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चिटफंड के जरिए घोटाला करने वालों की अब खैर नहीं, गैरकानूनी डिपॉजिट स्कीम्स संबंधी बिल को मिली मंजूरी

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प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने अनियंत्रित जमा योजना पाबंदी बिल, 2019 को मंजूरी दे दी है। इससे चिटफंड योजनाओं के जरिए गरीब जनता का पैसा ऐंठने वाले घोटालेबाजों की अब खैर नहीं है। इस विधेयक का उद्देश्य देश में गैर-कानूनी तरीके से बिना नियम कायदे के चल रही जमा लेने वाली योजनाओं पर अंकुश लगाना है। अभी नियामकीय खामियों और सख्त प्रशासनिक उपायों के अभाव का फायदा उठाकर इस तरह की योजनाएं चलाने वाले लोग गरीब और बेबस लोगों को चूना लगाते हैं। प्रस्तावित कानून में ऐसी योजनाओं के जरिए डिपॉजिट हासिल करने वाले लोगों को दंड देने और उनसे वसूली का उचित प्रावधान है। प्रस्तावित बिल को संसद के मौजूदा सत्र के दौरान पेश किए जाने की उम्मीद है। बुधवार को कैबिनेट की बैठक के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि चिट फंड घोटालों से लोग पीड़ित हैं और नुकसान उठा रही है, नया कानून चिटफंड कंपनियों के इस घोटाले को रोकने में सहायक साबित होगा। यह विधेयक अनियंत्रित जमा योजना पाबंदी अध्‍यादेश, 2019 का स्‍थान लेगा।

चिटफंड मामला उस समय सुर्खियों में आ गया था, जब हजारों करोड़ रुपये के चिटफंड घोटाले के सबूत मिटाने के आरोपी पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के बचाव में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संवैधानिक मर्यादा को भी ताक पर रख दिया था। देश के करोड़ों लोग अपनी जीवन भर की कमाई इस चिटफंड के जरिए गवां देते हैं। आइए फिलहाल आपको पश्चिम बंगाल के चिटफंड घोटालों के बारे में बताते हैं…

सारधा चिटफंड घोटाले पर एक नजर
पश्चिम बंगाल का चिटफंड घोटाला कुल कितने रुपये का है इसका सटीक आंकलन लगाना मुश्किल है। हालांकि एक अनुमान के मुताबिक मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, असम और त्रिपुरा समेत अन्य कुछ राज्यों को मिलाकर आम गरीब लोगों की एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की रकम ठगी गई है। ज्यादातर कंपनियों ने भले ही अन्य राज्यों में भी अपना जाल फैलाया, लेकिन इनका बेस, पश्चिम बंगाल ही रहा है।

चिटफंड घोटाले में शामिल कंपनियां
हजारों करोड़ रुपये के चिटफंड घोटाले में कई कंपनियां शामिल हैं। इनमें सारधा समूह का करीब 40,000 करोड़ रुपये का घोटाला, रोज वैली का करीब 15,000 करोड़ रुपये, एमपीएस का 5,000 करोड़ रुपये, आइकोर का 4,000 करोड़ रुपये, प्रयाग का 1,000 करोड़,पैलान का 1500 करोड़ रुपये तथा विबग्योर का 1,000 करोड़ रुपये का घोटाला शामिल है। घोटाले में शामिल अन्य बड़ी कंपनियों में विश्वामित्र इंडिया परिवार, यूरो ग्रुप, ऐलकेमिस्ट, चक्र ग्रुप तथा सन्मार्ग सुराहा भी हैं। आम बोलचाल की भाषा में चिटफंड कंपनी के नाम से जाने जाने वाली इन पौंजी कंपनियों की तादाद करीब 200 हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों पर रहती थी इन कंपनियों की नजर
इन चिटफंड कंपनियों ने करीब एक करोड़ लोगों से पैसे उगाहे थे। इनमें से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। सारधा जैसी कंपनियों ने लोगों को ढाई से तीन वर्ष के भीतर पैसा दोगुना करने का वादा किया था, वहीं अपने एजेंटों को 30 से लेकर 50 फीसदी तक कमीशन दिया। इतने अधिक कमीशन की वजह से उसके एजेंटों का जाल बेहद तेजी से फैला था और इतनी बड़ी तादाद में निवेश आकर्षित करने की बड़ी वजह भी बना। पियरलेस या एलआइसी जैसी स्थापित कंपनियों के कई एजेंट भी अधिक कमीशन की लालच में इन कंपनियों के साथ जुड़ गए। इन अनुभवी एजेंटों की निकटता पहले ही आम लोगों के साथ थी इसके अलावा उन्हें निवेशकों को लुभाने का हुनर भी था। दुकानदार, शिक्षक, नौकरीपेशा जैसे लोग भी इसके एजेंट बने। मोहल्ले के लोगों को ही एजेंट के तौर पर पाने के कारण चिटफंड योजना के प्रति लोगों का विश्वास भी बढ़ गया। लिहाजा ये कंपनियों में बड़ी तादाद में निवेशक पहुंचे।

सारधा घोटाले में 100 से अधिक लोगों कर चुके हैं खुदकुशी
चिटफंड कंपनियों का जाल न केवल पश्चिम बंगाल में बल्कि झारखंड, बिहार, असम, त्रिपुरा, ओडिशा में भी फैला था। 2012 में सारधा घोटाले के सामने आने के बाद, एक के बाद एक चिटफंड कंपनियों का कच्चा चिट्ठा सामने आने लगा। घोटाले के सामने आने के बाद बंगाल में करीब 100 लोगों ने आत्महत्या कर ली। इसमें तो कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन की पूरी पूंजी इसमें लगा दी थी। वे इस घोटाले को बरदाश्त नहीं कर पाये और मौत को गले लगा लिया। आत्महत्या करने वालों में कुछ एजेंट भी हैं, जिनके माध्यम से लोगों ने कंपनी में निवेश किया था। घोटाले का खुलासा होने के बाद निवेशकों ने एजेंटों के घर व उनके परिजनों पर हमला करना शुरू कर दिया था, उनकी यातनाओं से तंग आ कर एजेंटों ने आत्महत्या कर ली। इनकी मौत की जिम्मेदारी को लेकर अबतक कोई मामला भी नहीं दर्ज किया गया है, हालांकि चिटफंड डिपोजिटर्स एंड एजेंट फोरम का दावा है कि चिटफंड मामले में बंगाल में 265 लोगों की मौत हो चुकी है। राज्य सरकार ने सारधा घोटाले के बाद लोगों के पैसे लौटाने के लिए 500 करोड़ रुपये का फंड भी बनाया था। हालांकि इसमें से केवल 150 करोड़ रुपये ही लोगों को बांटा जा सका है।

वर्षों बाद भी चिटफंड घोटाले की जांच अभी नहीं हुई पूरी
पश्चिम बंगाल में 2012 में सारधा चिटफंड मामले का खुलासा होने के बाद से लेकर अब तक सात साल हो गए, लेकिन इस मामले में पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिला है। गत 2014 में सारधा घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार के निर्देश पर तात्कालीन विधाननगर कमिश्नरेट के सीपी राजीव कुमार के नेतृत्व में स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) का गठन किया गया था। इसका पूरा दायित्व सीपी राजीव कुमार से हाथ में ही था। उसी दौरान कई अहम सुराग उनके हाथ लगे थे। वर्तमान में सीबीआई ने एसआइटी प्रमुख राजीव कुमार पर दस्तावेज गायब करने का आरोप लगाया है।

अप्रैल 2014 में मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
यह मामला अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच का जिम्मा सीबीआइ को सौंपी। पूर्वी भारत में चल रही सारधा समेत अन्य पोंजी स्कीमों की जांच का आदेश दिया गया।

सीबीआई ने धोखाधड़ी की धाराओं में दर्ज किया केस
सारधा घोटाले में लिप्त होने के आरोप में सीबीआई ने अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार किया है। बंगाल में सीबीआई ने सारधा कंपनी के आरोपियों के खिलाफ तीन मामले दर्ज किए हैं, जबकि ओडिशा में इस कंपनी के विभिन्न शाखाओं के नाम पर कुल 43 मामले दर्ज हैं।

 

चिटफंड घोटाले में कई बड़े लोगों से हुई पूछताछ
चिटफंड घोटाले में पूर्व सांसद मुकुलराय, राज्य के वर्तमान परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी, सांसद सुब्रत बक्शी, सीएम ममता बनर्जी के निजी सहायक मानिक मजूमदार, अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती, पेंटर शुभ्रप्रसन्ना, टीएमसी सांसद शताब्दी राय, तृणमूल सांसद अर्पिता घोष, पूर्व टीएमसी सांसद विवेक गुप्ता, ममता सरकार के मंत्री की बेटी श्रेया पाण्डेय, तृणमूल छात्र नेता शंकुदेव पांडा, पूर्व मेयर शोभन चटर्जी, तृणमूल कार्यकर्ता समील चक्रवर्ती, माकपा के पूर्व मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पूर्व विधायक रबीन देब, असम के डिप्टी सीएम हेमत विश्वशर्मा, रिटायर्ड आईपीएस पल्लव कांति घोष से पूछताछ हो चुकी है।   

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