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BRICS में पाकिस्तान को घुसाने के चीनी प्लान पर भारत ने पानी फेरा

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डोकलाम पर अपने अड़ियल रुख को त्यागकर चीन को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की इस कूटनीतिक जीत से कहीं ना कहीं चीन का गुस्सा भी नजर आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की शान बढ़ी है तो चीन का मान गिरा है, इसीलिए चीन अब भारत को परेशान करने की नई-नई चाल चलने में लगा है। हालांकि चीन की हर चाल को भारत कैसे फेल कर दे रहा है इसकी फिर एक बानगी सामने आई है।

BRICS में पाकिस्तान को घुसाना चाहता था चीन

अपने BRICS PLUS प्लान के बहाने चीन पांच देशों के समूह BRICS में पाकिस्तान जैसे दोस्तों को स्थायी रूप से घुसाने की ताक में था लेकिन भारत के विरोध के बाद उसे मुंह की खानी पड़ी। माना गया कि BRICS को विस्तार देने के चीन के इरादे के पीछे उसका असली उद्देश्य ही भारत के प्रतिद्वंद्वी और अपने ‘करीबी सहयोगी’ पाकिस्‍तान को शामिल करना था। भारत ने चीन की इस कोशिश का जोरदार विरोध किया..जिसमें उसे और सदस्य देशों का साथ मिला।  

भारत के पक्ष से और सदस्य देश सहमत

दरअसल चीन बड़े ही शातिर तरीके से अपनी योजना को अंजाम देना चाहता था। उसकी कोशिश थी कि BRICS में एक ऐसा स्थायी फीचर जोड़ा जाए जिसके तहत कुछ और देशों को भी इसमें शामिल करने का रास्ता खुल सके। लेकिन 5 देशों के इस मंच में भारत के साथ ही कुछ और सदस्य देशों ने चीन के इस प्लान पर पानी फेर दिया। इनका मानना था कि चीन के किसी करीबी देश को शामिल करने का मामला हो या फिर किसी अन्य देश को, इस तरह के किसी भी प्रावधान से BRICS का लक्ष्य भटक जाएगा।

चीन द्वारा आमंत्रित पांच देशों में पाकिस्तान नहीं

बुधवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संकेत दिया कि BRICS PLUS के उसके प्लान से बाकी सदस्य देश सहमत नहीं थे। वैसे चीन ने अपनी इस कोशिश का ये कहते हुए बचाव किया कि उसका ये आइडिया इस मंच को और मजबूती देने के मकसद से था। वांग ने बताया कि चीन ने सम्मेलन में भागीदारी के लिए पांच Non-BRICS देशों को उसी तर्ज पर आमंत्रित किया है जिस तरह से पिछले साल गोवा में भारत ने अपने कुछ पड़ोसी देशों को आमंत्रित किया था। दरअसल BRICS सम्मेलन के मेजबान देश को इसका अधिकार मिला हुआ है। हालांकि चीन द्वारा आमंत्रित किये गए पांच देशों में पाकिस्तान नहीं है। चीन के मुताबिक आमंत्रित किये गए थाइलैंड, मिस्त्र, ताजिकिस्तान, मेक्सिको और गुयाना वैसे देश हैं जो चीन के One Belt One Road programme में अहम भूमिका निभा रहे हैं। चीन का ये Programme दर्जनों देशों के बीच ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के निर्माण से संबंधित है।

चीन के बदले रुख के बाद पीएम मोदी जाएंगे BRICS में

चीन के शिआमान शहर में 3 और 4 सितंबर को BRICS सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मेजबान चीन के नेताओं के अलावा बाकी सदस्य देश रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS सम्मेलन में जाने का फैसला तब किया जब चीन ने डोकलाम गतिरोध पर लचीला रुख दिखाते हुए भारत के साथ-साथ अपने सैनिकों की वापसी पर सहमत हुआ। भारत ने पहले दिन से गतिरोध को खत्म करने के लिए अपना यही पक्ष रखा था और इसी पर हमेशा कायम भी रहा।  

भारत ने दिलाया चीन को उसकी हकीकत का एहसास

चीन को ये डर भी लगा कि अगर BRICS सम्मेलन में पीएम मोदी नहीं आए तो विश्व जगत में उसकी एक और किरकिरी होगी क्योंकि डोकलाम पर अपने रुख को लेकर वो दुनिया की नजरों में खटकने लगा था। अमेरिका और जापान के भारत के पक्ष में सीधा बयान आने के बाद कई और देश भी चीन के खिलाफ खड़े दिखने लगे। युद्ध की धमकी देने वाले चीन को शायद पहली बार इसका अंदाजा हुआ कि जो वो सोच रहा है वास्तविकता उसके ठीक विपरीत है। सच तो ये है कि डोकलाम गतिरोध पर अपने हठीले रवैये से चीन अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ता जा रहा था। चीन अब शायद इस बात को महसूस करने लगा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत उसकी हर चाल को भांपकर उसे नाकाम करने में सक्षम है। डोकलाम के बाद BRICS PLUS के अपने प्लान में नाकामी पीएम मोदी के भारत के हाथों हफ्ते भर में ही चीन की दूसरी कूटनीतिक हार है।

हर तरफ पंगा लेकर घिर गया चीन

अपनी हेकड़ी के चलते चीन को आज विश्व समुदाय में अपनी गर्दन फंसी नजर आ रही है। दक्षिण चीन सागर में चीन के दावे को लेकर पहले से दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (ASEAN) के कुछ देशों के साथ चीन का टकराव चल रहा है। चीन पूरे दक्षिण चीन सागर, यहां तक कि जो हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों फिलीपीन्स, ब्रुनेई, इंडोनेशिया और वियतनाम के तटीय इलाकों को छूता है, उस पर भी अपना दावा करता है। फिलीपींस तो इस मामले में चीन को हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण तक ले गया था। कोर्ट ने जुलाई में पिछले साल चीन के खिलाफ फैसला दिया लेकिन चीन ने निर्णय को एकतरफा बताते हुए इसे अपने लिए अपमानजनक करार दिया था। वहीं डोकलाम मामले में चीन ने ये उम्मीद नहीं की होगी कि अपनी सीमाओं की रक्षा के साथ भूटान के बचाव में भी भारत इस तरह से उसके आमने-सामने खड़ा हो सकता है। हकीकत ये है कि डोकलाम मामले में कूटनीतिक शिकस्त से चीन की विस्तारवादी नीति को जबरदस्त झटका लगा है। 

 

 

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