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कर्नाटक में दिखी कांग्रेस की वंशवाद की राजनीति, सामने आई राहुल और सिद्धारमैया की असलियत

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कांग्रेस पार्टी में वंशवाद हावी है, जाहिर है जिस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष ही वंशवाद की राजनीति के चलते बना है, उसमें वंशवाद की जड़ें कितनी गहरी होगी समझा जा सकता है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे के दौरान एक बार फिर कांग्रेस पार्टी का यही वंशवाद उजागर हुआ है। कांग्रेस ने कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से 218 पर उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है, लेकिन इस सूची ने राज्य कांग्रेस के नेताओं को विद्रोह करने पर मजबूर कर दिया है। विद्रोह की सबसे बड़ी वजह है, आम कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने नेताओं के बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों को टिकटों का बंटवारा।

टिकट बंटवारे से कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कर्नाटक विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक होते ही राज्य में तमाम जिलों में पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और जमकर हंगामा किया। राज्य के हंगल, मायाकोंडा, जगलूर, कुनीगल, कोलार, कोल्लीगल, बेलूर, बेडामी, किट्टूर समेत कई इलाकों में टिकट नहीं पाने वालों ने अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर उतर कर हंगामा किया। चिकमंगलूर में तो नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ्तर में जमकर तोड़फोड़ भी की। दरअसल, ये सभी लोग पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से नाराज हैं। इनका आरोप है कि तमाम आश्वासनों के बाद भी इन लोगों ने पार्टी के लिए जी-जान देने वाले कार्यकर्ताओं के ऊपर बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को तरजीह दी है। टिकट बंटवारे से नाराज कई कार्यकर्ताओं ने तो पार्टी से इस्तीफा तक देने की धमकी दे डाली है। बैंगलुरू की सी वी रमन नगर सीट से टिकट नहीं मिलने पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी रमेश ने जेडीएस से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पी रमेश ने कहा कि “यह इंदिरा गांधी की कांग्रेस नहीं है बल्कि यह सिद्धारमैया की तुगलक कांग्रेस है”

किन नेताओं के बेटे-बेटियों को मिला टिकट
कर्नाटक में कांग्रेस प्रत्याशियों के नाम देखने से पता चलता है कि यहां सिर्फ वंशवाद को ही प्रमुखता दी गई है। लिस्ट में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे डॉ. यतींद्र, गृह मंत्री रामालिंग रेड्डी की बेटी सौम्या रेड्डी, कानून मंत्री टी बी जयचंद्र के बेटे संतोष और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक को टिकट दिया गया है। जाहिर है कि इन उम्मीदवारों को सिर्फ इनके पिता के प्रभाव के चलते टिकट मिला है। ट्वीटर पर लोगों ने वंशवाद की राजनीति करने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की फटकार लगाई है।

वंशवाद का दूसरा नाम है कांग्रेस पार्टी
कांग्रेस पार्टी वंशवाद का पर्याय है। कुछ महीनों पहले की ही बात है जब राहुल गांधी को इसी वंशवाद के चलते कांग्रेस पार्टी की बागडोर सौंपी गई थी। सभी जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर नौटंकी की गई, किसी भी नेता को दावेदारी का मौका नहीं दिया गया, और चाटुकारिता में विश्वास करने वाले कांग्रेसी नेताओं ने एक सुर में राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित किया। नामांकन के दिन तक किसी और की दावेदारी नहीं आने पर राहुल गांधी को निर्विरोध रूप से कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। राहुल पहले उनकी मां सोनिया गांधी 19 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष रहीं थीं। अगर आप कांग्रेस पार्टी ने वंशवाद की राजनीति के चलते टिकट पाने वाले वालों की नाम देखें तो सूची काफी लंबी है। सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, नवीन जिंदल, आर पी एन सिंह, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई नाम है, जो सिर्फ वंशवाद के चलते हीं कांग्रेस पार्टी के प्रमुख चेहरे बने हुए हैं।

आजादी के बाद नेहरू-गांधी परिवार का गुलाम बना देश
नेहरू-गांधी परिवार में सिर्फ और सिर्फ वंशवाद की राजनीति होती है। यहां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपने की परंपरा रही है, बिलकुल राजशाही की तरह। आजादी के बाद से ही देश की सत्ता और कांग्रेस पार्टी पर इस परिवार का कब्जा रहा है। 69 साल में 48 साल तक इस परिवार ने राज किया, 38 साल सीधे-सीधे और 10 साल तक मनमोहन सरकार की डुगडुगी अपने पास रखी। परिवार की लगातार तीन पीढ़ियां – जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री के पद पर काबिज रहे। जबकि यूपीए सरकार के समय भी सत्ता की कमान सीधे-सीधे राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी के पास रहीं। कांग्रेस की इतनी बुरी हार के बाद भी वो पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और हर चुनाव में शिकस्त मिलनेके बाद भी उनके पुत्र राहुल गांधी की तरक्की हो रही है और वो इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। इसके अलावा राजीव गांधी के भाई संजय गांधी हों या राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा, कांग्रेस पार्टी के भीतर इनके कद का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर वाड्रा पर आरोप भी लगते हैं तो पूरी कांग्रेस पार्टी विधवा विलाप करने लग जाती हैं।

आजादी के 70 साल, 53 साल तक शीर्ष पद पर कब्जा कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के लिए नेहरू-गांधी परिवार की समय सीमा निकालें तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी या फिर दोनों पदों पर एक साथ कब्जा रहा है।

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