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वरिष्ठ पत्रकार तसलीम खान की कलम से- पढ़िए कैसे अखिलेश यादव का कारनामा बोल रहा है

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उत्तर प्रदेश के सियासी और चुनावी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हकीकत का आइना दिखाया तो सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी और उसकी गठबंधन सहयोगी तिलमिला उठे हैं। प्रधानमंत्री ने अखिलेश सरकार के विकास की बानगी भर दिखाई थी और कुछ तथ्य सामने रखे थे। जिसके जवाब में सपा के राजकुमार अखिलेश यादव मानो संयम ही खो बैठे हैं। काम बोलता है का नारा देकर चुनावी समर में उतरे अखिलेश अपने राज्य के आंकड़ों को तो बोलने ही नहीं दे रहे। और अगर कोई इन आंकड़ों और तथ्यों को आइने की तरह सामने रखता है तो उस पर वोटो के ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाते हैं।

आइए, हम आपको कुछ तथ्यों से रूबरू कराते हैं। सबसे पहले विकास की ही बात कर लेते हैं। किसी भी राज्य के विकास को मापने का सबसे बड़ा पैमाना उस राज्य की एसजीडीपी यानी राज्य का सकल घरेलू उत्पाद होता है। आंकड़े साक्षी हैं कि अखिलेश ने जब 2012 में सरकार की बागडोर संभाली थी तो उत्तर प्रदेश की विकास दर 7 फीसदी की रफ्तार पर थी। मायावती के कार्यकाल में प्रदेश औसतन 7 फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा था। तुलनात्मक आंकड़े देखने पर पता लगता है कि अखिलेश इस रफ्तार को बरकरार रखने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। इनके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की औसत स्टेट जीडीपी महज 5.6 फीसदी रह गयी है। वो भी अखिलेश सरकार के पहले साल में तो विकास दर 3.9 फीसदी पर आकर आधी ही रह गयी थी।

अब आपको दूसरी हकीकत बताते हैं। किसानों के हितों की रक्षा करने और केंद्र सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाने वाले अखिलेश यादव और उनके नए नवेले दोस्त राहुल गांधी भी इन आंकड़ों को जरा गौर से देख लें। अखिलेश ने जब कार्यकाल संभाला तो यूपी की कृषि विकास दर 5.2 फीसदी थी, लेकिन पहले ही साल में ये दर लुढ़क कर आधे फीसदी यानी 0.5 फीसदी पर पहुंच गयी। इनकी सरकार के दूसरे साल में भी कृषि विकास की रफ्तार 2.5 फीसदी ही रही। ध्यान रहे कि कृषि क्षेत्र उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है और यूपी की आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में ही रहता है। ये हालत तब है जब उत्तर प्रदेश में पिछले तीन मॉनसून औसतन सामान्य रहे हैं।

वैसे कुछ क्षेत्रों में यूपी ने ठीक ठाक काम किया है। इनमें ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज, संचार और ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर शामिल हैं। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि ये सारे सेक्टर वे हैं जिनके लिए केंद्र सरकार ने नई योजनाएं लागू की हैं। इन क्षेत्रों में केंद्र के सहयोग से भले ही यूपी ने ठीक ठाक काम किया हो लेकिन अखिलेश के पड़ोसी बीजेपी राज्यों के मुकाबले उनकी स्टेट जीडीपी खराब स्थिति में है। मिसाल के तौर पर मध्य प्रदेश 6.8 फीसदी, झारखंड 11 फीसदी, हरियाणा 8 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।

अब आते हैं वोटों के ध्रुवीकरण के आरोप पर। पिछले साल अखिलेश यादव ने जब राज्य के वित्त मंत्री की हैसियत से बजट पेश किया तो कब्रिस्तानों के लिए बजट को दो गुना कर 400 करोड़ रुपए कर दिया। वहीं श्मशानों के रखरखाव के लिए आधे से भी कम बजट रखा गया। ये तुष्टिकरण और मुस्लिम वोटों को रिझाने की कोशिश नहीं तो और क्या थी।

एक और आंकड़ा सामने रखते हैं। यूपी सरकार तथाकथित मेधावी छात्रों को लैपटॉप बांटती है। छात्रों के लिए तथाकथित शब्द यूं ही नहीं लिखा है। वो इसलिए कि पिछले साल जब एक कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर बलिया में जिन छात्रों को लैपटॉप बांटने गए थे उनमें अधिकतर छात्र ऐसे थे, जिन्हें राज्य के मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं पता था। और तो और उन्हें ये भी नहीं पता था कि जो मुख्य अतिथि उन्हें लैपटॉप बांट रहे हैं वो मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं या चंद्रशेखर के।

अब आपको लैपटॉप वितरण में तुष्टिकरण और वोटों के ध्रुवीकरण का एक और तथ्य दिखाते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने लैपटॉप वितरण के लिए जो शासनादेश जारी किया था, उसके मुताबिक लैपटॉप वितरण में 21 फीसदी आरक्षण एससी-एसटी छात्र-छात्राओं के लिए था और बीस फीसदी आरक्षण अल्पसंख्यकों के लिए। इतना ही नहीं मदरसा शिक्षा परिषद के छात्रों को लेकर भी पांच फीसदी आरक्षण का प्रावधान था। ये सब तुष्टिकरण और वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश नहीं तो और क्या है?

तो अखिलेश यादव, ये सारी बातें सामने रखो, अभी तीन चरण बाकी हैं, फिर पता चलेगा कि यूपी को किसका साथ पसंद है और वोटरों को ये भी समझ आ जाएगा कि काम बोलता है या आंकड़े आइना दिखाते हैं।

 

 

 

 

-तसलीम खान, वरिष्ठ पत्रकार

 

 

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