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AAP के 20 विधायकों को कोई क्लीन चिट नहीं मिली है

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘लाभ के पद’ का सुख भोगने वाले अपने विधायकों पर आए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर करने में जल्दी कर दी है। केजरीवाल ने अपनी खुशी कुछ इस प्रकार से जताई जैसे उनके 20 विधायकों को क्लीन चिट ही मिल गई हो।

चुनाव आयोग में होगी दोबारा सुनवाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में चुनाव आयोग से मामले की दोबारा सुनवाई करने को कहा है। इस सुनवाई में वे विधायक अपनी बात चुनाव आयोग के सामने रखेंगे जिन्हें ‘लाभ का पद’ दिया गया था।

राष्ट्रपति से होकर मामला चुनाव आयोग पहुंचा था

यह मामला तीन साल पुराना है जब केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था। दिल्ली में संसदीय सचिवों को घर, गाड़ी और ऑफिस की सुविधाएं दी जा सकती हैं। तीन महीने बाद ही एक वकील ने इस मामले में अपनी शिकायत राष्ट्रपति तक पहुंचाई थी। अपने आवेदन में उन्होंने संसदीय सचिव को लाभ का पद बताते हुए विधायकों की सदस्यता रद्द करने की अपील की थी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस शिकायत को चुनाव आयोग के पास भेज दिया था।

केजरीवाल के संशोधन विधेयक को नहीं मिली थी मंजूरी

मामले में अपनी गर्दन फंसी देख केजरीवाल ने आनन-फानन में दिल्ली विधानसभा में एक ऐसे संशोधन विधेयक को पास कराया जिससे विधायक अयोग्य ना ठहराए जा सकें। लेकिन गौर करने वाली बात है कि संसदीय सचिव बनाए जाने से पहले उन्होंने इस कदम को उठाया जाना जरूरी नहीं समझा था। इस बिल पर राष्ट्रपति ने अपनी सहमति नहीं दी थी। केंद्र सरकार ने भी दिल्ली सरकार  इस बिल को लौटा दिया था।   

EC ने अयोग्य करार दिए जाने की सिफारिश की थी

पिछली जनवरी में चुनाव आयोग ने संसदीय सचिव के पद को ‘लाभ का पद’ करार देते हुए राष्ट्रपति से 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी। ‘लाभ के पद’ के मामले में फंसे 21 विधायकों में से एक जरनैल सिंह ने पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। इस पूरे मामले में चुनाव आयोग का मानना था कि संसदीय सचिव बनाए जाने से लेकर अगले करीब डेढ़ वर्षों तक इन विधायकों को ‘लाभ के पद’ के मामले में अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।

विधायकों की मुसीबत बरकरार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 191(1)(ए) के अनुसार अगर कोई विधायक या सांसद लाभ के पद पर पाया जाता है तो विधानसभा या संसद से उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। गौर करने वाली बात है कि करीब 12 वर्ष पहले जया बच्चन को अपनी राज्यसभा की सदस्यता इसलिए छोड़नी पड़ी थी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार में वो एक लाभ के पद पर भी रही थीं। जया बच्चन ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि उन्होंने किसी तरह की सुविधा नहीं ली थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि फर्क सुविधा लेने या न लेने से नहीं पड़ता है, बल्कि इससे पड़ता है कि वो लाभ का पद है कि नहीं। यानि केजरीवाल के 20 विधायकों की मुसीबत भी अभी खत्म नहीं हुई है।

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