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मई का महीना कांग्रेस पर भारी, 4 साल पहले इसी महीने शुरू हुई थी कांग्रेस की उल्टी गिनती

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मई का महीना कांग्रेस पार्टी के लिए काल साबित हो रहा है। 15 मई को कर्नाटक में मतगणना के बाद 5 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी बाहर हो गई। कर्नाटक में भाजपा 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है और राज्यपाल के बुलावे के बाद 17 मई को बी एस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली है। यह अजब संयोग है कि 4 साल पहले इसी मई महीने की 16 तारीख को लोकसभा चुनाव की मतगणना हुई थी, और दस वर्षों से देश में शासन कर रही कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। 26 मई 2014 को श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

यानि कि 2014 में मई का महीना कांग्रेस पार्टी के बहुत भारी साबित हुआ था और तभी से देश की राजनीति से कांग्रेस की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। इन चार वर्षों में जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से सिर्फ पंजाब को छोड़ दें तो सभी में कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है।

भाजपा के लिए शुभ साबित हुआ मई का महीना,कर्नाटक में बनी सरकार
भारतीय जनता पार्टी के लिए मई का महीना एक बार फिर शुभ साबित हुआ है। 12 मई को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हुआ और 15 मई को हुई मतगणना में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। कर्नाटक में भाजपा की जीत का श्रेय पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। मई की शुरुआत में जब प्रधानमंत्री मोदी प्रचार में उतरे, तो उसके बाद पूरा चुनावी माहौल भाजपा के पक्ष में होता चला गया। एक के बाद एक श्री मोदी ने कर्नाटक में 21 चुनावी रैलियां की और इन रैलियों के असर वाली विधानसभा सीटों में से 89 में भाजपा के उम्मीदवारो को जीत मिली। मतगणना से पहले एग्जिट पोल्स में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बताया गया था और मतगणना वाले दिन हुआ भी यही। 104 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और 17 मई को बीएस येदियुरप्पा ने भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

4 साल पहले केंद्र की यूपीए सरकार हुई थी बाहर
मई का महीना भारतीय जनता पार्टी के लिए 2014 में भी शुभ साबित हुआ था। 16 मई 2014 को मतगणना के बाद भाजपा ने केंद्र में पूर्ण बहुमत हासिल किया था और 10 साल पुरानी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। उस वक्त भी भाजपा की प्रचंड जीत के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। श्री मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त प्रचार किया था और देशभर में 400 से अधिक रैलियों को संबोधित किया था। उसी चुनाव में श्री मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, और यह नारा देशवासियों को इतना रास आया कि 2014 में कांग्रेस पार्टी सिर्फ 44 सीटों तक सिमट गई। इसी के साथ देश की राजनीति से कांग्रेस की उल्टी गिनती शुरू हो गई।

चार वर्षों में कांग्रेस पार्टी को मिली सिर्फ हार ही हार
मई, 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के साथ कांग्रेस पार्टी की जो उल्टी गिनती शुरू हुई थी, वो आज तक जारी है। पिछले 4 वर्षों में देश में जितने भी राज्यों में चुनाव हुए, उनमें एक दो को छोड़ कर सभी में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। 2014 में केंद्र की सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र और हरियाणा की सत्ता से भी बेदखल हो गई। इतना ही नहीं झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी करारी हार के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। 2015 में दिल्ली में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को भारी हार मिली। पंजाब में कांग्रेस जीत जरूर मिली लेकिन इसमें पार्टी की नहीं बल्कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता की जीत थी। इसी वर्ष गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। 2018 में कर्नाटक में करारी हार से पहले कांग्रेस पार्टी त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में हार का सामना कर चुकी है।

अब सिर्फ तीन राज्यों में सिमटी कांग्रेस पार्टी
कर्नाटक में हार के साथ ही कांग्रेस पार्टी का दायरा अब सिर्फ दो राज्यों पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम तक ही सिमट कर रह गया है। पुडुचेरी एक केंद्र शासित प्रदेश है और बहुत ही छोटा राज्य है। मिजोरम भी पूर्वोत्तर का एक छोटा राज्य है और यहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं, जिस प्रकार से पूर्वोत्तर में भाजपा का परचम लहरा रहा है, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि चुनाव के बाद कांग्रेस का यह किला भी ढह जाएगा। पंजाब की बात करें तो यहां की सरकार बनने में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कोई योगदान नहीं था। पंजाब में सीएम अमरिंदर सिंह की सरकार और राज्य की जनता ने कांग्रेस को नहीं बल्कि अमरिंदर सिंह वोट दिया था।

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने बनाया हारने का रिकॉर्ड
जब से राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में प्रभावकारी भूमिका में आए हैं, तभी से कांग्रेस पार्टी के दुर्दिन शुरू हो गए। पिछले वर्षों पर नजर डालें तो राहुल के नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए एक में भी कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली है। राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस को गुजरात, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय और कर्नाटक में हार का मुंह देखना पड़ा है। इसके पहले उपाध्यक्ष के रूप में दिल्ली, अरूणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मणिपुर, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलांगना और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

वंशवाद की राजनीति थोपने का मिला जवाब
कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी का जो हश्र हुआ है, वह उसके कुकर्मों का ही फल है। देश की सबसे पुरानी पार्टी, जिसका कभी लगभग पूरे देश पर शासन था, आज इतनी बुरी हालत से क्यों गुजर रही है। जाहिर है कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ वंशवाद की राजनीति जिम्मेदारा है। कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है, वहां जो कुछ भी होता है, वह एक ही परिवार के लिए होता है। गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड बन चुकी कांग्रेस पार्टी में जिस तरह राहुल गांधी की अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी हुई है, उसने साबित कर दिया है कि कांग्रेस मतलब गांधी परिवार। जब उच्च स्तर पर वंशवाद होगा तो नीचे भी इसका असर दिखेगा। इसीलिए कांग्रेस पार्टी में निचले स्तर पर भी वंशवाद, परिवारवाद हावी है। जनता इस परिवारवाद के खिलाफ है और उसने कांग्रेस को इसका सबक सिखाया है।

अपने कर्मों से क्षेत्रीय पार्टी बनने की ओर कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी कहने को तो राष्ट्रीय दल है, लेकिन अब वह सिर्फ तीन राज्यों तक सिमट गई है। आने वाले दिनों में कोई बड़ी बात नहीं कि इनमें से भी एक-दो राज्य कांग्रेस के हाथ से खिसक जाएं। मतलब कभी राष्ट्रीय दल का रुतबा रखने वाला यह दल अब क्षेत्रीय दल बनता जा रहा है। इससे तो अच्छे कई दूसरी रीजनल पार्टियां हैं, जिनकी बड़े-बड़े राज्यों में सरकार है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड सरीखे राज्यों से तो कांग्रेस का पहले ही सफाया हो चुका है और अब दक्षिण के आखिरी गढ़ से भी कांग्रेस का बोरिया-बिस्तर सिमट चुका है।

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