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सामने आने लगा अखिलेश यादव सरकार का ‘कारनामा’

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उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का साथ क्यों पसंद था, उसका पर्दाफाश होना शुरू हो गया है। केंद्र में मनमोहन सिंह की मुखौटे वाली वाली सोनिया-राहुल की सरकार जबतक रही अपनी ही पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के घोटाले के रिकॉर्ड तोड़ती रही। अब खुलासा हो रहा है कि अखिलेश यादव की सरकार ने भी यूपी में सरकारी खजाने से लूटपाट में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब ये जानकारी आई है कि अखिलेश सरकार ने 20 करोड़ रुपये के बेरोजगारी भत्ता बांटने के लिए 15 करोड़ रुपये नाश्ते-पानी पर उड़ा दिए। ये खुलासा सीएजी रिपोर्ट से हुआ है। अब समझ में आ रहा है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टियां धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर अक्सर जिस समान विचारधारा की बात करती हैं, वो समान विचारधारा असल में है क्या ?

बेरोजगारी भत्ते के नाम पर लूट
हिंदी समाचार पत्र जनसत्ता के अनुसार सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, यूपी की समाजवादी पार्टी सरकार ने साल 2012-13 में 20.58 करोड़ रुपये बेरोजगारी भत्ता बांटने के इंतजाम के नाम पर 15.06 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। रिपोर्ट के अनुसार 15 करोड़ रुपये की इस रकम में 8.07 करोड़ रुपये नाश्ते-पानी और कुर्सियों पर और बाकी 6.99 करोड़ रुपये बेरोजगारों को कार्यक्रम स्थल पर लाने के नाम पर उड़ा दिए गए। सीएजी की ये रिपोर्ट उत्तरप्रदेश विधानसभा में पेश की गई है। सीएजी के अनुसार राज्य के 69 जिलों के लाभार्थियों को पैसा सीधे खाते में जमा करना था। बैंक खातों की जानकारी लाभार्थियों को आवेदन के साथ ही देने का प्रावधान है। अगर सरकार ऐसा करती तो जनता के 15 लाख रुपये बच सकते थे। लेकिन करीब 1.26 लाख बेरोजगारों को तत्कालीन सीएम ने पूरे तामझाम के साथ खुद से चेक बांटे और सरकारी खजाने का बंदरबांट कर दिया। सबसे बड़ी बात ये कि ये योजना अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल रही है।


वो गुंडाराज और भ्रष्टाचार की सरकार थी- योगी सरकार
हिंदी पोर्टल दैनिक भास्कर के अनुसार योगी सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि, अखिलेश यादव ने समाजवादी के नाम पर बेरोजगारों के भत्ते में भी सेंधमारी कर दी। वो बेरोजगारी भत्ता और लैपटॉप की बात करके ही सीएम बने थे। लेकिन उन्होंने इसे भी अपने प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किया। यानि ये साफ हो चुका है कि पिछली सरकार में गुंडाराज और भ्रष्टाचार का बोलवाला था।

रिवर फ्रंट बनाने में भी घोटाला ?
हिंदी समाचार पोर्टल एनबीटी की मानें तो लखनऊ में गोमती रिवर फ्रंट में गड़बड़ी करने वालों पर जल्द ही गाज गिरनी शुरू हो सकती है। योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद से इस रिवर फ्रंट का दौरा किया। आरोप लग रहे थे कि इसे बनाने के लिए निर्धारित बजट से ज्यादा पैसे खर्च किए गए। उन्होंने तत्काल एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट सीएम को सौंप दी है। समिति ने जांच में पाया है कि इसे बनाने में काफी गड़बड़ियां की गई हैं। जांच में पाया गया कि पहले रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट का बजट केवल 550 करोड़ का था। डेढ़ साल के भीतर इसकी लागत बढ़कर 1467 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। सबसे बड़ी बात कि ये लागत भी ज्यादातर समय मौखिक आधार पर बढ़ाई गईं। समिति ने यह भी पाया है कि प्रोजेक्ट गोमती नदी के प्रदूषण को कम करने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन नालों को गोमती में गिरने से रोकने का इंतजाम नहीं किया गया। गोमती में पानी की रिचार्जिंग का भी कोई इंतजाम नहीं किया गया। हालांकि अखिलेश यादव इसके उद्घाटन से नहीं चूके थे। 

ऊपर जिन दो मामलों में जांच हुई है, वो तो सिर्फ बानगी भर है। उत्तरप्रदेश की पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कारनामों की लिस्ट बहुत लंबी है। जैसे-जैसे जांच होती जाएंगी, उनकी सरकार के दौरान मची लूट का सच भी जनता के सामने आ जाएगा। आगे हम उन बातों का जिक्र करने जा रहे हैं, जिसको लेकर उनकी सरकार पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। 

खुलने लगे लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे के घपले

हिंदी समाचार पोर्टल जनसत्ता के अनुसार अखिलेश सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट आगरा-लखनऊ में भी जांच के बाद बड़े घोटाले की बात सामने आने लगी है। आरोप लग रहे हैं कि इस एक्सप्रेस वे के लिए जमीन अधिग्रहण में किसानों से औने-पौने दाम पर जमीन खरीद कर चार गुना मुआवजा वसूला गया। योगी सरकार ने इन आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं। लखनऊ से आगरा को जोड़ने वाला लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे का उद्घाटन चुनाव के एलान से पहले 21 नवंबर, 2016 को आनन-फानन में कर दिया गया था। जनता को लुभाने के लिए, 302 किमी के एक्सप्रेस वे के मात्र तीन किमी के क्षेत्र पर लड़ाकू विमान उतरवाया गया। जबकि हकीकत कुछ और ही थी। तब इस एक्सप्रेस वे का काम आधा-अधूरा ही था। ना तो डिवाइडर बना था और न डिफर लाइन। सर्विस लेन का भी अता-पता नहीं था। पूरे एक्सप्रेस वे पर कहीं भी साइनबोर्ड नहीं लगाया गया था। लेकिन फिर भी अखिलेश यादव ने पूरे तामझाम के साथ इसका उद्घाटन कर दिया, क्योंकि चुनाव आने वाले थे। 

लखनऊ मेट्रो के नाम पर जनता से धोखा

अखिलेश सरकार के रहते लखनऊ मेट्रो सेवा के लिए केंद्र सरकार ने 550 करोड़ रुपये दे चुकी थी। लखनऊ मेट्रो को फंड की कमी न हो, इसके लिए 3500 करोड़ रुपए कर्ज की भी व्यवस्था केंद्र सरकार ने की। इसके बावजूद साढ़े 8 किमी का ही ट्रैक तैयार हो पाया,जबकि पहले चरण में 23 किमी का मेट्रो ट्रैक बनना था। चुनाव के मद्देनजर आनन फानन में मेट्रो का उद्घाटन भी उद्घाटनवीर अखिलेश यादव ने कर दिया। जबकि उद्घाटन किए जा चुके 8 किमी ट्रैक पर बने स्टेशनों का काम तब अधूरा ही था। सवाल उठता है कि जब काम पूरा ही नहीं हुआ था, तो फिर उद्घाटन के नाम पर जनता के पैसे क्यों लुटा दिए ?

डायल 100 का खेल !

अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही कहा था कि प्रदेश की कानून व्यवस्था दुरुस्त रखेंगे। इसके लिए डायल 100 के तहत पुलिस को सशक्त करने की बात की थी। इसके बाद भी साल दर साल अपराधों की संख्या बढ़ती रही। पूरे पांच साल के कार्यकाल में अखिलेश यादव ने प्रदेश के सिर्फ और सिर्फ 11 जिले में डायल 100 योजना लागू कर पाए। प्रदेश के 64 जिलों में डायल 100 का अता-पता नहीं था। इस प्रोजेक्ट की लागत भी 2350 करोड़ रुपये थी। 

जनेश्वर मिश्र पार्क का काम भी अधूरा छोड़ा

लखनऊ का जनेश्वर मिश्र पार्क अखिलेश सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट था। जिसका काम भी वो आधा-अधूरा छोड़ गए। लेकिन इसके बाद भी वो इसका उद्घाटन नहीं भूले। सवाल उठता है कि जो काम पूरा ही नहीं हुआ, उसके उद्घाटन के नाम पर सरकारी खजाने से पैसे क्यों बर्बाद किए गए ?

इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम का भी किया वही हाल

लखनऊ इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम का उद्घाटन भी 20 दिसंबर, 2016 को ही अखिलेश यादव ने कर दिया। लेकिन यह स्टेडियम खेल मानकों पर कहीं से भी खरा नहीं उतरा था। उतरेगा भी कैसे, क्योंकि स्टेडियम में फिनिशिंग का काम अधूरा ही था। स्टेडियम तक पहुंचने वाली सड़कों की हालत एकदम खस्ता थीं। पूरे स्टेडियम में कहीं भी बैठने की व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में इसका उद्घाटन, जनता को मूर्ख बनाने के अलावा क्या था ?

सीएम के हाईटेक कार्यालय के नाम पर भी दिया धोखा

तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के हाईटेक कार्यालय का उद्घाटन भी पूरी तरह से तैयार होने से पहले ही कर दिया था। जैसे कि उन्हें मालूम था, कि अब उनकी सरकार नहीं आने वाली। सवाल उठता है कि जो मुख्यमंत्री अपना कार्यालय भी समय पर नहीं बनवा सकता है वो जनता का काम कैसे कर सकता है ? दरअसल उनकी सोच जनता के लिए तो थी ही नहीं, उन्हें तो सरकारी धन का दुरपयोग और अपना चेहरा चमकाने से मतलब था। 

जेपीएन इंटरनेशनल सेंटर को भी अधूरा छोड़ा

अखिलेश यादव ने जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (जेपीएनआईसी) का उद्घाटन भी बिना काम पूरा हुए ही कर दिया था। यानी वोट की लालच में वो उस नेता का अपमान करने से भी नहीं चूके जिसके नाम का इस्तेमाल कर वो सियासी रोटियां सेकते हैं। 

अभी तो शुरुआत हुई है। आने वाले दिनों में अखिलेश यादव की पिछली सरकार के ऐसे कई और राज खुलने की संभावना है, जिसके आरोप तो लगते रहे हैं, लेकिन उनमें अभी जांच शुरू होनी है। अब लोगों को भी समझ में आने लगा है कि अपने पिता और पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं की मनाही के बावजूद अखिलेश यादव को राहुल गांधी का साथ क्यों पसंद आया था ? क्योंकि इनकी ‘समान विचारधारा’ की पोल तो जनता ही खोल चुकी है। 

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