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देशहित में बीजेपी-एनडीए सांसदों ने पेश की मिसाल

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बीजेपी सहित एनडीए के सभी सांसद उन 23 दिनों का वेतन-भत्ता नहीं लेंगे, जिस दौरान संसद की कार्यवाही हंगामे के भेंट चढ़ गई थी। इन सांसदों का मानना है कि ये पैसे लोगों की सेवा के लिए मिलते हैं, और अगर हम वैसा करने में असमर्थ रहते हैं तो हमारे पास लोगों के पैसे को लेने का कोई हक नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से लिया गया निर्णय
दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रतिदिन 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हैं, लेकिन वे संसद में लगातार बाधित होती कार्यवाही से बेहद दुखी हैं। उन्होंने कई बार कहा भी है कि हमें जनता के समय को बर्बाद करने का कोई अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की इसी भावना से प्रेरणा लेते हुए सांसदों ने ये प्रशंसनीय निर्णय लिया है।

23 दिन का वेतन नहीं लेंगे बीजेपी-एनडीए सांसद
दरअसल जनप्रतिनिधियों को जो सैलरी मिलती है वो आम लोगों की सेवा के बदले में होती है। लेकिन जब सदन में कामकाज न हो रहा हो तो वेतन लेना किसी भी रूप में नैतिक नहीं है। भाजपा सांसद वरुण गांधी भी इस मुद्दे को उठाते रहे हैं। इसी तरह भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने भी कहा था कि सभी दलों और सांसदों को समझने की जरूरत है कि बिना किसी काम-काज के सैलरी लेना कहां तक उचित है।

सदन की कार्यवाही बाधित करती रही है कांग्रेस
संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की कार्यवाही को कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दलों ने मिलकर लगातार बाधित किया है। विपक्षी दलों की नकारात्मक राजनीति का ही नतीजा रहा है कि 04 अप्रैल को राज्यसभा की कार्यवाही एक दिन में ही 11 बार स्थगित करनी पड़ गई। लगातार चुनावों में हार से बौखलाई कांग्रेस किसी भी स्तर पर सरकार का विरोध कर रही है और देश के जनता के पैसों का नुकसान कर रही है।

हर दिन होता है देश के करोड़ों रुपये का नुकसान
आमतौर पर राज्यसभा की कार्यवाही एक दिन में 5 घंटे चलती है, जबकि लोकसभा की कार्यवाही एक दिन में 8-11 घंटे चलती है। अगर लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर सोमवार से शुक्रवार तक निर्बाध काम हो तो लगभग 115 करोड़ रुपये का खर्च बैठता है। गौरतलब है कि संसद में एक मिनट की कार्यवाही का खर्च ढाई लाख रुपये पड़ता है। यानि एक घंटे का खर्च डेढ़ करोड़ रुपये तक आता है।

जनता की गाढ़ी कमाई से चलती है संसद
गौरतलब है कि संसद की कार्यवाही के लिए खर्च किए जाने वाले पैसे जनता की गाढ़ी कमाई से आते हैं। देश की जनता दिनरात जी तोड़ मेहनत करती है और सरकार के पास इसी पैसे का कुछ हिस्सा टैक्स के माध्यम से पहुंचता है। उसी टैक्स के पैसे से संसद की कार्यवाही पर खर्च करने के लिए पैसों का इंतजाम होता है। जाहिर है यह जनता का अपमान है न कि संसद का।

मोदी सरकार में बेहतर हुआ विधायी काम-काज
बीते 46 महीनों के ओवरऑल परफॉरमेंस को देखें तो संसदीय कार्य अवधि के उपयोग के मामले में केंद्र की मोदी सरकार ने अच्छा काम किया है। 2014, 2015, 2016 और 2017 के बजट सत्र,  2015 का शीतकालीन सत्र, 2016 के मानसून सत्र में 100 प्रतिशत कामकाज हुआ।

इस कदम से विपक्ष सीखेगा कोई सबक?
बहरहाल बीजेपी और एनडीए सांसदों का देशहित में लिया गया बेहतरीन निर्णय है। इससे पता चलता है मोदी सरकार राष्ट्र के विकास के प्रति कितनी समर्पित है। सांसदों के इस कदम की तहेदिल से प्रशंसा होनी ही चाहिए, लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी उठाने चाहिए कि क्या कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने इस प्रकरण से कुछ सबक लिया है?

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