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मणिशंकर का निलंबन तो दिखावा है, कांग्रेस ने वापसी का किया वादा है!

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गुजरात चुनावों में इसबार कांग्रेस ने सहानुभूति बटोरने की नई नौटंकी शुरू की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली देने वाले मणिशंकर अय्यर की पार्टी से निलंबन उसी का जीता-जागता नमूना है। अय्यर जैसे नेता अपनी बदजुबानी के लिए ही मशहूर हैं, लेकिन अबतक कभी कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी बहकी जुबान पर पाबंदी लगाने की कोशिश नहीं की। इसलिए इसबार पार्टी से उनके निलंबन की सोची-समझी चाल को समझने की जरूरत है। क्योंकि, पहले निलंबन और फिर पार्टी में वापसी का कांग्रेसी खेल नया नहीं है। इसलिये ये बात निश्चित तौर पर जाहिर है कि मणिशंकर अय्यर का निलंबन भी केवल एक दिखावा है। जैसे ही गुजरात चुनाव खत्म होगा, कांग्रेस उपाध्याक्ष अपने उस बदजुबान नेता को सहर्ष गले लगाने के लिए तैयार हो जाएंगे। आइए आपको दिखाते हैं कि तात्कालिक तूफान को शांत करने के लिए किसी को पार्टी से निकालना और फिर वापसी करने का कांग्रेसी चरित्र कैसा है?

गाय काटने वाले को फिर गले लगाया
केरल में राहुल गांधी के करीबी कांग्रेसी रिजिल मुकुट्टु ने सड़क पर गौहत्या करके पूरे देश भी खलबली मचा दी थी। तब अपना चेहरा बचाने के लिए राहुल गांधी ने मणिशंकर अय्यर की तरह ही एक रणनीति के तहत उसे भी कांग्रेस से सस्पेंड करने का ड्रामा किया गया था, लेकिन कुछ ही महीने बाद वह गौ हत्यारा फिर से पार्टी नेतृत्व का लाडला बन गया। उसे फिर से कांग्रेस में शामिल करने में किसी कांग्रेसी को जरा भी शर्म नहीं आई।

दर्शन नाइक की तरह ही मणिशंकर की वापसी तय!
इसी साल अक्टूबर की बात है कांग्रेस ने गुजरात में सूरत के पूर्व जिलाध्यक्ष दर्शन नाइक का निलंबन खत्म कर दिया था। नाइक पर एक कांग्रेसी नेता ने ही चरित्र हनन का आरोप लगाया था। बड़ी बात है कि कांग्रेस की जांच में उन्हें दोषी भी पाया गया था, जिसके बाद उन्हें 2016 में अनिश्चितकाल के लिए पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया था। जानकारों की मानें तो गुजरात चुनाव को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व के इशारे पर उन्हें फिर से वापस ले लिया गया। यानी कांग्रेस में जो होता है वह सिर्फ चुनावी फायदे और नुकसान को ध्यान में रखकर होता है, जैसा कि अभी मणिशंकर अय्यर के मामले में दिख रहा है।

जगमीत बरार पर सोनिया का यू-टर्न
अगस्त 2014 की बात है। कांग्रेस ने पंजाब कांग्रेस के एक दिग्गज नेता जगमीत सिंह बरार को भी इसी तरह पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। तब उन्होंने आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के लिए सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने की गुस्ताखी कर डाली थी, लेकिन शायद कांग्रेस हाईकमान को लगा कि अगर बरार को वापस नहीं लाया गया तो पंजाब में पार्टी कभी सत्ता में वापसी नहीं कर सकेगी। इसलिए एक साल के भीतर-भीतर जगमीत बरार का निलंबन वापस ले लिया गया।

दागी नेता को वापस लेकर किया पुरस्कृत
कर्नाटक के कांग्रेस नेता के मारिगोडा के केस में भी कांग्रेस का दोहरा चरित्र दिख चुका है। मारिगोडा पर एक महिला अफसर से अभद्रता का आरोप लगा था, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद अक्टूबर 2016 में उनका निलंबन इसलिए वापस ले लिया गया क्योंकि ननजंगुड विधानसभा उपचुनाव में पार्टी से उनसे एक बड़ी उम्मीदें थीं। कांग्रेस की निर्लज्जता देखिए कि उन्हें न सिर्फ पार्टी में वापस लिया गया, बल्कि एक कॉर्पोरेशन के बोर्ड में जगह देकर उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। इसलिए गुजरात चुनाव के बाद अगर राहुल-सोनिया मणिशंकर अय्यर को अगर कोई और बड़ी जिम्मेदारी भी सौंप दें तो अचरज नहीं होनी चाहिए।

बिहार कांग्रेस के 10 नेताओं पर भी बदला था स्टैंड
पिछले बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अनुशासन तोड़ने के आरोपों में पार्टी के 10 नेताओं को निलंबित कर दिया था, लेकिन बिहार में हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस ने इस साल सितंबर महीने में सभी निलंबित नेताओं को न सिर्फ पार्टी में वापस ले लिया, बल्कि उन्हें सक्रिय सदस्य भी घोषित कर दिया। कांग्रेस की ओर से दलील दी गई कि निलंबन के बाद ये 10 नेता किसी दूसरे दल में नहीं गए, इसलिए पार्टी उन्हें वापस लेती है। जिन लोगों का निलंबन वापस हुआ उनमें युवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ललन कुमार, अनुसूचित जाति विभाग के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष उमेश राम, प्रतिभा कुमारी, शम्स शाहनवाज, अवध पासवान, सफीउर रहमान, रंजीत यादव, मंटू शाही और मोहम्मद रिजवान शामिल हैं।

राजस्थान में भी नौटंकी कर चुकी है कांग्रेस
पार्टी से निकाल कर वापस लेने का कांग्रेसी चरित्र नया नहीं है। पार्टी में सुविधा के अनुसार ये खेल निरंतर चलता आया है। इसका एक बड़ा उदाहरण राजस्थान भी है, जहां पिछले आम चुनावों से ठीक पहले पूर्व विधायक समेत 14 कांग्रेसियों का निलंबन एक ही झटके में रद्द कर दिया गया था। यहां भी पूरा मामला चुनावों के नफा-नुकसान से जुड़ा था। लोकसभा चुनावों से पहले हुए राजस्थान विधानसभा चुनावों में इन नेताओं ने पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी का विरोध किया था। तब तो कांग्रेस ने गुस्से में सबको तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जब उनकी जरूरत महसूस हुई तो फिर से गले लगाने में भी देर नहीं की गई। इसलिए ये बात तय है कि मणिशंकर अय्यर का कांग्रेस से निलंबन मात्र आंख में धूल झोंकने की चाल है। एकबार गुजरात चुनाव निपट जाएगा, कांग्रेस नेतृत्व अपना असली चेहरा फिर से दिखाएगा और अय्यर को पार्टी में पहले से भी अधिक सम्मान के साथ वापस ले लिया जाएगा।

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