Home चुनावी हलचल राहुल का भूकंप तो फुस्स रहा, अखिलेश का भूकंप आत्मघाती तो नहीं...

राहुल का भूकंप तो फुस्स रहा, अखिलेश का भूकंप आत्मघाती तो नहीं होगा?

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राहुल गांधी का भूकंप तो सबने देखा। पत्ता तक नहीं खड़का। राहुल की तर्ज पर ही अखिलेश ने जब भूकंप लाने की बात कही, तो जाहिर है लोगों को अखिलेश की बात याद आ गयी। लेकिन अखिलेश राहुल की तरह फुस्स नहीं निकले। अखिलेश ने भूचाल ला दिया। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता से पार्टी की कमान छीन ली, बल्कि चाचा और अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया।

अखिलेश ने भूकंप लाने की बात तब कही थी जब पत्रकारों ने उन्हें ये कहते हुए उकासाया था कि उनके चाचा लगातार प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर रहे हैं, उनके समर्थकों को बेटिकट कर रहे हैं और फिर भी एक सीएम होते हुए आप चुप क्यों हैं? तब अखिलेश ने जवाब दिया था कि जैसा चल रहा है वैसा चलने दो, भूकंप मत लाओ। दरअसल भूकंप शब्द का इस्तेमाल करके ही उन्होंने भावी सियासत की तस्वीर उसी दिन पेश कर दी थी।

समाजवादी पार्टी में सीएम अखिलेश यादव, पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच की लड़ाई परिवार की आंतरिक कलह से काफी आगे जा चुकी है। परिवार के लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से कई बार टूट के कगार पर पहुंच चुकी पार्टी अब तो चुनाव आयोग तक जा पहुंची है। चुनाव चिन्ह को लेकर पिता-पुत्र आमने-सामने हैं। यहां तक कि मुलायम सिंह ने अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ने तक की बात कह दी है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। राज्य में चुनावी माहौल पूरी तरह से गर्माया हुआ है। 403 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए हर पार्टी ने जोर लगाना शुरू कर दिया है। जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी अंदरुनी लड़ाई और जातीय समीकरण में उलझी हुई है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकास नीतियों और कालेधन के खिलाफ नोटबंदी अभियान के कारण आगामी विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी एडवांटेज मोड में दिख रही है। पार्टी एक बार फिर दो साल पहले वाली ताजगी और स्फूर्ति महसूस करने लगी है।

अखिलेश कदम बढ़ा चुके हैं। उनकी छवि दांव पर है। राहुल गांधी का राजनीतिक भूकंप तो फुस्स हो गया था, लेकिन अखिलेश ने जो भूकंप पार्टी में पैदा किया है वो बेनतीजा नहीं रहने वाला। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि क्या इससे उन्हें चुनाव में कोई फायदा होने वाला है या चुनावी डगर में दोनों खेमा लड़ते झगड़ते सत्ता की नाव को डुबो देंगे। दिखता तो यही है।

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