है। समाज में विभाजन और बंटवारे की राजनीति के आसरे कांग्रेस तो बढ़ती रही लेकिन देशहित को बहुत नुकसान पहुंचाती रही। बहरहाल देश की जनता अब कांग्रेस की असलियत जान चुकी है। फिर भी कांग्रेस है कि मानती नहीं। आज भी कांग्रेस ‘फूट डालो और राज करो’ के आसरे बढ़ना चाह रही है।

जहर की राजनीति करती है कांग्रेस
यूपी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बंपर जीत क्या मिली कांग्रेस बौखला गई है। बीते पांचों विधानसभा चुनाव में बहुसंख्यक जब जाति की राजनीति में नहीं बंटी तो कांग्रेस को बुरा लग गया। करारी हार से परेशान कांग्रेस एक बार फिर समाज में ‘जहर’ फैलाने की राजनीति पर आगे बढ़ रही है। बहुसंख्यक समाज में विभेद की कुत्सित राजनीति को फिर से हवा दी जा रही है। ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति को एक बार फिर राजनीति का आधार बनाया जा रहा है। इस साजिश को अंजाम तक पहुंचाने के लिए विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग चेहरों का सहारा लिया जा रहा है।

दलितों को भड़काने की राजनीति
सहारनपुर में किस तरह सवर्णों और दलितों के बीच टकराव स्थापित करने की सियासत की गई ये सब जानते हैं। ये भी साफ हो गया है कि कांग्रेस की शह पर सहारनपुर में इस संघर्ष की साजिश रची गई और उनके कई नेताओं का इस मामले में हाथ भी सामने आ रहे हैं। इसी तरह गुजरात के ऊना में दलित पिटाई की भी कांग्रेस ने साजिश रची थी और भाजपा पर दोष मढ़ने का प्रयास किया था। लेकिन गुजरात की जनता ने कांग्रेस की राजनीति को समझ लिया और उसे स्थानीय निकाय चुनाव में हराकर उसे सबक भी सिखा दिया।

किसानों को भड़काती है कांग्रेस
साठ सालों तक सत्ता में रही कांग्रेस ने किसानों को ठगने का काम किया है। हर स्तर पर पंगु बनाकर रखने की नीति पर चलते हुए किसानों के नाम पर राजनीति भी खूब करती है। लेकिन मध्यप्रदेश में मंदसौर की घटना ने कांग्रेस की पोल खोल कर रख दी है। किसान कल्याण के नाम पर राजनीति कर रही कांग्रेस किस तरह किसानों को भड़काती है वो जगजाहिर हो चुका है। कांग्रेस के विधायक, नेता किसानों का नेतृत्व करने के नाम पर आगे आते हैं और किसानों को गोलियां खाने को छोड़ भाग जाती है।

अलगाववाद की जहर बोती है कांग्रेस
साठ सालों तक सत्ता में काबिज रही कांग्रेस ने देश की समस्याओं का हल तो ढूंढ नहीं पाई … उल्टे क्षेत्रवाद और प्रांतवाद की राजनीति को बढ़ावा ही दिया। हाल में ही जब कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने सरेआम गाय काटा तो देश में विरोध के स्वर सुनाई देने लगे। उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच विभेद पैदा करने की कुत्सित कोशिश की गई। ट्विटर और सोशल मीडिया पर ‘द्रविनाडु’ यानी दक्षिण भारत के चारों प्रमुख राज्यों को मिलाकर अलग देश निर्माण की मांग को हवा दी गई। आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस किस कदर बंटवारे और विभाजन की राजीनीति करती है।

राज्यों को आपस में लड़वाती है कांग्रेस
नदियों के जल बंटवारे का मामला हो या फिर राज्यों के सीमांकन का… कांग्रेस ने यहां भी राजनीति की। इसी का नतीजा है कि आज भी जल बंटवारे के नाम पर तमिलनाडु और कावेरी आमने-सामने होते हैं तो पंजाब, हिमाचल और राजस्थान भी एक दूसरे के खिलाफ तलवारें निकाल लेते हैं। हालांकि मोदी सरकार इन समस्याओं के समाधान की तरफ बढ़ तो रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे उलझा कर रख दिया है। दूसरी तरफ सीमांकन के नाम पर यूपी-बिहार, बिहार -बंगाल, असम-बंगाल के बीच तनातनी की शिकायतें आती रहती हैं।

‘दूध में दरार’ डालने की की गई थी कोशिश
यूपीए की सरकार जब देश की सत्ता में थी तो सेना का गैर राजनीतिक और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को भी चोट पहुंचाने की कोशिश की गई। सच्चर कमेटी के माध्यम से सेना में मुसलमानों की संख्या की गिनती कराये जाने की योजना बनाई जाने लगी। कांग्रेस ये जानती है कि सेना में धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर नौकरियां नहीं दी जाती हैं और इन सब के बारे में कोई आंकड़ा नहीं रखा जाता। बावजूद इसके कांग्रेस ने दूध में दरार यानी भाई-भाई में संघर्ष की साजिश रची थी।

सेना पर सवाल क्यों उठाती है कांग्रेस
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कांग्रेस किस कदर सेना से चिढ़ी हुई इस बात के कई सबूत सामने आ चुके हैं। पहले सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगा गया, जिसकी खिल्ली पाकिस्तान में भी उड़ाई गई। ये वही कांग्रेस है जिसने ये सवाल भी उठाया था कि मुसलमानों को आइबी और रॉ जैसी संस्थाओं में क्यों नहीं रखा जाता है। इसके बाद जब एक बीएसएफ के जवान ने जब खराब खाने की शिकायत की तो इसे भी कांग्रेस ने सियासत का मुद्दा बनाना चाहा।

सच्चर कमेटी के नाम पर ‘वर्ग संघर्ष’ की बुनियाद
कांग्रेस नीत सरकार ने सच्चर कमेटी का गठन तो किया था मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह जानने के लिए। लेकिन इस कमेटी के जरिये कांग्रेस ने वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देने का काम किया। इसके लिये राजेन्द्र सच्चर के जिम्मे एक विशेष काम लगाया था। वह काम था प्रत्येक स्थान पर इस बात की जांच करना की वहां कितने मुसलमान हैं, उनके साथ वहां क्या व्यवहार हो रहा है ? यदि किसी स्थान पर मुसलमान कम हैं तो इसका क्या कारण है? जाहिर है कांग्रेस की कुत्सित सोच ने एक नेक काम में भी राजनीति करनी चाही।

कांग्रेस ने की मुसलमानों के आरक्षण की मांग
इसी जमात ए इस्लाम हिंद जैसे संगठन अगर मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग कर रहे थे। लेकिन कांग्रेस भी उसी की भाषा बोलेगी ये कोई नहीं सोच सकता था। लेकिन तत्कालीन आंध्र प्रदेश की सरकारी नौकरियों और अलीगढ़ में पीजी कोर्सेज में मुसलमानों को आरक्षण की मांग पहले कांग्रेस ने ही की थी। आज इसी मांग पर बढ़ते हुए तेलंगाना सरकार ने मुसलमानों को अलग से आरक्षण की व्यवस्था बहाल कर दी है।

तुष्टिकरण के आसरे कांग्रेस की राजनीति
कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति का ही नतीजा है कि आज मुसलमानों की निष्ठा को ही संदेह के घेरे में ला दिया है। दरअसल कांग्रेस नीत गिरोह
जानबूझकर मुसलमानों के मनोविज्ञान को बदलने का प्रयास करते रहे हैं। ये स्थापित करने की कोशिश की जाती रही है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, और वह इसलिए हो रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं। भारत का नागरिक न कह कर यह साबित करने की कोशिश होती रही कि आप मुसलमान हैं। जाहिर है कांग्रेस किस मंशा से करती रही है ये सब जानते हैं।

‘भगवा आतंकवाद’ पर हिंदुओं को बदनाम किया
जिस हिंदू संस्कृति और सभ्यता की सहिष्णुता को पूरी दुनिया सराहती है, उसे भी बदनाम करने में कांग्रेस ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस धमाके के संदिग्ध पाकिस्तानी आरोपी को साजिश के तहत छोड़ दिया गया और उनके स्थान पर निर्दोष हिन्दुओं को गिरफ्तार किया गया। समझौता विस्फोट में यूपीए ने राजनीतिक लाभ के लिए दिग्विजय सिंह, शिवराज पाटिल, सुशील कुमार शिंदे ने हिंदू आतंकवाद का जाल बुना और एक पूरे के पूरे समुदाय को बदनाम किया।

पहनावे और बोली पर भी बांटती है कांग्रेस
भारत की विविधता पूरी दुनिया में इसे विशिष्ट पहचान बनाती है। लेकिन कांग्रेस सरकार आधार पर भी भेद करती रही है। पूर्वोत्तर और कश्मीर की जनता इस बात को लेकर आज भी परेशान हैं कि उन्हें भारतीय नहीं माना जाता। जाहिर है बीते साठ सालों के शासन में कांग्रेस ने देश से जुड़ने का वह माहौल पैदा नहीं किया। कश्मीर समस्या तो ‘कांग्रेस’ की ‘कपटी’ राजनीति का ही नतीजा है, वहीं पूर्वोत्तर के लोगों का शेष भारत से विलगाव भी कांग्रेस की ही देन है।

LEAVE A REPLY