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सुप्रीम कोर्ट को ‘पार्टी’ बनाने की साजिश रच रही कांग्रेस!

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सरकार के तीनों अंगों में न्यायपालिका का अहम स्थान है, क्योंकि संविधान के संरक्षणकर्ता के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से अपनी इस भूमिका को बखूबी निभाया भी है।

सर्वमान्य तथ्य है कि न्यायपालिका को कोई निर्देशित नहीं कर सकता इसलिए वह स्व-नियामक की भूमिका निभाती है। हालांकि बीते कुछ सालों से सुप्रीम कोर्ट की इस छवि को नुकसान पहुंचाने की सुनियोजित साजिश रची जा रही है।

दरअसल शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट को ‘नीचा’ दिखा चुकी कांग्रेस अपनी राजनीति चमकाने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट को निशाना बना रही है। हाल में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए गए कुछ निर्णयों पर हुए विवादों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी सुप्रीम कोर्ट को भी एक ‘पार्टी’ के तौर पर स्थापित करने की कुत्सित कोशिश कर रही है।

एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट को कठघरे में खड़ा किया
सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी/एसटी एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि एससी/एसटी एक्ट में सभी गैर एससी/एसटी वर्ग पर किए गए मुकदमों की पहले जांच की जाए और दोषी पाए जाने पर ही इन पर कार्रवाई हो।

कोर्ट का यह निर्णय इसलिए भी प्रासंगिक है कि इस एक्ट के तहत दर्ज किए गए 90 प्रतिशत मुकदमे झूठे और द्वेषपूर्ण पाए गए हैं। कोर्ट ने अपने निर्णय में सिर्फ तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाई है, न कि कानून को खत्म किया है।

बहरहाल केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर निर्णय के छह दिन के भीतर ही पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने ऐसा वातावरण तैयार कर दिया है कि कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट को ही रद्द कर दिया। कांग्रेस ने इस मौके का फायदा यह आरोप लगाकर भी उठाया कि केंद्र सरकार आरक्षण खत्म कर रही है। जाहिर है पार्टी की यह राजनीति सीधे-सीधे कोर्ट को ‘कठघरे’ में खड़ा करने जैसी है।

राम मंदिर सुनवाई पर सवाल उठाए
राम मंदिर पर रोज सुनवाई के आदेश पर भी कांग्रेस ने कोर्ट को ‘पार्टी’ बनाने की साजिश की। कांग्रेस पार्टी के नेता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में यह दलील दी कि इसकी सुनवाई मई 2019 के बाद हो। जाहिर है ऐसा कहकर कांग्रेस ने कोर्ट की मंशा को ‘कठघरे’ में खड़ा करने की कोशिश की।

ट्रिपल तलाक के निर्णय को नकारा
22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक को जब खत्म करने का निर्णय लिया तो कांग्रेस ने अपने बयानों से इसे राजनीतिक साजिश ठहराने की कोशिश की। यही कारण है कि इस पर बन रहे कानून को कांग्रेस ने राज्यसभा में पास नहीं होने दिया।

जजों के प्रेस कांफ्रेंस पर सियासत
जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों चेलमेश्वर, मदन लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ ने मीडिया के सामने मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली पर प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार ने इसे कोर्ट का अंदरूनी मामला बताया, लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक पार्टियों के बीच की लड़ाई बनाने की कोशिश की।

आधार की अनिवार्यता पर राजनीति
आधार की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट लगातार सुनवाई कर रहा है और समय-समय पर अपने निर्देश भी जारी कर रहा है। हालांकि कांग्रेस पार्टी इस मामले को भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश करती रही है, क्योंकि भाजपा सरकार इसे अनिवार्य करवाना चाहती है।

CJI पर महाभियोग चलाने की साजिश
भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अपने सख्त निर्णयों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने आतंकी याकूब मेनन को फांसी दी, निर्भया गैंगरेप के बालिग दोषियों को मौत की सजा दी और सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य करने जैसे कई निर्णय दिए। लेकिन कांग्रेस पार्टी उन्हें एक दायरे में बांधने की कोशिश कर रही है। उनके विरूद्ध कांग्रेस पार्टी सिर्फ इसलिए महाभियोग ला रही है क्योंकि वह मुख्य न्यायाधीश को पसंद नहीं करती है। दरअसल इसके पीछे कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति है। लेकिन तथ्य ये है कि ऐसा कर कांग्रेस देश के लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ को ही कमजोर कर रही है। 

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